Sunday 09, March 2025
शुक्ल पक्ष एकादशी, फाल्गुन 2025
पंचांग 10/03/2025 • March 10, 2025
फाल्गुन शुक्ल पक्ष एकादशी, पिंगल संवत्सर विक्रम संवत 2081, शक संवत 1946 (क्रोधी संवत्सर), फाल्गुन | एकादशी तिथि 07:44 AM तक उपरांत द्वादशी | नक्षत्र पुष्य 12:51 AM तक उपरांत आश्लेषा | शोभन योग 01:56 PM तक, उसके बाद अतिगण्ड योग | करण विष्टि 07:45 AM तक, बाद बव 07:56 PM तक, बाद बालव |
मार्च 10 सोमवार को राहु 08:04 AM से 09:32 AM तक है | चन्द्रमा कर्क राशि पर संचार करेगा |
सूर्योदय 6:36 AM सूर्यास्त 6:18 PM चन्द्रोदय 2:43 PM चन्द्रास्त 4:57 AM अयन उत्तरायण द्रिक ऋतुवसंत
- विक्रम संवत - 2081, पिंगल
- शक सम्वत - 1946, क्रोधी
- पूर्णिमांत - फाल्गुन
- अमांत - फाल्गुन
तिथि
- शुक्ल पक्ष एकादशी
- Mar 09 07:45 AM – Mar 10 07:44 AM - शुक्ल पक्ष द्वादशी
- Mar 10 07:45 AM – Mar 11 08:14 AM
नक्षत्र
- पुष्य - Mar 09 11:55 PM – Mar 11 12:51 AM
- आश्लेषा - Mar 11 12:51 AM – Mar 12 02:15 AM
SHRAVAN
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!! परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी का अमृत सन्देश !!
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
एकलव्य जो था, वह गुरु द्रोणाचार्य के पास गया। उसने कहा, "हमें हथियार चलाना सिखा दीजिए।" उन्होंने मना कर दिया, "हम नहीं सिखाते आपको।" बस, उसने द्रोणाचार्य के पास जाकर फिर से कहा, "हमें हथियार चलाना सिखा दीजिए।" उन्होंने फिर मना कर दिया, "हम नहीं सिखाते आपको।"अब उसने अपना मिट्टी का द्रोणाचार्य बनाया और मिट्टी के द्रोणाचार्य से जो बाण विद्या सीखी, वह पांडवों से कहीं ज्यादा अच्छी थी। पांडव तब ऐसा तीर चलाना नहीं जानते थे, जो होठों को सीने में समर्थ हो सके। लेकिन होठों को सीने में समर्थ बाण विद्या द्रोणाचार्य ने जो सिखाई, वह द्रोणाचार्य वह था, कौन सा वाला था, जो मिट्टी का बना हुआ था। पांडवों के कुत्ते का मुंह जब बंद कर दिया और कुत्ता भागता हुआ पांडवों के पास पहुंचा, तो उनको देख के हैरत हुई कि होठों को सीने वाली कला किसको आती है। तलाश करते हुए गए, तो मालूम पड़ा कि एकलव्य नाम का एक भील का लड़का बाण विद्या सीख रहा था उन्होंने पूछा, "आपको यह विद्या किसने सिखाई?" एकलव्य ने कहा, "द्रोणाचार्य ने सिखाई।" तो उन्होंने शिकायत की, "आपने इनको सिखा दी, हमें नहीं सिखाई।" एकलव्य ने कहा, "नहीं, हमने तो नहीं सिखाई।"चलिए, बुलाकर के ले गए और उन्होंने यह कहा। फिर उनसे पूछा, "द्रोणाचार्य ने आपको कब सिखाई?" उन्होंने मिट्टी के द्रोणाचार्य दिखाए और कहा, "यह द्रोणाचार्य हैं, इन्होंने हमें सिखाई।" असली द्रोणाचार्य की बनिस्वत नकली द्रोणाचार्य में शक्ति का ज्यादा होना संभव है। यह कैसे? आदमी के श्रद्धा और विश्वास से। जो न आपके पास है, न हमारे पास है। श्रद्धा का अभाव, विश्वास का अभाव। श्रद्धा का अभाव और विश्वास का अभाव कहीं? मानते भी नहीं हैं। बेटे, श्रद्धा और विश्वास का अभाव है कि नहीं? कैसे जानें, बेटे? श्रद्धा और विश्वास का अभाव की पहचान ये है, तेरी एक पहचान है, दूसरी कोई पहचान नहीं है।
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड-ज्योति से
जानने योग्य इस संसार में अनेक वस्तुएँ हैं, पर उन सबमें प्रधान अपने आपको जानना है। जिसने अपने को जान लिया उसने जीवन का रहस्य समझ लिया। भौतिक विज्ञान के अन्वेषकों ने अनेक आश्चर्यजनक आविष्कार किए हैं। प्रकृति के अन्तराल में छिपी हुई विद्युत शक्ति, ईश्वर शक्ति, परमाणु शक्ति आदि को ढूँढ़ निकाला है। अध्यात्म जगत के महान अन्वेषकों ने जीवन सिन्धु का मन्थन करके आत्मा रूपी अमृत उपलब्ध किया है। इस आत्मा को जानने वाला सच्चा ज्ञानी हो जाता है और इसे प्राप्त करने वाला विश्व विजयी मायातीत कहा जाता है। इसलिए हर व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह अपने आपको जाने।
मैं क्या हूँ, इस प्रश्न को अपने आपसे पूछे और विचार करे, चिन्तन तथा मननपूर्वक उसका सही उत्तर प्राप्त करे। अपना ठीक रूप मालूम हो जाने पर, हम अपने वास्तविक हित-अहित को समझ सकते हैं। विषयानुरागी अवस्था में जीव जिन बातों को लाभ समझता है, उनके लिए लालायित रहता है, वे लाभ आत्मानुरक्त होने पर तुच्छ एवं हानिकारक प्रतीत होने लगते हैं और माया लिप्त जीव जिन बातों से दूर भागता है, उसमें आत्म-परायण को रस आने लगता है। आत्म-साधन के पथ पर अग्रसर होने वाले पथिक की भीतरी आँखें खुल जाती हैं और वह जीवन के महत्वपूर्ण रहस्य को समझकर शाश्वत सत्य की ओर तेजी के कदम बढ़ाता चला जाता है।
अनके साधक अध्यात्म-पथ पर बढऩे का प्रयत्न करते हैं पर उन्हें केवल एकांगी और आंशिक साधन करने के तरीके ही बताये जाते हैं। आत्म-दर्शन का यह अनुष्ठान साधकों को ऊँचा उठायेगा, इस अभ्यास के सहारे वे उस स्थान से ऊँचे उठ जायेंगे जहाँ कि पहले खड़े थे। इस उच्च शिखर पर खड़े होकर वे देखेंगे कि दुनियाँ बहुत बड़ी है। मेरा राज्य बहुत दूर तक फैला हुआ है। जितनी चिन्ता अब तक थी, उससे अधिक चिन्ता अब मुझे करनी करनी है। वह सोचता है कि मैं पहले जितनी वस्तुओं को देखता था, उससे अधिक चीजें मेरी हैं। अब वह और ऊँची चोटी पर चढ़ता है कि मेरे पास कहीं इससे भी अधिक पूँजी तो नहीं है?
जैसे-जैसे ऊँचा चढ़ता है वैसे ही वैसे उसे अपनी वस्तुएँ अधिकाधिक प्रतीत होती जाती हैं और अन्त में सर्वोच्च शिखर पर पहुँचकर वह जहाँ तक दृष्टि फैला सकता है, वहाँ तक अपनी ही अपनी सब चीजें देखता है। अब तक उसे एक बहिन, दो भाई, माँ बाप, दो घोडे, दस नौकरों के पालन की चिन्ता थी, अब उसे हजारों गुने प्राणियों के पालने की चिन्ता होती है। यही अहंभाव का प्रसार है। दूसरे शब्दों में इसी को अहंभाव का नाश कहते हैं।
आत्मा के वास्तविक स्वरूप की एक बार देख लेने वाला साधक फिर पीछे नहीं लौट सकता। प्यास के मारे जिसके प्राण सूख रहे हैं ऐसा व्यक्ति सुरसरि का शीतल कूल छोडक़र क्या फिर उसी रेगिस्तान में लौटने की इच्छा करेगा? जहाँ प्यास के मारे क्षण-क्षण पर मृत्यु समान असहनीय वेदना अब तक अनुभव करता रहा है। भगवान कहते हैं- जहाँ जाकर फिर लौटना नहीं होता, ऐसा मेरा धाम है। सचमुच वहाँ पहुँचने पर पीछे को पाँव पड़ते ही नहीं। योग भ्रष्ट हो जाने का वहाँ प्रश्न ही नहीं उठता। घर पहुँच जाने पर भी क्या कोई घर का रास्ता भूल सकता है?
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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