Friday 07, February 2025
अवतार के समय देवता उसकी सहायता करने आते और देह धारण करते है। सामान्य मनुष्यों की मनःस्थिति नर पशुओं जैसी होती है वे पेट और प्रजनन के लिए मरते खपते हैं तथा लोभ, मोह अहंकार की लिप्साओं से बने कोल्हू में पिलते रहते हैं। यही उनकी प्रवृत्ति और नियति होती है।उनमें थोडा सा उत्साह तो भरा जा सकता है और एक सीमा तक प्रगतिशील भी बनाया जा सकता है किन्तु बहुत प्रयत्न करने पर भी वे देव भूमिका निभा सकने में सफल नहीं हो पाते। इसके लिए संचित संस्कारों की आवश्यकता है। खिलौने बालू के नहीं चिकनी मिट्टी के बनते हैं हथौड़े की चोट जंग लगे लोहे नहीं, फौलादी इस्पात ही सह पाते हैं।
युग सृजन के आरम्भिक चरण बाल-कक्ष जैसे हैं। उनमें हर स्तर के व्यक्ति के लिए कुछ न कुछ कर सकने योग्य-शत सूत्री कार्यक्रम बनाये गये हैं। जन आन्दोलन इसी प्रकार का होता है। गाँधी जी ने स्वतन्त्रता आन्दोलन को सर्व सुलभ बनाने की दृष्टि से नमन सत्याग्रह विदेशी वस्त्र एवं शराब की दुकानों पर धरना, प्रतिबन्ध उल्लंघन जैसे कार्यक्रम बनाये थे। वे व्यापक भी हुए थे इतने पर भी उस आन्दोलन का सूत्र संचालन कर सकने की क्षमता नेहरु, पटेल, जैसे मुट्ठी भर लोगों में ही थी, स्पष्ट है कि यदि उच्चस्तरीय हस्तियाँ बागडोर न सँभालतीं तो जेल आन्दोलन को उतनी जल्दी और उतनी आर्श्चयजनक सफलता न मिल पाती जैसी कि उसमें मिल सकी। महामानव ही किसी देश, समाज, या युग की वास्तविक सम्पदा होती है। प्रखर व्यक्तित्वों का कुशल नेतृत्व ही उफनती नदी में नाव खेतो और तूफानों से टकराते हुए जहाज को किनारे लगाता है।
युग सृजन के अनेक महत्वपूर्ण कामों में सबसे प्रमुख है-उस प्रयोजन को पूरा कर सकने में समर्थ क्षमताओं को ढूँढ़ निकालना और उन्हें प्रशिक्षित परिपक्व करना। यह कार्य धीमी गति से तो अभियान के प्रथम दिन से ही चल रहा है, पर अब उसमें अधिक तीव्रता लाने की आवश्यकता पड़ रही है। क्योंकि उत्तरदायित्व क्रमशः अधिक भारी होते चले जा रहे हैं। सामान्य भार वहन सामान्य क्षमता के सहारे भी होता रहता है। जब-जब अधिक उठाना अधिक ढोना एव अधिक दौड़ना हो तो वाहन तथा साधन उसी स्तर के जुटाने होंगे। आरंभिक चरण में जागृत आत्माओं से भी काम चलता रहा है, पर अब अधिक क्षमता सम्पन्नों की आवश्यकता पड़ रही है। अस्तु ढूँढ़ने का प्रयास अधिक सुविस्तृत किया जा रहा है।
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति- फरवरी 1980 पृष्ठ 46
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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! आज के दिव्य दर्शन 07 February 2025 !! !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
!! परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी का अमृत सन्देश !!
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
जो हमारे गुरुदेव ने आज से 60 वर्ष पहले हमारे घर पर आकर के दीक्षा दी और ये कहा कि तुम्हें मैं ऐसी गायत्री सिखाना चाहता हूं, जिसमें कि रिद्धियां और सिद्धियां प्रत्यक्ष हो। लोगों को शिकायत है कि हमने इतनी पूजा की, जाप किया, न हमारे हाथ कुछ लगा, न हमको शांति मिली, न कोई चमत्कार हम दिखा सके, न कोई और विशेषता मिली हमको। लेकिन हमारे गुरु ने कहा, "हम जो चीज देंगे, वह ऐसी चीज देंगे कि तू निहाल हो जाएगा।" बस उन्होंने वह गायत्री मंत्र दिया, जो कि मैंने अभी-अभी बोला है आपके सामने। लेकिन एक और बात कही उन्होंने कि बोना और काटने की बात को भूलना मत। कहीं से फोकट में नहीं मिलता, कोई गुरु हो, देवता हो, कोई भी क्यों न हो, फोकट में देने के लिए कोई भी रजामंद नहीं है। हां, यह हो सकता है कि बोया जाए और काटा जाए। बोने और काटने में बहुत फर्क पड़ता है। एक बीज मक्का का हम बोते हैं और उसमें 100 बीज का एक पैदा हो जाता है। बाजरे की बाल हम बोते हैं, एक बाजरा बोते हैं, उसमें 100 बाजरे, 100 से भी ज्यादा हो जाते होंगे, बहुत पैदा हो जाते हैं। यह बोने के बराबर है। बोना और काटने की विद्या को सीख, फोकट में मांगने की विद्या और किसी से हराम का खाने की विद्या को छोड़ दे। अच्छी बात है। अब आप बताइए, क्या करना पड़ेगा? उन्होंने यह कहा, "मुझे गायत्री मंत्र का सारा विधान भी बताया कि 24 साल में 24 गायत्री महापुरुष चरण करने पड़ेंगे। जौ की रोटी और छाछ के ऊपर रहना पड़ेगा।" जो कुछ उन्होंने बताया था, मैंने समझ लिया, नोट कर लिया और उसी की विधि पर लग गया। लेकिन यह एक नई बात थी, कौन सी? बोना और काटना, क्या बोया जाए और कहां बोया जाए? उन्होंने कहा, "भगवान के खेत में बोवो, और जो कुछ भी तेरे पास है, मेरे पास क्या है?" आप बताइए, उन्होंने कहा, "तीन चीजें भगवान की दी हुई हैं और एक चीज तेरी कमाई हुई है।" तीन चीजें भगवान की दी हुई—क्या शरीर भगवान ने दिया है? एक, बुद्धि भगवान ने दी है? दो, भावनाएं भगवान ने दी हैं? तीन। तीन शरीर हैं हमारे: सूक्ष्म, स्थूल और कारण। इनमें तीन चीजें भरी रहती हैं। जो हमारा स्थूल शरीर है, उसमें श्रम और समय है। सूक्ष्म शरीर, जो है, इसमें हमारे मन और बुद्धि हैं, और कारण शरीर में भावनाएं हैं।
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड-ज्योति से
उत्तराधिकार और प्रतिनिधित्व का प्रयोजन
वम्बर और दिसम्बर की अखण्ड-ज्योति में इसी स्तम्भ के अंतर्गत ‘प्रतिनिधियों की नियुक्ति’ वाली योजना छपी है। प्रसन्नता की बात है कि परिजनों ने उसे गम्भीरता-पूर्वक समझा और ग्रहण किया है। बात सचमुच ऐसी है भी कि उस पर विचार करना हर सदस्य के लिए आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी है।
‘अखण्ड-ज्योति’ छपे कागजों का व्यापार नहीं है। न उसके पाठक इस तरह के मनचले लोग ही है कि मनोरंजन के लिए, खाली समय काटने के लिये कुछ भी पढ़ते रहने की तरह इस पत्रिका को मँगाते हों। हमने विशेष प्रयत्न और मनोयोगपूर्वक पिछले पच्चीस वर्ष के परिश्रम से इस विशाल जनसमुद्र में से थोड़े से मोती चने हैं। वे ही अखण्ड-ज्योति के सदस्य हैं। जिनकी अन्तरात्मा में पूर्व जन्मों की संग्रहीत उत्कृष्टता मौजूद है, जिन्होंने इस जन्म में भी अपनी अन्तरात्मा को परिष्कृत किया है - जिनके सामने मानव-जीवन की महत्ता और उसकी सार्थकता का प्रश्न उपस्थित रहता है-ऐसे ही लोग इस परिवार के सदस्य बन सके हैं और इन प्रबुद्ध आत्माओं की अन्तःप्रेरणा को जागृत एवं समुन्नत बनाने के लिए एक उपयुक्त साधन के रूप में “अखण्ड-ज्योति” अपना अस्तित्व बनाये हुए है और इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिये वह जीवित है
जागृत आत्माओं का चुनाव
जागृत आत्माओं को ढूंढ़ने और संग्रह करने में हमको ‘अखण्ड-ज्योति’ के 25 वर्ष पूरे हो गये। अब उसे दूसरे कदम उठाने हैं। जिन विचारों का पिछले वर्षों में प्रचार किया जाता रहा है अब उन्हें मूर्त रूप देने के लिये ठोस गतिविधियाँ अपनानी हैं, और रचनात्मक कार्य खड़े करने हैं। यह सब हम अकेले ही न कर लेंगे, प्रस्तुत योजना की पूर्ति के लिए अनेक सहचरों का श्रम एवं मनोयोग आवश्यक होगा। ऐसे लोग कौन हो सकते हैं, यही चुनावक्रम इन दिनों चल रहा है। तीस हजार अखण्ड-ज्योति सदस्यों में से सभी इतने उत्साही और निष्ठावान नहीं हैं जिन पर इतना भार डाला जा सके कि वे इस मिशन को गतिशील बनाये रहने के लिये हमारी ही तरह कुछ करने के लिये कटिबद्ध हो जाएँ। यों परिवार के सभी परिजन, अखण्ड ज्योति के प्रायः सभी सदस्य अपनी आध्यात्मिक विशेषताओं से सम्पन्न हैं। पर बड़े उत्तरदायित्व संभालने की क्षमता हर किसी में नहीं हैं। बूढ़ा बाप, परिवार के बड़े लड़कों को गृह व्यवस्था चलाने का उत्तरदायित्व सौंपता है, इसको अर्थ यह नहीं कि घर के शेष सब लोगों का महत्व कम है। आगे चलकर छोटे बच्चे भी होनहार हो सकते हैं-वे बूढ़े बाप से भी अधिक योग्य सिद्ध हो सकते हैं, पर आज तो जो भी कंधे पर बोझ ढोने की क्षमता रखते होंगे, उन्हें ही कार्यभार सौंपा जाएगा
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति 1965 जनवरी
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