Thursday 06, February 2025
दोषों में भी गुण ढूंढ निकालिए, Doshon Me Bhi Guna Dhundh Nikaliye
लौकिक सुख का आधार अध्यात्म | Laukik Sukh Ka Aadhar Adhyatm
परंपराओ का हमारे समाज में क्या योगदान हैं ? | समस्याओं का समाधान ऋषि चिंतन से
शांतिकुंज में शिविर करने हेतु Registration की प्रक्रिया |
प्रयागराज महाकुम्भ दर्शन ( गायत्री परिवार शिविर ) |
Ep:- 14/21 विशिष्ट आत्माओं का विशेष अवतरण | महाकाल और युग प्रत्यावर्तन प्रक्रिया
नवयुग सृजन का बड़ा काम है।उसके लिए सहयोगी तो गीद, गिलहरी भी हो सकते हैं, पर महत्वपूर्ण उत्तरदायित्वों को निभाने के लिए अंगद, हनुमान जैसे वानरों और नल, नील जैसी रीछों की आवश्यकता पड़ती है। गौ चराने, गेंद खेलने और गोवर्धन उठाने में लाठी का सहयोग देने के लिए तो ग्वाल-वाल भी अपनी उपयोगिता सिद्ध कर सके, किन्तु महाभारत जीतने में भीम, अर्जुन से ही काम चला। स्वतन्त्रता संग्राम के जीतने में भी सत्साहसियों की जेल यात्रा को ही सराहा जायगा पर गाँधी पटैल जैसी हस्तियाँ आगे न आतीं तो महान प्रयोजन कदाचित ही पूर्ण हो पाता, महान परिवर्तनों में योगदान तो असंख्यों का रहा है किन्तु उसका सूत्र संचालन महामानव ही करते रहे हैं। छप्पर तो बाँस बल्लियों पर भी खड़े रहते हैं, पर नदी या नाले का पुल बनाने में ऐसे मजबूत पाये लगाने पड़ते हैं जो उस परिवहन का भार सह सकें।
युग सृजन में सहयोगी कोई भी हो सकता है यह उसका उत्तरदायित्व कंधों पर ओढ़ने वाले सृजन शिल्पियों को नल-नील जैसा प्रबुद्धि एवं परिपक्व होना चाहिए। ऐसी भूमिका निभा सकना हर किसी के बस की बात नहीं है। सिखाने पढ़ाने से थोड़ा सा काम तो चलता है पर प्रखरता मौलिक एवं संस्कारगत होनी चाहिए। लोहे की मजबूती उसकी संरचना में ही सन्निहित है। कारखानों में ढालने, खरादने का काम होता है, कृत्रिम लोहा नहीं बन सकता और न उसका स्थानापन्न किसी अन्य धातु को बनाया जा सकता है।
प्रशिक्षण, वातावरण, एवं सर्म्पक का प्रभाव तो पड़ता है पर महामानव इतने से ही नहीं बन जाते। उनके लिए संस्कार गत मौलिकता एवं संचित प्रखरता की भी आवश्यकता होती है। विश्वामित्र ने राम लक्ष्मण को आग्रहपूर्वक माँगा था और उन्हें वला अतिवला विद्याएँ सिखा कर महान परिवर्तन के लिए उपयुक्त क्षमता सम्पन्न बनाया था। चाणक्य ने चन्द्रगुप्त-समर्थ रामदास ने शिवाजी, बुद्ध ने आनन्द, महीन्द्रनाथ ने गौरख रामकृष्ण परमहंस ने विवेकानन्द को बड़ी कठिनाई से ढूँढ़ा था। आगन्तुकों की भारी भीड़ में से इन सभी शक्ति सम्पन्नों को कोई काम का न लगा। बड़ी कठिनाई से ही वे अपने थोड़े से अनुयायी उत्तराधिकारी ढूँढ़ने में सफल हुए। विवेकानन्द ने निवेदिता से कहा था मुझे मात्र तुम्हारे लिये यूरोप की यात्रा करनी पड़ी।
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति- फरवरी 1980 पृष्ठ 46
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जो काम से भागेगा, वो कभी आगे नहीं बढ़ेगा | Pt Shriram Sharma Acharya
हमें आंतरिक प्रसन्नता होती है | गुरुदेव के पत्र |
!! आज के दिव्य दर्शन 06 February 2025 !! !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
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!! परम पूज्य गुरुदेव का कक्ष 06 February 2025 गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
!! अखण्ड दीपक Akhand Deepak (1926 से प्रज्ज्वलित) एवं चरण पादुका गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 06 February 2025 !!
!! परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी का अमृत सन्देश !!
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
किशोरावस्था सबसे बड़ी भयंकर खतरनाक मस्त की जिंदगी है। इसमें आदमी को इस तरीके के साथ सिखलाना पड़ता है, जिस तरीके से और को घोड़े, जिस तरीके से गाड़ी में चलना सिखाना पड़ता है, और बैल को जिस तरीके से हल में चलना सिखाना पड़ता है, और सर्कस में काम करने वाले शेर और हाथियों को जिस तरीके से सुधारना और सिखाना पड़ता है। वह पीरियड कौन सा है? वह पीरियड केवल किशोरावस्था का है। किशोरावस्था 17-18 वर्ष तक बनी रहती है, उसमें से कुछ काट लें तो 16 वर्ष में ही खत्म कर दिया। मैं उसको 16 वर्ष पर खत्म करना नहीं चाहता। मैं 5 वर्ष से शुरू भी नहीं करना चाहता। मैं 6-7 वर्ष से शुरू करना चाहूंगा और मैं उसको 18 वर्ष तक ले जाना चाहूंगा। 10 वर्ष जो हैं, वो ऐसे हैं जिसमें हमको अपने बच्चे के ऊपर लाड़ तो करना चाहिए, लेकिन विवेकपूर्ण लाड़ करना चाहिए। आपने विवेकपूर्ण लाड़ नहीं किया है, उसको आपने छुट्टी दी है, तो बच्चा तो तबाह हो जाएगा। आप याद रखना, फिर मत शिकायत करना कि हमारा बच्चा ऐसा हो गया और हमारा बच्चा ऐसा हो गया। सांप को आप ताड़ना सिखाते हैं, बड़े को आप चलाना सिखाते हैं, मुझको आपका चलाना सिखाते हैं। हमको आपको बच्चों को क्यों नहीं सिखाते आप? बच्चे को सिखाइए, सख्ती से पेश आइए, प्यार से पेश आइए और उसके साथ गंभीर रहिए, और गंभीरता से उसको जवाब दीजिए, और गंभीरता से उससे बात कीजिए। बच्चों के ऊपर थोड़ा धैर्य रहना चाहिए। अगर ये नहीं रहेगा तो मुश्किल खड़ी हो जाएगी, और बच्चे तबाह हो जाएंगे।
अखण्ड-ज्योति से
एक दिन मैं किसी पहाड़ी से गुजर रहा था। एक बड़ा विशाल बरगद का पेड़ खड़ा तलहटी की शोभा बढ़ा रहा था। उसे देखकर बड़ी प्रसन्नता हुई संसार में कैसे कैसे सामर्थ्यवान् लोग हैं, ऐसे लोग दूसरों का कितना हित करते हैं। इस तरह सोचता हुआ मैं आगे बढ़ गया।
कुछ दिन बीते उसी रास्ते से पुनः लौटना हुआ। जब उस पहाड़ी पर पहुँचा तो वहाँ वट वृक्ष न देखकर बड़ा विस्मय हुआ। ग्रामवासियों से पूछने पर पता चला कि दो दिन पहले तेज तूफान आया था, वृक्ष उसी में उखड़ कर लुढ़क गया। मैंने पूछा - "भाई वृक्ष तो बहुत मजबूत था फिर वह उखड़ कैसे गया।” उन्होंने बताया- "उसकी विशालता दिखावा मात्र थी। भीतर से तो वह खोखला था। खोखले लोग हल्के आघात भी सहन नहीं कर सकते।”
"तब से मैं बराबर सोचा करता हूँ कि जो बाहर से बलवान्, किन्तु भीतर से दुर्बल हैं, ऐसे लोग संसार में औरों का हित तो क्या कर सकते हैं, वे स्वयं अपना ही अस्तित्व सुरक्षित नहीं रख सकते। खोखले पेड़ की तरह एक ही झोंके में उखड़ कर गिर जाता है और फिर कभी ऊपर नहीं उठ पाता। जिसके पास भावनाओं का बल है, साहस की पूँजी है, जिसने मानसिक शक्तियों को, संसार की किसी भी परिस्थिति से मोर्चा लेने योग्य बना लिया है, उसे विपरीत परिस्थितियों से लड़ने में किसी प्रकार परेशानी अनुभव न होगी।
भीतर की शक्ति सूर्य की तेजस्विता के समान है जो घने बादलों को चीर कर भी अपनी शक्ति और अस्तित्व का परिचय देती है। हम में जब तक इस तरह की आन्तरिक शक्ति नहीं आयेगी, तब तक हम उस खोखले पेड़ की तरह ही उखड़ते रहेंगे, जो उस पहाड़ी पर उखड़ कर गिर पड़ा था।"
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति मई, 1969
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