Monday 10, February 2025
2023_01_03_01.mp4
हम कितनी ही सेवा क्यों न करें, Ham Kitni Hi Seva Kyon Na Karen
युग संधि में जागृत आत्माओं को यही करना पड़ता है। समस्या 700 करोड़ मनुष्यों की है। वे एक स्थान पर नहीं समस्त भूमंडल पर बिखरे हुए बसे हैं। अनेक भाषा बोलते हैं। अनेक धर्म सम्प्रदायों का अनुसरण करते हैं। शासन पद्धतियों और सामाजिक परम्पराओं में भिन्नता है। मनःस्थिति और परिस्थिति में भी भारी अन्तर है। इतना होते हुए भी उन सबसे सर्म्पक साधना है। युग चेतना से परिचित और प्रभावित करना है।
इतना ही नहीं सर्म्पकै प्रशिक्षण और अनुरोध को इतना प्रभावी बनाना है जिसके दबाव में लोग अपनी आदतों, इच्छाओं और गतिविधियों में अभीष्ट परिवर्तन कर सकने के लिए हिम्मत ही नहीं तत्पर भर हो सकें। यह कार्य कहने सुनने में सरल प्रतीत हो सकता है। पर वस्तुतः उतना कठिन और जटिल है। ऐसा उत्तरदायित्व उठाने वालों को कैसा होना चाहिए उसका अनुमान लगाने पर यही कहना पड़ता है कि उनकी मजबूती-घहराती नदियों पर मीलों लम्बे पुल का-उस पर दौड़ने वाले वाहनों का बोझा उठा सकने वाले पायों जैसी होनी चाहिए।
आवश्यक नहीं कि हर व्यक्ति को समाज की संरचना के लिए आन्दोलन परक कार्य ही करना पड़े। वह क्षेत्र छोटा होता है और उसमें थोड़े से व्यक्ति ही खप सकते हैं।सृजन प्रोजन बहुत बड़ा है। उसके असंख्यों पक्ष है। उनमें से जो जिसे कर सके वह उसे सँभाले। कला, साहित्य, विज्ञान, उत्पादन, व्यवसाय, शिक्षा, स्वास्थ्य जैने अनेकों क्षेत्र ऐसे हैं जिनमें बिना अधिक जन-सर्म्पक साधे भी अभीष्ट प्रयोजनों में निरत रहा जा सकता है और आन्दोलनकारियों से भी अधिक महत्व का ऐसा कार्य किया जा सकता है जो नवयुग की आवश्यकता में अपने ढंग से पूरा करने में असाधारण योगदान कर सके। युद्ध जीतने में सभी को तलवार नहीं चलानी पड़ती। वे लोग भी द्वितीय पंक्ति के सैनिक ही हैं जो युद्ध सामग्री बनाते अथवा सैनिकों पर पड़ने वाले खर्च को अपने परिश्रम से जुटाते हैं।
आन्दोलकारियों-प्रचारकों की तरह ही वे लोग भी उपयोगी हैं जो उनके लिए साधन सामग्री जुटाने अथवा कार्य क्षेत्र बनाने में तत्पर रहते हैं। ऐसे लोगों का घर रह कर काम करना भी परिव्राजको की ही तरह महत्वपूर्ण कार्य है। हर व्यक्ति की मानसिक संरचना एवं परिस्थिति परिव्राजकों की भूमिका निभाने की नहीं होती। होती भी हो तो उस कार्य के लिए सीमित संख्या में ही सुयोग्य व्यक्ति चाहिए। अधिक सृजन शिल्पी तो अपने-अपने ढंगों के उत्तरदायित्व सँभालते हुए अपने निर्वाह की व्यवस्था चलाते हुए समन्वित प्रक्रिया अपनायेंगे और लक्ष्य की प्राप्ति में अपने ढंग का ऐसा योगदान करेंगे जिसकी महत्ता को किसी प्रकार कम सराहनीय नहीं कहा जा सकता। जन्म समय के आधार पर यह निर्धारण भी किया जाता हैं कि कौन प्रतिभा किस प्रयोजन में लगे, जिससे उसका साँसारिक निर्वाह भी चलता रहे। और युग सृजन में भागीदार बनने का सौभाग्य भी मिलता रहे।
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति- फरवरी 1980 पृष्ठ 47
"बुद्ध और महावीर का रहस्यमय संवाद | अंतर की यात्रा का अनमोल रहस्य | Dr. Chinmay Pandaya Ji
संयम बनाम असंयम: तीर्थंकर महावीर का गहरा जीवन संदेश | जीवन बदलने का रहस्य" | Motional Story
महान व्यक्ति बनने के लिए कर्मयोगी बनें | कर्म करो—कर्मयोगी बनो Part 02
अपने आप को प्रोत्साहित कैसे करें?, Apne Aap Ko Protsahit Kaise Karen | समस्या का समाधान ऋषि चिंतन से
रामकृष्ण परमहंस की चमत्कारी घटना | Ramkrishan Paramhans Ki Chmatkari Ghatna
सेवा का सबसे बड़ा अधिकारी - हमारा मन | अपना सुधार-संसार की सबसे बड़ी सेवा
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! आज के दिव्य दर्शन 10 February 2025 !! !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
!! परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी का अमृत सन्देश !!
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
साधना, उपासना के बाद में आराधना एक और करनी पड़ती है। बस, अब यह आराधना मैं समझा रहा हूं आपको। आराधना माने भगवान के लिए देना, समाज के लिए देना, समाज के खेत में बोना। इसी की बात मैं करता हूं। क्या मुझे पाया? मैंने बहुत पाया है। शरीर, शरीर के बारे में मैंने बहुत पाया है। शरीर को 75 वर्ष में कौन जिंदा रहता है? आजकल मर-मरा करके 50-60 वर्ष के होते हैं, किसी का हार्ट फेल हो गया, किसी को क्या हो गया, रोज़ अखबार पढ़ते हैं, यह नेता मर गए, यह मर गए। फिर मैं यह देखता हूं कि क्या वर्ष की उम्र थी? 60 वर्ष से ज्यादा शायद ही कोई हो पाता हो, 50 वर्ष में ही खत्म हो गया। लेकिन मेरी 75 साल की उम्र में काया ज्यों की त्यों मौजूद है। कमजोर हो गई? नहीं, कमजोर नहीं हो गई। अगर कमजोर हो गई होती, तो फिर कैसे छवि बर्दाश्त करती? बताइए। और तब फिर यह अगर काया कमजोर हो गई होती, तो पिस्तौल की गोलियों से क्यों नहीं छेद इसमें हो जाते? नहीं, अभी कोई नहीं। मैं बराबर काम करता हूं, 12 घंटे पहले भी करता था और 12 घंटे अभी भी काम कर लेता हूं। 75 साल में मेरे काम करने की शक्ति और क्षमता में जरा भर भी राई की नोक के बराबर भी कमी नहीं हो पाई है। यह क्या हो गया? यह मेरे शरीर की मजबूती हो गई। लोग कहते रहते हैं, "लोहे का शरीर है!" स्टालिन को कहते थे, "लोहे का शरीर है!" और पटेल को कहते थे, "लोह पुरुष हैं!" वह तो होंगे ही, यह तो मैं कहता नहीं होंगे, पर मुझे भी आप लोहे का पुरुष ही मानिए। पिस्तौल की गोलियों को कौन बर्दाश्त करता है? क्षणों की मारामार, मारामार, जिस पर लगे चोटें और ज्यों का त्यों बैठा रहे। ऐसा कहीं होता है क्या? यह हमारा लोहे का शरीर है और यह लोहे का ही रहेगा। जब तक हम मरेंगे, तब तक लोहे के ही शरीर में लेकर मरेंगे। मिट्टी के शरीर में हमको मरना न पसंद है, और मिट्टी के शरीर में हमको कभी नहीं मरना पड़ेगा। और चीज, हमारा मन और हमारी बुद्धि। हमारी बुद्धि बड़ी है, हमारी बहुत बुद्धि है, बहुत पैनी बुद्धि है। इतनी बुद्धि कि जितनी बुद्धि शायद ही आज तक किसी की हो। बहुत पैनी बुद्धि है। चारों वेदों के हमने भाष्य किए हैं, 18 पुराणों का भाष्य करने में केवल व्यास जी को 100 वर्ष हो गए, उन्होंने काम किया। और हमने भी जाने कितने कर डाले। सारे ऋषियों ने जितना भी मिलकर के काम किया था, वह सब काम कर डाला। नया युग बनाने का प्लानिंग करते हैं हम अकेले।
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड-ज्योति से
जिनकी दृष्टि से विराट् ब्रह्म की उपासना का वास्तविक स्वरूप विश्व-मानव की सेवा के रूप में आ गया हों वे हमारी कसौटी पर खरे उतरेंगे। जिनके मन में अपनी शक्ति सामर्थ्य का एक अंश पीड़ित मानवता को ऊँचा उठाने के लिये लगाने की भावना उठने लगी हो उन्हीं के बारे में ऐसा सोचा जा सकता है कि मानवीय श्रेष्ठता की एक किरण उनके भीतर जगमगाई है। ऐसे ही प्रकाश पुँज व्यक्ति संसार के देवताओं में गिने जाने योग्य होते हैं। उन्हीं के व्यक्तित्व का प्रकाश मानव-जाति के लिये मार्ग-दर्शक बनता हैं। उन्हीं का नाम इतिहास के पृष्ठों पर अजर अमर बना हुआ हैं।
प्रतिनिधियों के चुनाव में हम अपने परिवार में से इन्हीं विशेषताओं से युक्त आत्माओं की खोज कर रहे हैं। हमारे गुरुदेव ने हमें इसी कसौटी पर कसा और जब यह विश्वास कर लिया कि प्राप्त हुई आध्यात्मिक उपलब्धियों का उपयोग यह व्यक्ति लोक कल्याण में ही करेगा तब उन्होंने अपनी अजस्र ममता हमारे ऊपर उड़ेली और अपनी गाढ़ी कमाई का एक अंश प्रदान किया। वैसा ही पात्रत्व का अंश उन लोगों में होना चाहिए जो हमारे उत्तराधिकारी का भार ग्रहण करें।
उपहासास्पद ओछे दृष्टिकोण-
यों ऐसे भी लोग हमारे संपर्क में आते हैं जो ऋद्धि-सिद्धि प्राप्त करने के लिए कुण्डलिनी जागरण, चक्र जागरण और न जाने क्या-क्या आध्यात्मिक लाभ चुटकी मारते प्राप्त करने के लिए अपनी अधीरता व्यक्त करते हैं। ऐसे लोग भी कम नहीं जो ईश्वर दर्शन से कम तो कुछ चाहते ही नहीं और वह भी चन्द घण्टों या मिनटों में। भौतिक दृष्टि से अगणित प्रकार के लाभ प्राप्त करने के लिए लालायित, अपनी दरिद्रता और विपन्न स्थिति से छुटकारा पाने की कामना से इधर-उधर भटकते लोग भी कभी-कभी मन्त्र-तन्त्र की तलाश में इधर आ निकलते हैं। इन दीन दुखियों की जो सहायता बन पड़ती है वह होती भी है। इस कटौती पर इस प्रकार के लोग खोटे सिक्के ही माने जा सकते है। अध्यात्म की चर्चा वे करते हैं पर पृष्ठभूमि तो उसकी होती नहीं।
ऐसी स्थिति में कोई काम की वस्तु उनके हाथ लग भी नहीं पाती, पवित्रता रहित लालची व्यक्ति जैसे अनेक मनोरथों का पोट सिर पर बाँधे यहाँ वहाँ भटकते रहते हैं, ठीक वही स्थिति उनकी भी होती है। मोती वाली सीप में ही स्वाति बूँद का पड़ना मोती उत्पन्न करता है। अन्य सीपें स्वाति बूँदों का कोई लाभ नहीं उठा पातीं। उदात्त आत्माएँ ही अध्यात्म का लाभ लेती हैं। उन्हें ही ईश्वर का अनुग्रह उपलब्ध होता हैं। और उस उदात्त अधिकारी मनो-भूमि की एकमात्र परख है मनुष्यत्त्व में करुणा विगलित एवं परमार्थी होना। जिसके अंतःकरण में यह तत्व नहीं जगा, उसे कोल्हू के बैल तरह साधना पथ का पथिक तो कहा जा सकता है पर उसे मिलने वाली उपलब्धियों के बारे में निराशा ही व्यक्त की जा सकती है।
अखण्ड-ज्योति परिवार में पचास सौ ऐसे व्यक्ति भी आ फँसते है जो पत्रिका को कोई जादू, मनोरंजन आदि समझते हैं, कोई आचार्यजी को प्रसन्न करने के लिए दान स्वरूप खर्च करके उसे मँगा लेते हैं। विचारों की श्रेष्ठता और शक्ति की महत्ता से अपरिचित होने के कारण वे उसे पढ़ते भी नहीं। ऐसे ही लोग आर्थिक तंगी, पढ़ने की फुरसत न मिलने आदि का बहाना बना कर उसे मँगाना बन्द करते रहते है। यह वर्ग बहुत ही छोटा होता हैं, इसलिए उसे एक कौतूहल की वस्तु मात्र ही समझ लिया जाता है। अधिकाँश पाठक ऐसे है जो विचारों की शक्ति को समझते हैं और एक दो दिन भी पत्रिका लेट पहुँचे तो विचलित हो उठते हैं। न पहुँचने की शिकायत तार से देते हैं। ऐसे लोगों को ही हम अपना सच्चा परिजन समझते हैं। जिनने विचारों का मूल समझ लिया केवल वे ही लोग इस कठिन पथ पर बढ़ चलने में समर्थ हो सकेंगे। जिन्हें विचार व्यर्थ मालूम पड़ते हैं और एक-दो माला फेर कर आकाश के तारे तोड़ना चाहते हैं उनकी बाल-बुद्धि पर खेद ही अनुभव किया जा सकता है।
क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति 1965 जनवरी पृष्ठ 52
| Newer Post | Home | Older Post |
