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Sunday 06, July 2025

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 कारण शरीर की विशिष्टता भाव श्रद्धा | गायत्री की पंचकोशी साधना एवं उपलब्धियां #gayatrimata

कारण शरीर की विशिष्टता भाव श्रद्धा | गायत्री की पंचकोशी साधना एवं उपलब्धियां #gayatrimata

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अमृत सन्देश:- करुणा की शक्ति | Karuna Ki Shkati | पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

अमृत सन्देश:- करुणा की शक्ति | Karuna Ki Shkati | पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन

गायत्री माता
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गायत्री माता - अखंड दीपक
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चरण पादुका
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चरण पादुका
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सजल श्रद्धा - प्रखर प्रज्ञा (समाधि स्थल)
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परम् पूज्य गुरुदेव व वंदनीय माताजी कक्ष
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परम् पूज्य गुरुदेव व वंदनीय माताजी कक्ष
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प्रज्ञेश्वर महादेव - देव संस्कृति विश्वविद्यालय
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शिव मंदिर - शांतिकुंज
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हनुमान मंदिर - शांतिकुंज
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आज का सद्चिंतन (बोर्ड)

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आज का सद्वाक्य

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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन


!! परम पूज्य गुरुदेव का कक्ष 06 July 2025 गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!

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!! गायत्री माता मंदिर Gayatri Mata Mandir गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 06 July 2025

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!! सप्त ऋषि मंदिर गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 06 July 2025

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!! महाकाल महादेव मंदिर Mahadev_Mandir गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 06 July 2025

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!! शांतिकुंज दर्शन 06 July 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!

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!! देवात्मा हिमालय मंदिर Devatma Himalaya Mandir गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 06 July 2025

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!! प्रज्ञेश्वर महादेव मंदिर Prageshwar Mahadev 06 July 2025

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!! अखण्ड दीपक Akhand_Deepak (1926 से प्रज्ज्वलित) चरण पादुका गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 06 July 2025

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अमृतवाणी: बाल विवाह भी एक सामाजिक कुरीति | पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी

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परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश



जो आदमी नहीं मानते हैं और जो आदमी गलत काम करते हैं, गलत प्रभाव पैदा करते हैं, अपनी छोटी लड़की को बूढ़े के साथ में ब्याह करते हैं, उसके यहाँ न केवल सत्याग्रह किया जाना चाहिए, न केवल पिकेटिंग किया जाना चाहिए बल्कि घेराव किया जाना चाहिए कि ऐसा वर जो छोटी लड़की से ब्याह कर रहा हो घोड़े पर आगे नहीं बढ़ सकता। नहीं बढ़ने दिया जायेगा। दो हजार आदमी रास्ता रोककर खड़े हो जायें। उसके बाप को बंद कर दिया जाय कमरे में कि आपको कमरे से नहीं निकलने दिया जायेगा। उसके कोई भी परिणाम क्यों न होते हों, कानूनी उल्लंघन होता हो तो जेल जाया जायेगा। गाँधीजी के जमाने में भी कितने आदमी जेल गये थे, आप भी जेल जा सकते हैं।पशु-बलि जैसे घृणित कर्म रोका ही जाना चाहिए। माँस खाये या न खाये, ये बात अलग है लेकिन देवता एक आदमी का नहीं है और देवता का मालिक एक आदमी नहीं है जो देवता को बदनाम करे।  देवता को बदनाम हम नहीं करने देंगे। देवी तुम्हारी ही नहीं है, देवी हमारी भी है और देवी सारी हिन्दू समाज की है। आप समाज की देवी को कलंकित न करें। आप पूजा करें ठीक है, चन्दन चढ़ायें ठीक है, फूल चढ़ायें ठीक है। लेकिन देवी को आप डाकिन, पिशाचिन और चुडै़ल के रूप में पेश करना चाहें तो हमारी माँ की बेइज्जती होती है। हम आपको ऐसा नहीं करने दे सकते हैं। जानवर देवी के लिए काटते हैं? क्या मतलब होता है देवी के लिए काटने का? धर्म होता है? देवी खून पीती है? देवी कभी खून नहीं पी सकती। जो देवी खून पीती हैं वो देवी कैसे हो सकती हैं? वो देवी नहीं कही जा सकती। वो पिशाचिन और चुडै़ल ही कही जा सकती हैं और चुडै़ल और पिशाचिन को धर्म में कोई स्थान नहीं मिल सकता। हत्या के लिए धर्म में क्या स्थान है? खून पीने को क्या स्थान है? कत्ल करने के लिए धर्म से क्या ताल्लुक है? ये तो घोर नृशंस पाप है, पिशाचपन है?ये पिशाचपन हमारे हिन्दू समाज में जहाँ- तहाँ फैला हुआ पड़ा है। हमको लोगों के अंदर विवेक उत्पन्न क रना चाहिए। इस पिशाचपन और धर्म का कोई ताल्लुक नहीं है आपस में। देवी दुनिया में कोई ऐसी नहीं होती जो जानवरों का,और मनुष्यों का, और बकरों का और उनका मुर्गियों का खून पिये और माँस खाये। ये देवियों का काम है ये देवियों का काम नहीं हो सकता।

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अखण्ड-ज्योति से



अहंकार और लोभ एक दूसरे के अभिन्न साथी है। जहाँ एक होगा, वहाँ दूसरे का होना अनिवार्य है। अह के दोष से मनुष्य का लोभ इस सीमा तक बढ़ जाता है कि वह संसार की प्रत्येक वस्तु पर एकाधिकार चाहने लगता है। उसकी अधिकार लिप्सा असीमित हो जाती है। वह संसार के सूक्ष्म साधनोँ का लाभ केवल स्वयं ही उठाना चाहता है, किसी को उसमें भागीदार होते नहीं देख सकता। यदि कोई अपने गुणों, परिश्रम और पुरुषार्थ से उन्नति, विकास करता भी है तो अहंकारी को ऐसा आभास होता है, जैसे वह उन्नति शील व्यक्ति उसके अधिकार में हस्तक्षेप कर रहा है। उसकी सम्पत्ति और साधनों का भागीदार बन रहा है। और इस मति दोष के कारण वह बड़ा असहनशील हो उठता है। यदि शक्ति होती है तो वह उस बढ़ते हुए व्यक्ति को गिराने मिटाने का प्रयत्न करता है, नहीं तो जल भुनकर मन ही मन कुढ़ता रहता है।

इन दोनों अवस्थाओं में अहंकारी व्यक्ति अपनी ही हानि किया करता है। दूसरे को पीछे खींचने और धकेलने वाला कब तक क्षमा किया जा सकता है। एक दिन लोग उसके इस अपराध के विरोध में खड़े हो जाते है और उसके अहंकार को चूर चूर करके ही दम लेते है। जैसा कि दुर्योधन, कंस, शिशुपाल, हिटलर, नैपोलियन आदि आततायियों के विषय में लोगों ने किया। इन अनुचित लोगों को अहंकार बढ़ता गया, अधिकार, विस्तार और आधिपत्य की भावना बलवती हो गई। समाज पहले तो सद्भावनापूर्ण सहन करता रहा, किन्तु जब सहनशीलता की सीमा खत्म हो गई, समाज उठा और उन शक्तिमत अहंकारियों को शीघ्र ही धूल में मिलाकर सदा सर्वदा के लिए मिटा डाला।
                  

 निर्बल अहंकारी जो समाज का कुछ बिगाड़ नहीं पाता अपने मन में ही जलता भुनता और क्षोभ करता रहता है। अपना हृदय जलाता, शक्ति नष्ट करता और आत्मा के बंधन दृढ़ करता हुआ लोक परलोक नष्ट करता रहता है। जीवन में शाँति तो उसके लिए दुर्लभ हो ही जाती है, परलोक में भी लोक के अनुरूप नरक भोगा करता है और पुनर्जन्म में अन्य योनियों का अधिकारी बनकर युग युग तक दण्ड भोगा करता है। एक अहंकार दोष के कारण मनुष्य को ऐसी कौन सी यातना है जो भोगनी नहीं पड़ती। अहंकार में अकल्याण ही अकल्याण है उससे किसी प्रकार के श्रेय की आशा नहीं की जा सकती। इस विषधर से जितना बचा जा सकें उतना ही मंगल है।

 क्रमशः जारी
 श्री भारतीय योगी
 अखण्ड ज्योति 1969 जून पृष्ठ 59

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