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Saturday 08, February 2025

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बच्चों! यह न समझना तुमसे, चली गयी मैं कोसों दूर। आँखें बंद करो-पाओगे, अपने को मुझ से भरपूर॥
जाना पड़ा-कि तन में रह कर, अर्जन थोड़ा होता था। यह आत्मा दुखती थी जब, कोई भी बच्चा रोता था॥
अब हम-सूक्ष्म लोक के वासी, खूब कमाकर भेजेंगे। तुम लाखों बच्चों का सुख, संसार सँवार सहेजेंगे॥
बस, तुम काम मिशन का करते रहो, तथा कहलाओ शूर॥ आपस में सब मिलकर रहना, कहीं दरार न आ पाये। प्यार बाँटने की परंपरा, इस माँ की ना मिट जाये॥
सब अपने हैं, घर अपना है, सब कुछ वत्स! तुम्हारा है। योग्य बन गयी संतति ऐसा, दृढ़ विश्वास हमारा है॥
है संतोष यही कि गलत कमलों में, नहीं भरा है नूर॥ हाँ मजबूरी थी, जाना था, हमको जन मंगल के हेतु। बनवाना रावण दलन को, था फिर से इस युग में सेतु॥
हमको भी कम नहीं वेदना है, बालको! बिछुड़ने की। पर न ठीक था बात व्यर्थ ही, महाकाल से लड़ने की॥
कर लो तुम भी यह संतोष कि, ले भागा कोई “अक्रूर”॥ किंतु कहाँ रह सकते हम, माधुर्य भाव का वृज तजकर। शाँतिकुँज में तथा तुम्हारे, हृदयों में हम रहे बिखर॥
कृष्ण कहाँ थे दूर गोपियों से, या मातृ यशोदा से। उनका प्राण वहीं था-पूछो, उस कदम्ब की छाया से॥ उसी प्राण को अमर कर गये, अग्रगण्य कवियों में-”सूर”॥
 अखण्ड ज्योति 1955 फरवरी

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परम पूज्य गुरुदेव का अन्तिम सन्देश | Param Pujay Gurudev Ka Antim Sandesh, Gurudev Last Message

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मीरा और भगवान एक अनोखा संबंध | Mira Aur Bhagwan Ka Anokha Sambandh

मीरा और भगवान एक अनोखा संबंध | Mira Aur Bhagwan Ka Anokha Sambandh

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प्रखर आंदोलन चलें | Prakhar Andolan Chalen |

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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन

गायत्री माता
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गायत्री माता - अखंड दीपक
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चरण पादुका
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चरण पादुका
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सजल श्रद्धा - प्रखर प्रज्ञा (समाधि स्थल)
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प्रज्ञेश्वर महादेव - देव संस्कृति विश्वविद्यालय
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शिव मंदिर - शांतिकुंज
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हनुमान मंदिर - शांतिकुंज
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आज का सद्चिंतन (बोर्ड)

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आज का सद्वाक्य

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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन


!! आज के दिव्य दर्शन 08 February 2025 !! !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!

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!! परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी का अमृत सन्देश !!

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परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश



यह सारा विश्व भगवान का खेत है। यह भगवान विराट है, विराट ब्रह्म इसको कहते हैं, जो कि अर्जुन को उन्होंने दिव्य चक्षु देकर दिखाया था। देख, यह विराट, यही मेरा रूप है, और मेरा कोई रूप नहीं है, नहीं है। अपना रूप दिखाइए, रूप कहां है? मेरा यही है, विराट रूप जो है। इसको तू देख, यही ब्रह्मांड है, यही उन्होंने यशोदा जी को दिखाया था। यशोदा जी एक बार कहने लगी, "यू तो हमने एक बार तप किया था कि हमारी गोदी में भगवान पैदा हुआ, तू तो बच्चा है और मिट्टी खाता फिरता है, भगवान ऐसे होते हैं?" उन्होंने मुंह खोल के दिखाया कि यह विराट, जो है, यह भगवान है। किसी आदमी को यह मन हो कि हम भगवान के साक्षात्कार करेंगे, दर्शन करेंगे, तो उसको यह विराट ब्रह्म को देखना चाहिए। यही बात रामचंद्र जी के बारे में भी हुई। कौशल्या, जो रामचंद्र जी पालने में झूल रहे थे, तब अपने मन में विचार करने लगी, "मैंने तो इसके लिए भगवान से प्रार्थना की थी कि मेरी गोदी में भगवान आए, यह तो बच्चा है, टट्टी करता है, पेशाब करता है, जैसे सब बालक होते हैं, वैसा होता है?" भगवान हंसे और उन्होंने विराट रूप दिखाया। "मां, तुम्हें अगर मेरा रूप देखने का हो तो विराट को देखना।" यही बात कागभुसुंडि जी के बारे में हुई। कागभुसुंडि जी ने सुना था कि भगवान ने जन्म ले लिया, अवतार ले लिया। तब वह अवतार लिए रामचंद्र जी के दर्शन करने आए, और वह रामचंद्र जी वैसे ही चावल खाते फिरते थे, भागते फिरते थे। "यह भगवान कैसे हो सकते हैं?" उन्होंने कागभुसुंडि जी के शंका समाधान करने के लिए इशारा विराट दिखाया और यह कहा, "यही मेरा रूप है। किसी को कभी देखने का हो मेरा रूप तो उसको मेरा विराट रूप देखना चाहिए, समस्त सृष्टि को देखना चाहिए।" और इसी समस्त सृष्टि के बारे में, जो कुछ भी करना हो, उसे भगवान के लिए करना चाहिए। जो पूजा करनी हो, समस्त सृष्टि की करनी चाहिए। यह ऐसा हुआ, बोना और उगाना। इसी में बोवो, भगवान के खेत में बोवो, अर्थात जन समाज की सेवा के लिए, जन समाज का कल्याण करने के लिए, जन समाज को ऊंचा उठाने के लिए, समुन्नत बनाने के लिए, सुसंस्कृत बनाने के लिए, जो तू कर सकता हो, कर। इन तीनों-चारों चीजों को जो तेरे पास है, लगा। यह सौ गुनी हो जाएंगी, और तू मालदार हो जाएगा, और रिद्धि-सिद्धि तेरे आगे-पीछे फिरेगी। 

 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
 

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अखण्ड-ज्योति से



उत्तराधिकार का पात्रत्व
 
अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों में से जिन विशिष्ट परिजनों का हम अपने उत्तराधिकारी के रूप में चुनाव कर रहे हैं, उनमें प्रमुख गुण यही होना चाहिए कि अपनी ही उलझनों तक सुलझे रहने में सीमित न रखकर “वसुधैव कुटुम्बकम्” की प्रवृत्ति को समुचित मात्रा में धारण किए हुए हों। घर का बड़ा वही कहलाता है जो अपने छोटे भाई बहिनों, अशक्त असमर्थों का भी पूरा ध्यान रखे। ऐसे ही गृहपति प्रशंसनीय कहे जाते हैं और वे ही उसे कुटुम्ब का ठीक तरह पालन पोषण कर सकने में समर्थ हो सकते हैं।

जो व्यक्ति अपनी निजी इच्छाओं, कामनाओं को ही सर्वोपरि स्थान देता हो और उतनी ही परिधि में सोचता विचारता हो, ऐसे स्वार्थी के हाथ में यदि बूढ़े पिता का उत्तरदायित्व आ जाय तो घर के छोटे लोगों को क्या प्रसन्नता होगी ? वे सब घाटे में ही रहेंगे और संकट में ही पड़ेंगे। बूढ़ा बाप भी इतना समझदार तो होता ही है कि जिसे अपना उत्तरदायित्व सौंपे, उसमें स्वार्थपरता की मात्रा कम ही होनी चाहिए।


उपासना की दृष्टि से कई लोग काफी बढ़े-चढ़े होते हैं। यह प्रसन्नता की बात है कि जहाँ दूसरे लोग भगवान् को बिल्कुल ही भूल बैठे हैं वहाँ वह व्यक्ति ईश्वर का स्मरण तो करता है, औरों से तो अच्छा है। इसी प्रकार जो बदमाशियों से बचा है, अनीति और अव्यवस्था नहीं फैलाता, संयम और मर्यादा में रहता है, वह भी भला है। उसे बुद्धिमान कहा जायगा क्योंकि दुर्बुद्धि को अपनाने से जो अगणित विपत्तियाँ उस पर टूटने वाली थीं, उनसे बच गया। स्वयं भी उद्विग्न नहीं हुआ और दूसरों को भी विक्षुब्ध न करने की भलमनसाहत बरतता रहा। यह दोनों ही बातें अच्छी हैं- ईश्वर का नाम लेना और भलमनसाहत से रहना एक अच्छे मनुष्य के लिये योग्य कार्य हैं। उतना तो हर समझदार आदमी को करना ही चाहिए था। जो उतना ही करता है उसकी उतनी तो प्रशंसा ही की जायगी कि उसने अनिवार्य कर्तव्यों की उपेक्षा नहीं की और दुष्ट दुरात्माओं की होने वाली दुर्गति से अपने को बचा लिया।

क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति 1965 जनवरी पृष्ठ 50

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