Sunday 09, February 2025
कुण्डलिनी ध्यान: शक्ति केंद्रों को जागृत करने की विधि | Kundalini Jagran
आस्तिकता का तत्त्वज्ञान एवं व्यवहारिक स्वरूप | Aastikata Ka Tatwagyan
गेटबिक एयरपोर्ट (लंदन) में माताजी का विदाई समारोह था। माताजी बैटरी चलित गाड़ी में बैठकर अंदर गईं। बाहर 500 परिजन खड़े देख रहे थे। माता जी गाड़ी में बैठी हुई थीं। चैकिंग के लिए ब्रिटिश महिला कैथेरीन आईं। सिर से लेकर पैर तक स्पर्श किया-कहीं कुछ है तो नहीं।
माताजी प्रसन्न थीं परिजनों की ओर पीछे उनका चेहरा था। परिजनों की ओर देखकर कैथेरीन की ओर इशारा किया। हमारे पास कुछ नहीं है (हाथ हिलाकर) हँसती हुईं। फिर जब सिर से टटोलती पैरों तक आई चरणों को स्पर्श किया तो माताजी का तो सहज स्वभाव था, जो चरण स्पर्श करे उनको आशीर्वाद देतीं थीं। सो दोनों हाथ कैथेरीन के सिर पर रखकर आशीर्वाद दे रही थीं।
कैथेरीन अचकचा गईं। आश्चर्य चकित थीं। परिजन कैथेरीन के भाग्य को सराह रहे थे, जगत् जननी स्वयं दोनों हाथ से आशीर्वाद दे रही हैं। काश ऐसा प्यार भरा आशीर्वाद मिलता।
इसके बाद माताजी अंदर चलीं गईं आँखों से ओझल हो गईं। बाद में कैथेरीन बाहर आईं एवं परिजनों से चर्चा की कि कौन थी जिनके लिए आप लोग आये। जब पूरा परिचय दिया गया तो अपने आपको धन्य मान रहीं थीं। अगली बार जब माता जी टोरेण्टो जाने एवं आने, लॉस ऐन्जिल्स से आते समय गेटबिक एयरपोर्ट पर उतरीं तो सबसे पहले चरण स्पर्श करने कैथेरीन आईं एवं आते जाते समय बिना चैकिंग किये हवाई जहाज तक छोड़ने के लिए जाया करती थीं। ऐसी थीं मानव मात्र के लिए आशीर्वाद लुटाने वाली माता जी।
अखण्ड ज्योति 1995 फरवरी
हमने भगवान को कैसे बनाया | Hamne Bhagwan Ko Kaise Banaya
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
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!! परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी का अमृत सन्देश !!
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
जो हमारे पास है, वह बोया जाए। क्या चीज है हमारे पास? मैंने देखा है शरीर है, निश्चय कर लिया, निश्चय कर लिया रात सोने के लिए होती है। रात को तो मैं सोता भी रहा हूं, और जो कुछ राम नाम मुझसे बना है, मैंने राम का नाम रात में लिया है। दिन में लिया नहीं, दिन में कभी नहीं लिया, दिन में मैंने कभी राम का नाम नहीं लिया। रात को सोते समय, सूरज डूबने से लेकर सूरज उदय होने तक, चारपाई पर पड़े हुए, अथवा कहीं भी, किसी भी हैसियत में, मैंने भगवान का नाम लिया है और बाकी समय भगवान के काम किया है। सूरज निकलने से सूरज अस्त होने तक, यह मेरा श्रम सारे समाज के लिए लगा, भगवान के लिए लगा। एक बुद्धि, बुद्धि भी उसी के लिए लगी, लोगों की अकल न जाने कहां-कहां फिरती रहती है। कोई मालदार बनता है, कोई महल बनाता है, कोई उन्नति करता है, कोई किसी से अपने बैर का बदला चुकाता है, जाने क्या-क्या आदमी के दिमाग में होती है। मेरे दिमाग में कोई बात नहीं आई, सिर्फ एक ही बात आई कि भगवान को भगवान के लिए हमारी अकल और हमारी बुद्धि का उपयोग किस तरीके से किया जा सकता है और कैसे करना चाहिए। बस, मैं यही विचार करता रहा। जो समस्याएं सामने थी समाज की, मेरे सामने, मेरी क्या समस्या होनी चाहिए? मैं क्या समस्या का करूंगा? मेरे पास क्या समस्या है, बताइए आप? रोटी खाना, कपड़े पहनना, इसमें कौन दिक्कत है? जब यह भिखारी को मिल जाता है, कोढ़ी को मिल जाता है, अपंग को मिल जाता है, तो मुझे क्यों नहीं मिलेगा? जब दो हाथ-पांव लिए बैठा हूं और मेहनत करता हूं, तो फिर मुझे यह क्यों न मिलेगा? मैंने अपना सारा का सारा मन भगवान के लिए लगाया।
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड-ज्योति से
अध्यात्म की प्रधान कसौटी
किन्तु किसी व्यक्ति की महानता के लिए इतना ही पर्याप्त नहीं है। महामानवों में एक अतिरिक्त गुण होता है और वह है परमार्थ। दूसरों को दुखी या अधःपतित देखकर जिसकी करुणा विचलित हो उठती है, जिसे औरों की पीड़ा अपनी पीड़ा की तरह कष्टकर लगती है, जिसे दूसरों के सुख में अपने सुख की आनन्दमयी अनुभूति होती है, वस्तुतः वही महामानव, देवता, ऋषि, सन्त, ब्राह्मण, अथवा ईश्वर-भक्त है। निष्ठुर व्यक्ति, जिसे अपनी खुदगर्जी के अतिरिक्त दूसरी बात सूझती ही नहीं, जो अपनी सुख सुविधा से आगे की बात सोच ही नहीं सकता ऐसा अभागा व्यक्ति निष्कृष्ट कोटि के जीव जन्तुओं की मनोभूमि का होने के कारण तात्विक दृष्टि से ‘नर-पशु’ ही गिना जायगा।
ऐसे नर-पशु कितना भजन करते हैं, कितना ब्रह्मचर्य रहते है, इसका कोई विशेष महत्व नहीं रह जाता। भावनाओं का दरिद्र व्यक्ति ईश्वर के दरबार में एक कोढ़ी कंगले का रूप बनाकर ही पहुँचेगा। उसे वहाँ क्या कोई मान मिलेगा ? भक्ति का भूखा, भावना का लोभी भगवान् केवल भक्त की उदात्त भावनाओं को परखता है और उन्हीं से रीझता है। माला और चन्दन, दर्शन और स्नान उसकी भक्ति के चिह्न नहीं, हृदय की विशालता और अन्तःकरण की करुणा ही किसी व्यक्ति के भावनाशील होने का प्रमाण है और ऐसे ही व्यक्ति को, केवल ऐसे ही व्यक्ति को ईश्वर के राज्य में प्रवेश पाने का अधिकार मिलता है।
हमें अपने परिवार में से अब ऐसे ही व्यक्ति ढूंढ़ने हैं जिन्होंने अध्यात्म का वास्तविक स्वरूप समझ लिया हो और जीवन की सार्थकता के लिए चुकाए जाने वाले मूल्य के बारे में जिन्होंने अपने भीतर आवश्यक साहस एकत्रित करना आरम्भ कर दिया हो। हम अपना उत्तराधिकार उन्हें ही सौंपेंगे। बेशक, धन-दौलत की दृष्टि को कुछ भी मिलने वाला नहीं है, हमारे अन्तःकरण में जलने वाली आग की एक चिंगारी ही उनके हिस्से में आवेगी पर वह इतनी अधिक मूल्यवान है कि उसे पाकर कोई भी व्यक्ति धन्य हो सकता है।
क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति 1965 जनवरी पृष्ठ 51
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