Tuesday 11, February 2025
शुक्ल पक्ष पूर्णिमा, माघ 2025
पंचांग 12/02/2025 • February 12, 2025
माघ शुक्ल पक्ष पूर्णिमा, पिंगल संवत्सर विक्रम संवत 2081, शक संवत 1946 (क्रोधी संवत्सर), माघ | पूर्णिमा तिथि 07:23 PM तक उपरांत प्रतिपदा | नक्षत्र आश्लेषा 07:35 PM तक उपरांत मघा | सौभाग्य योग 08:06 AM तक, उसके बाद शोभन योग | करण विष्टि 07:05 AM तक, बाद बव 07:23 PM तक, बाद बालव |
फरवरी 12 बुधवार को राहु 12:31 PM से 01:53 PM तक है | 07:35 PM तक चन्द्रमा कर्क उपरांत सिंह राशि पर संचार करेगा |
सूर्योदय 7:03 AM सूर्यास्त 5:59 PM चन्द्रोदय 5:53 PM चन्द्रास्त 7:29 AM अयन उत्तरायण द्रिक ऋतु शिशिर
- विक्रम संवत - 2081, पिंगल
- शक सम्वत - 1946, क्रोधी
- पूर्णिमांत - माघ
- अमांत - माघ
तिथि
- शुक्ल पक्ष पूर्णिमा
- Feb 11 06:55 PM – Feb 12 07:23 PM - कृष्ण पक्ष प्रतिपदा
- Feb 12 07:23 PM – Feb 13 08:22 PM
नक्षत्र
- आश्लेषा - Feb 11 06:34 PM – Feb 12 07:35 PM
- मघा - Feb 12 07:35 PM – Feb 13 09:07 PM
SHRAVAN
मन को साधो सुधारो, Man ko Sadho Sudharon
यों ऐसे भी लोग हमारे संपर्क में आते हैं जो ऋद्धि-सिद्धि प्राप्त करने के लिए कुण्डलिनी जागरण, चक्र जागरण और न जाने क्या-क्या आध्यात्मिक लाभ चुटकी मारते प्राप्त करने के लिए अपनी अधीरता व्यक्त करते हैं। ऐसे लोग भी कम नहीं जो ईश्वर दर्शन से कम तो कुछ चाहते ही नहीं और वह भी चन्द घण्टों या मिनटों में। भौतिक दृष्टि से अगणित प्रकार के लाभ प्राप्त करने के लिए लालायित, अपनी दरिद्रता और विपन्न स्थिति से छुटकारा पाने की कामना से इधर¬-उधर भटकते लोग भी कभी-कभी मन्त्र-तन्त्र की तलाश में इधर आ निकलते हैं। इन दीन दुखियों की जो सहायता बन पड़ती है वह होती भी है।
इस कटौती पर इस प्रकार के लोग खोटे सिक्के ही माने जा सकते है। अध्यात्म की चर्चा वे करते हैं पर पृष्ठभूमि तो उसकी होती नहीं। ऐसी स्थिति में कोई काम की वस्तु उनके हाथ लग भी नहीं पाती, पवित्रता रहित लालची व्यक्ति जैसे अनेक मनोरथों का पोट सिर पर बाँधे यहाँ वहाँ भटकते रहते हैं, ठीक वही स्थिति उनकी भी होती है। मोती वाली सीप में ही स्वाति बूँद का पड़ना मोती उत्पन्न करता है। अन्य सीपें स्वाति बूँदों का कोई लाभ नहीं उठा पातीं। उदात्त आत्माएँ ही अध्यात्म का लाभ लेती हैं। उन्हें ही ईश्वर का अनुग्रह उपलब्ध होता हैं। और उस उदात्त अधिकारी मनो-भूमि की एकमात्र परख है मनुष्यत्त्व में करुणा विगलित एवं परमार्थी होना। जिसके अंतःकरण में यह तत्व नहीं जगा, उसे कोल्हू के बैल तरह साधना पथ का पथिक तो कहा जा सकता है पर उसे मिलने वाली उपलब्धियों के बारे में निराशा ही व्यक्त की जा सकती है।
अखण्ड-ज्योति परिवार में पचास सौ ऐसे व्यक्ति भी आ फँसते है जो पत्रिका को कोई जादू, मनोरंजन आदि समझते हैं, कोई आचार्यजी को प्रसन्न करने के लिए दान स्वरूप खर्च करके उसे मँगा लेते हैं। विचारों की श्रेष्ठता और शक्ति की महत्ता से अपरिचित होने के कारण वे उसे पढ़ते भी नहीं। ऐसे ही लोग आर्थिक तंगी, पढ़ने की फुरसत न मिलने आदि का बहाना बना कर उसे मँगाना बन्द करते रहते है। यह वर्ग बहुत ही छोटा होता हैं, इसलिए उसे एक कौतूहल की वस्तु मात्र ही समझ लिया जाता है।
अधिकाँश पाठक ऐसे है जो विचारों की शक्ति को समझते हैं और एक दो दिन भी पत्रिका लेट पहुँचे तो विचलित हो उठते हैं। न पहुँचने की शिकायत तार से देते हैं। ऐसे लोगों को ही हम अपना सच्चा परिजन समझते हैं। जिनने विचारों का मूल समझ लिया केवल वे ही लोग इस कठिन पथ पर बढ़ चलने में समर्थ हो सकेंगे। जिन्हें विचार व्यर्थ मालूम पड़ते हैं और एक-दो माला फेर कर आकाश के तारे तोड़ना चाहते हैं उनकी बाल-बुद्धि पर खेद ही अनुभव किया जा सकता है।
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति जनवरी 1965 पृष्ठ 52
एक बार मेढ़कों को अपने समाज की अनुशासन हीनता पर बहुत खेद हुआ और वे शंकर भगवान के पास एक राजा भेजने की प्रार्थना लेकर पहुँचे। प्रार्थना स्वीकृत हो गई और शिवाजी ने नन्दी को राजा बनाकर भेज दिया। मेंढक इधर उधर निःशंक भाव से कूदते फाँदते से नन्दी के पैरों से दब कर कुचलने लगे। मेढ़कों को ऐसा राजा पसन्द नहीं आया फिर वे शिवलोक पहुँचे और पुराना हटाकर नया राजा भेजने का अनुरोध करने लगे। यह प्रार्थना स्वीकार कर ली गई। नन्दी वापस बुला लिया गया। अब की बार अपने गले का सर्प शासक बनाकर भेजा। उसे जब भी भूख लगती वह मेढ़कों को पकड़ कर खा जाता। इस नई विपत्ति से मेढक बहुत दुखी हुए और भगवान के पास जाकर शिकायत करने लगे।
शिवाजी ने गम्भीर होकर कहा पहले मैंने अपना वाहन नन्दी भेजा फिर सर्प भेजा इस तरह शासक बदलने से कोई लाभ होने वाला नहीं है। शासन से बड़ी बड़ी आशाएँ अपेक्षाएँ रखने की अपेक्षा स्वयं अनुशासित रहना सीखते तो ज्यादा अच्छा। यह सुनकर बेचारे अपने प्रबंध में जुट गये। हम भी शासन का मुँह अधिक ताकते हैं आत्मावलम्बन पर निर्भर नहीं रहते।
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
शरीर का ही नहीं- आत्मा का भी ध्यान रखें | Sharir ka hi Nhi aatma Ka Bhi Dhyan Raken
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क्या असली गुरु का दर्शन संभव है ? | Is it possible to have a vision of the true Guru?
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! आज के दिव्य दर्शन 12 February 2025 !! !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
!! परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी का अमृत सन्देश !!
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
आपको कभी-कभी दुनिया में शानदार दिमाग देखने हो, तो आप हमारा दिमाग देखना। हमारा बहुत तीखा और बड़ा, बड़ा पैना और बड़ा गंभीर, बड़ा तेजस्वी दिमाग है। और क्या पाया आपने? आपने भाव संवेदनाएं। हमने बहुत प्यार किया है, प्यार खरीदा है और प्यार बेचा है। प्यार के हम तिजारती हैं, प्यार के सौदागर। आप समझना, हमने और कुछ किया ही नहीं है, प्यार ही खरीदते रहे, प्यार भी बांटते रहे, प्यार ही जमा करते रहे, प्यार की ही दौलत हमारे पास है।
फिर, फिर आपको क्या मिला? हमको बहुत मिला। जहां कहीं भी हम गए, हमने देखा कि लोग कितना प्यार करते हैं। यहां भी कितना प्यार करते हैं। लोग आते हैं और यह कहते हैं कि गुरु जी के दर्शन मिल जाते तो कैसा अच्छा होता। क्या वजह है? क्या वजह है जो गुरु जी के शक्ल में? क्या बात है खास? कोई खास बात तो नहीं है, ऐसे ही लोग-बाग देखने के लिए आतुर रहते हैं, क्योंकि उनका प्यार, उनकी मोहब्बत, उनका यह सारे के सारे चीजें हमारे लिए इतनी सुरक्षित हैं कि लाखों आदमियों का प्यार हमने पाया है।
गांधी जी ने पाया था, गांधी जी ने भी पाया था जरूर, लेकिन हमने भी कम प्यार नहीं पाया है। अपनी जिंदगी में, मरने के बाद तो कई आदमियों को लोग प्यार करते रहते हैं। भगवान बुद्ध की पूजा करते हैं, सामने तो लोगों ने नहीं की। कृष्ण भगवान को सामने तो गालियां दी, पीछे से ही कृष्ण भगवान की आरती उतारते हैं, लेकिन हमारे जिंदगी में कोई आरती उतारेगा कि नहीं, मालूम नहीं। कोई हमको याद करेगा कि नहीं करेगा, लेकिन इस जिंदगी में हमको इतने लोगों ने याद किया और इतना प्यार किया है कि हम ही जानते हैं। और हमारा धन, हमने तो नहीं कमाया था, पहले जन्म का कमाया हुआ रहा होगा, कोई और पहले जन्म का रहा हो करके पिताजी के मार्फत हमको मिला। हमने वह सब खर्च कर डाला। कैसे-कैसे खर्च किया? वह हमने इस तरीके से खर्च किया कि जो जमीदारियों समाप्त हुई, जमीदारी की जो बॉन्ड आए, उन बॉन्डों से गायत्री तपोभूमि के निर्माण करने के लिए सारा पैसा लगा दिया। हमारी बीवी के पास 60-65 तोले सोना था, यह भी उनसे कहकर के, "तुम क्या करोगी?" उनको बेचकर के वह भी गायत्री तपोभूमि के निर्माण में लगा दिया। इसके बाद, जमीदारियों का समापन खत्म हो गया। जो किसानों के पास खुद काश्त की ज़मीनें थीं, वह रह गईं। 80 बीघे ज़मीन हमारे पास रह गई। और 80 बीघे ज़मीन जब हम वहां छोड़ कर के अपने बाहर चलने लगे, तो हमने उस ज़मीन को अपने खानदान वालों को देने के बजाय, लड़के-लड़कियों को देने के बजाय, 80 बीघा ज़मीन, उस ज़माने में भी बहुत दाम की होती थी। और अब तो बेहद दाम की होती है। उस ज़माने में ₹5000 रुपया बीघे का था उसका भाव, और अब तो सोचता हूं, शायद ₹50000 रुपए बीघे का होगा, ₹40000 का होगा, मालूम नहीं। लेकिन उस ज़माने में ₹5000 रुपए का बीघा था, ₹400000 रुपए की थी, अब शायद ₹4000000 रुपए की। लेकिन वह, उसकी हमने गांव में हायर सेकेंडरी स्कूल बना दिया। बहुत शानदार स्कूल है। कभी आपको जाने का जी हो तो आप जरूर जाना और उसको देखना।
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड-ज्योति से
ईसाई मिशन की महिलाएँ भी घर-घर जाती हैं और यह कहती हैं कि हमारी एक पैसा की किताब जरूर खरीदिये। अगर अच्छी न लगे तो कल मैं वापस ले लूँगी। अरे यह किताब बेचना नहीं है बाबा, मेरे विचार को घर-घर पहुँचाना है। आप लोगों के जिम्मे हमारा एक सूत्रीय कार्यक्रम है। आप जाइये, अपने को निचोड़िये। आपका घर का खर्च यदि 1000 रुपये है तो निचोड़िये इसको और उसमें से बचत को ज्ञानयज्ञ के लिए खर्च कीजिये। हमारी आग को बिखेर दीजिये, वातावरण को गरम कर दीजिये, उससे अज्ञानता को जला दीजिये। आप लोग जाइये और अपने आपको निचोड़िये। ज्ञानघट का पैसा खर्च कीजिये तो क्या हम अपनी बीबी को बेच दें? बच्चे को बेच दें? चुप कंजूस कहीं के ऊपर से कहते हैं हम गरीब हैं। आप गरीब नहीं कंजूस हैं।
हर आदमी के ऊपर हमारा आक्रोश है। हमें आग लग रही है और आप निचोड़ते नहीं हैं। इनसान का ईमान, व्यक्तित्व समाप्त हो रहा है। आज शक्तिपीठें, प्रज्ञापीठें जितनी बढ़ती जा रही हैं, उतना ही आदमी का अहंकार बढ़ता जा रहा है। आपस में लड़ाई-झगड़े बढ़ते जा रहे हैं। सब हविश के मालिक बनते जा रहे हैं। हम चाहते हैं कि अब पन्द्रह-बीस हजार में फूस के शक्तिपीठ, प्रज्ञापीठ बन जाते तो कम से कम लोगों का राग-द्वेष, अहंकार तो नहीं बढ़ता। आज आप लोगों से एक ही निवेदन कि आप हमारी आग स्वयं बिखेरिये, नौकरी से नहीं, सेवा से।
आप जाइये एवं हमारा साहित्य पढ़िये तथा लोगों को पढ़ाइये और हम क्या कहना चाहते थे। हम दो ही बात आपसे कहना चाहते हैं- पहली हमारी आग को घर-घर पहुँचाइये, दूसरी ब्राह्मण एवं सन्त को जिन्दा कीजिये ताकि हमारा प्याऊ एवं अस्पताल चल सके, ताकि लोगों को-अपने बच्चों को खिला सकें तथा उन्हें जिन्दा रख सकें तथा मरी हुई संस्कृति को जिन्दा कर सकें। आप 11 माला जप करते हैं-आपको बहुत-बहुत धन्यवाद। यह जादूगरी नहीं है। किसी माला में कोई जादू नहीं है। मैं तो यहाँ तक कहता हूँ कि मनोकामना की मालाएँ, जादूगरी की माला में आग लगा दीजिये, आप मनोकामना की माला, जादूगरी की माला, आज्ञाचक्र जाग्रत करने की माला को पानी में बहा दीजिये।
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
वाङमय-नं-68-पेज-1.12
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