Tuesday 11, February 2025
जाओ करो नहीं आओ करो | Jao Karo Nahi Aao Karo | Sansmaran Jo Bhulaye Na Ja Sake
बाधाओं का स्वागत कीजिये, Badhaon Ka Svagat Kijiye
"सुख-दुःख का रहस्य: परिस्थितियाँ नहीं, आपका मन ही वास्तविक कारण है!" ।
भक्तों को भगवन मिलते है, सत्य प्रेम के भाव से |
मुझे भगवान के दर्शन हो गये और मेरी जिंदगी बदल गई | अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य
सच्चे शिष्य बनने के लिए गुरु कृपा का अनमोल सूत्र है सबसे बेहतर विकल्प?
ऐसे जागरुकों को युग प्रयोजनों के सही रुप में कर सकने की क्षमता एवं कुशलता विकसित करने की आवश्यकता अनुभव की गई। इसके लिए प्रशिक्षण आवश्यकता थी। बिना ट्रेनिंग पाये कोई महत्वपूर्ण कार्य किसी से भी नहीं बन पड़ता। रेल, मोटर आदि वाहन कल कारखाने के संयंत्र यहाँ तक कि टाइप राइटर जैसे छोटे उपकरणों को चलाने के लिए ट्रेनिंग लेनी पड़ती है।
अध्यापक, सैनिक, शिल्पी, कलाकार बिना प्रशिक्षण पाये शक्ति सामर्थ्य होते हुए भी अपना कार्य सफलता पूर्वक नहीं कर सकते। फिर युग सृजन जैसा काम ही हर कोई कैसे कर लेता? युग शिक्षण के लिए आवश्यकता तंत्र खड़ा किया गया है। गायत्री तपोभूमि से युग साहित्य का सृजन हो रहा है और शान्ति कुँज में युगान्तरीय चेतना को क्रियात्मिक करने का समग्र शिक्षण विधिवत् चल रहा है। रचनात्मक और सुधारात्मक कार्यक्रम सन्तोषजनक ढंग से चल रहे हैं और उनका गति चक्र निरन्तर दु्रतगामी बन रहा है।
इतने पर भी एक आवश्यकता यथावत् बनी हुई है देव आत्माओं में पायी जाने वाली विशिष्टता का अवतरण विशिष्ट समय पर ऐसी ही विशिष्ट आत्माओं का अवतरण होता है। वे जन्म जात रुप से ऐसी धातु से बने होते हैं कि उनका उपयोग विशेष प्रयोजनों के लिए संभव हो सके। अणु शक्ति उत्पन्न करने के लिए यूरेनियम जैसे रासायनिक पदाथों की जरुरत पड़ती है। सोने की अपनी मौलिक विशेषता है। र्स्वणकार उसे आभूषणों में गढ़ तो सकता है पर कृत्रिम सोना अभी तक बनाया नहीं जा सका।
यों नकली नग ही जेवरों में प्रयुक्त होते हैं, पर उनका निर्माण भी बहुत होता है फिर भी असली मणि-मणिक अभी भी विशेषता के कारण अपना मूल्य और महत्व यथा स्थान बनाये हुए हैं। महामानवों की ढलाई, गढ़ाई के लिए शान्ति कुँज की फैक्टरी अनवरत तत्परता के साथ लगी हुई है। उसके उत्पादन का स्तर भी बढ़ रहा है और परिमाण भी। इस प्रगति को सन्तोषजनक रहते हुए भी उत्साहवर्धक नहीं कहा जा सकता। उस विशिष्टता की मात्रा अभी भी कम ही दृष्टिगोचर हो रही है जिसे देव स्तर की प्रतिभा कहा जाय। जो महामानवों की भूमिका निभा सकने के लिए अभीष्ट सुसंस्कारिता की पूँजी अपने साथ लेकर जन्मी हो।
कृषि कार्य में किसान का पुरुषार्थ ही सब कुछ नहीं है, उपयुक्त भूमि और सही बीज का भी उसकी सफलता में कम योगदान नहीं होता। शिल्पियों की कुशलता कितनी ही बढ़ी चढ़ी क्यों न हों उन्हें भी उपयुक्त उपकरण चाहिए। कच्चा माल सही न हो तो कारखाने में बढ़िया चीज कैसे बनायें ? बालू से कोई कुम्हार टिकाउ बर्तन नहीं बना सकता। चिकित्सकों के उपचार रोगी की जीवनी शक्ति के आधार पर सफल होते हैं। कच्चे लोहे की तलवार से मोर्चा जीतना बलिष्ठ योद्धा के लिए सम्भव नहीं होता।
मौलिक विशिष्टता की अपनी आवश्यकता है। खरादा तो उसी को जा सकता है जिसमें अपनी कड़क हो। तेल तिली में से निकलता है, आग ईंधन के सहारे जलती है। तिली का प्रबन्ध न हो तो बालू से तेल निकालने में कोल्हू कैसे सफल हो ? पानी मथने के लिए कितना ही श्रम क्यों न किया जाय मक्खन निकालने में सफलता न मिलेगी। ईंधन के बिना आग की लपटों का दर्शन होने और अभीष्ट गर्मी उत्पन्न करने का प्रयोजन नहीं ही सध सकता।
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति- फरवरी 1980 पृष्ठ 49
आरती श्री सद्गुरु चरणन | Aarti Shri Guru Charnan Ki
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युग परिवर्तन के लिए विचार क्रांति | Vichraon Ki Apar Shakti | Yug Parivartan Ke Liye Vichar Kranti
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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! आज के दिव्य दर्शन 11 February 2025 !! !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
!! परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी का अमृत सन्देश !!
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
आपको कभी-कभी दुनिया में शानदार दिमाग देखने हो, तो आप हमारा दिमाग देखना। हमारा बहुत तीखा और बड़ा, बड़ा पैना और बड़ा गंभीर, बड़ा तेजस्वी दिमाग है। और क्या पाया आपने? आपने भाव संवेदनाएं। हमने बहुत प्यार किया है, प्यार खरीदा है और प्यार बेचा है। प्यार के हम तिजारती हैं, प्यार के सौदागर। आप समझना, हमने और कुछ किया ही नहीं है, प्यार ही खरीदते रहे, प्यार भी बांटते रहे, प्यार ही जमा करते रहे, प्यार की ही दौलत हमारे पास है। फिर, फिर आपको क्या मिला? हमको बहुत मिला। जहां कहीं भी हम गए, हमने देखा कि लोग कितना प्यार करते हैं। यहां भी कितना प्यार करते हैं। लोग आते हैं और यह कहते हैं कि गुरु जी के दर्शन मिल जाते तो कैसा अच्छा होता। क्या वजह है? क्या वजह है जो गुरु जी के शक्ल में? क्या बात है खास? कोई खास बात तो नहीं है, ऐसे ही लोग-बाग देखने के लिए आतुर रहते हैं, क्योंकि उनका प्यार, उनकी मोहब्बत, उनका यह सारे के सारे चीजें हमारे लिए इतनी सुरक्षित हैं कि लाखों आदमियों का प्यार हमने पाया है। गांधी जी ने पाया था, गांधी जी ने भी पाया था जरूर, लेकिन हमने भी कम प्यार नहीं पाया है। अपनी जिंदगी में, मरने के बाद तो कई आदमियों को लोग प्यार करते रहते हैं। भगवान बुद्ध की पूजा करते हैं, सामने तो लोगों ने नहीं की। कृष्ण भगवान को सामने तो गालियां दी, पीछे से ही कृष्ण भगवान की आरती उतारते हैं, लेकिन हमारे जिंदगी में कोई आरती उतारेगा कि नहीं, मालूम नहीं। कोई हमको याद करेगा कि नहीं करेगा, लेकिन इस जिंदगी में हमको इतने लोगों ने याद किया और इतना प्यार किया है कि हम ही जानते हैं। और हमारा धन, हमने तो नहीं कमाया था, पहले जन्म का कमाया हुआ रहा होगा, कोई और पहले जन्म का रहा हो करके पिताजी के मार्फत हमको मिला। हमने वह सब खर्च कर डाला। कैसे-कैसे खर्च किया? वह हमने इस तरीके से खर्च किया कि जो जमीदारियों समाप्त हुई, जमीदारी की जो बॉन्ड आए, उन बॉन्डों से गायत्री तपोभूमि के निर्माण करने के लिए सारा पैसा लगा दिया। हमारी बीवी के पास 60-65 तोले सोना था, यह भी उनसे कहकर के, "तुम क्या करोगी?" उनको बेचकर के वह भी गायत्री तपोभूमि के निर्माण में लगा दिया। इसके बाद, जमीदारियों का समापन खत्म हो गया। जो किसानों के पास खुद काश्त की ज़मीनें थीं, वह रह गईं। 80 बीघे ज़मीन हमारे पास रह गई। और 80 बीघे ज़मीन जब हम वहां छोड़ कर के अपने बाहर चलने लगे, तो हमने उस ज़मीन को अपने खानदान वालों को देने के बजाय, लड़के-लड़कियों को देने के बजाय, 80 बीघा ज़मीन, उस ज़माने में भी बहुत दाम की होती थी। और अब तो बेहद दाम की होती है। उस ज़माने में ₹5000 रुपया बीघे का था उसका भाव, और अब तो सोचता हूं, शायद ₹50000 रुपए बीघे का होगा, ₹40000 का होगा, मालूम नहीं। लेकिन उस ज़माने में ₹5000 रुपए का बीघा था, ₹400000 रुपए की थी, अब शायद ₹4000000 रुपए की। लेकिन वह, उसकी हमने गांव में हायर सेकेंडरी स्कूल बना दिया। बहुत शानदार स्कूल है। कभी आपको जाने का जी हो तो आप जरूर जाना और उसको देखना।
अखण्ड-ज्योति से
परीक्षा की वेला आ गई-
हम अपना उत्तरदायित्व उन कन्धों पर सौंपने जा रहे है जो उसके लिए उपयुक्त हों। युग परिवर्तन की इस सन्धि वेला में आध्यात्मिक व्यक्तियों पर ही सबसे बड़ी जिम्मेदारी आई है। वे उसे पूरा करने में प्रमाद बरतेंगे तो ईश्वर उन्हें कभी क्षमा न करेगा। स्वर्ग, मुक्ति, ऋद्धि, सिद्धि साक्षात्कार, कुण्डलिनी एवं लौकिक सुख-सुविधाओं के लिए नहीं इन दिनों हर सच्चे अध्यात्मवादी की साधना देशधर्म, समाज एवं संस्कृति के पुनरुत्थान के लिए होनी चाहिए। उसी के उपयुक्त अपने विचारों और कार्यक्रमों को ढालने के लिए हर आध्यात्मिक व्यक्ति को कटिबद्ध होना चाहिए।
साल में एक बार छात्रों की परीक्षा होती है, उस पर उनके आगामी वर्ष का आधार बनता है। प्रबुद्ध आत्माओं की परीक्षा का भी कभी-कभी समय आया करता है। त्रेता में दूसरे लोग कायरताग्रस्त हो चुप हो बैठे थे, तब रीछ बन्दरों ने वह परीक्षा उत्तीर्ण की थी। द्वापर में पाँच पाण्डवों ने भगवान का मनोरथ पूरा किया था। पिछले दिनों गुरु गोविन्दसिंह के साथी सिखों ने और समर्थ गुरु रामदास के शिवाजी आदि मराठा शिष्यों ने ईश्वर भक्ति की परीक्षा उत्तीर्ण की थी। गायत्री की पुकार पर भी कितनों ने ही अपनी श्रेष्ठता का परिचय दिया था। नव-निर्माण की ऐतिहासिक वेला में अब फिर प्रबुद्ध तेजस्वी, जागृत और उदात्त आध्यात्मिक भूमिका वाले ईश्वर भक्तों की पुकार हुई है।
समय आने पर दूध पीने वाले मजनुओं की तरह हमें आंखें नहीं चुरानी चाहिए। यह समय ईश्वर से नाना प्रकार के मनोरथ पूरे करने के लिए अनुनय विनय करने का नहीं, वरन् उसकी परीक्षा कसौटी पर चढ़कर खरे उतरने का है। युग की पुकार ईश्वर की इच्छा का ही सन्देश लेकर आई है। माँगने की अपेक्षा देने का प्रश्न सामने उपस्थित किया है और अपनी भक्ति एवं आध्यात्मिकता को खरी सिद्ध करने की चुनौती प्रस्तुत की है। इस विषम बेला में हमें विचलित नहीं होना है वरन् श्रद्धापूर्वक आगे बढ़ना है।
जिनमें साहस हो आगे आवें-
हमारा निज का कुछ भी कार्य या प्रयोजन नहीं है। मानवता का पुनरुत्थान होने जा रहा है। ईश्वर उसे पूरा करने वाले हैं। दिव्य आत्माएँ उसी दिशा में कार्य कर भी रही हैं। उज्ज्वल भविष्य की आत्मा उदय हो रही है, पुण्य प्रभाव का उदय होना सुनिश्चित है। हम चाहे तो उसका श्रेय ले सकते हैं और अपने आपको यशस्वी बना सकते हैं। देश को स्वाधीनता मिली, उसमें योगदान देने वाले अमर हो गये। यदि वे नहीं भी आगे आते तो भी स्वराज्य तो आता ही वे बेचारे और अभागे मात्र बनकर रह जाते। ठीक वैसा ही अवसर अब है। बौद्धिक, नैतिक एवं सामाजिक क्रान्ति अवश्यम्भावी है। उसका मोर्चा राजनैतिक लोग नहीं धार्मिक कार्यकर्त्ता संभालेंगे। यह प्रक्रिया युग-निर्माण योजना के रूप में आरम्भ हुई है। हम चाहते हैं इसके संचालन का भार मजबूत हाथों में चला जाए। ऐसे लोग अपने परिवार में जितने भी हों, जो भी हों, जहाँ भी हों, एकत्रित हो जाएँ और अपना काम सँभाल लें। उत्तर-दायित्व सौंपने की, प्रतिनिधि नियुक्त करने की योजना के पीछे हमारा यही उद्देश्य है।
समाप्त
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति 1965 जनवरी पृष्ठ 53
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