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Friday 11, July 2025

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बलमुपास्व-बल की उपासना करो | Balmupaswa -Bal ki upasana karon

बलमुपास्व-बल की उपासना करो | Balmupaswa -Bal ki upasana karon

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जिन्हें आपने त्याग तप से जलाई, हमें आपने वे मशाले थमाई । चलेंगे मशाले लिए साथ में हम, थमा हाथ को आपके हाथ में हम।

जिन्हें आपने त्याग तप से जलाई, हमें आपने वे मशाले थमाई । चलेंगे मशाले लिए साथ में हम, थमा हाथ को आपके हाथ में हम।

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मनुष्य शरीर वही जो परमार्थ के काम आये | Gurudev Ke Patra Sneh | Shantikunj Rishi Chintan

मनुष्य शरीर वही जो परमार्थ के काम आये | Gurudev Ke Patra Sneh | Shantikunj Rishi Chintan

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चरित्रवान युवा ही युग निर्माण करेंगें : व्यक्तित्व सम्पन्न युग-शिल्पी ही नव-निर्माण करेंगे

चरित्रवान युवा ही युग निर्माण करेंगें : व्यक्तित्व सम्पन्न युग-शिल्पी ही नव-निर्माण करेंगे

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सद्गुरु बिना किसी को, सज्ञान कब मिला है।

सद्गुरु बिना किसी को, सज्ञान कब मिला है।

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जीवन की मूल प्रेरणा कर्तव्य पालन | Jeevan Ki Mul Prerana Kartavya Palan

जीवन की मूल प्रेरणा कर्तव्य पालन | Jeevan Ki Mul Prerana Kartavya Palan

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अमृत सन्देश:- बसंती चोले का महत्व | Basanti Chole Ka Mehtav

अमृत सन्देश:- बसंती चोले का महत्व | Basanti Chole Ka Mehtav

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Nari Ki Mahima Nari Shaktiyan | नारी की महिमा नारी शक्तियाँ

Nari Ki Mahima Nari Shaktiyan | नारी की महिमा नारी शक्तियाँ

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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन

गायत्री माता
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गायत्री माता - अखंड दीपक
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चरण पादुका
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चरण पादुका
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सजल श्रद्धा - प्रखर प्रज्ञा (समाधि स्थल)
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सजल श्रद्धा - प्रखर प्रज्ञा (समाधि स्थल)
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शिव मंदिर - शांतिकुंज
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हनुमान मंदिर - शांतिकुंज
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आज का सद्चिंतन (बोर्ड)

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आज का सद्वाक्य

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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन


!! शांतिकुंज दर्शन 11 July 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!

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अमृतवाणी: ज्ञान-यज्ञ का स्वरूप | पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी

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परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश



पिछड़े वर्ग को ऊँचा उठाने की इन दिनों प्रबल माँग है। इस के लिए अनुसूचित जातियों, जनजातियों को समर्थ बनाने के प्रयत्न चल रहे है। इस औचित्य में एक कड़ी और जुड़नी चाहिए कि हर दृष्टि में हेय स्थिति में पड़ी हुई, दूसरे दर्जे के नागरिक जैसा जीवन जीने वाली अनेकानेक सामाजिक प्रतिबन्धों में जकड़ी हुई नारी को भी एकता और समा का लाभ मिले। इस ओर से आँखें बन्द किए रहना सम्भवतः प्रगति में चट्टान बनकर अड़ा ही रहेगा।

अपंग स्तर का व्यक्ति स्वयं कुछ नहीं कर पाता, दूसरों की अनुकम्पा पर जीता है। पर यदि उसकी स्थिति अन्य समर्थों जैसी हो जाय तो किसी के अनुग्रह पर रहने की अपेक्षा वह अपने परिकर को अपनी उपलब्धियों से लाद सकता है। जब लेने वाला देने वाले में बदल जाय तो समझना चाहिए कि खाई पटी और उस स्थान पर ऊँची मीनार खड़ी हो गई। आधी जनसंख्या तक स्वतंत्रता का आलोक पहुँचाना और उसे अपने पैरों खड़ा हो सकने योग्य बनाना उस पुरुष वर्ग का विशेष रूप से कर्तव्य बनता है, जिसने पिछले दिनों अपनी अहमन्यता उत्पन्न की। पाप का प्रायश्चित तो करना ही चाहिए। खोदी गई खाई को पाटकर समतल भूमि बननी ही चाहिए ताकि उसका उपयुक्त उपयोग हो सके।   

नारी जागरण आन्दोलन इसी पुण्य प्रयास के लिए उभारा गया है। इसके लिए लैटरपैड, साइनबोर्ड, मजलिस, भाषण, लेखन, उद्घाटन समारोह तो आए दिन होते रहते है पर उस प्रचार प्रक्रिया भर से उतनी गहराई तक नहीं पहुँचा जा सकता जितनी कि इस बड़ी समस्या के समाधान हेतु आवश्यक है। इसके लिए व्यापक जनसंपर्क साधने और प्रचलित मान्यताओं को बदलने की सर्वप्रथम आवश्यकता है। कारण कि बच्चे से लेकर बूढ़े तक के मन में यह मान्यता गहराई तक जड़ जमा चुकी है कि नारी का स्तर दासी स्तर का ही रहना चाहिए। यही परम्परा है, वही शास्त्र वचन। स्वयं नारी तक ने अपना मानस इसी ढाँचे में ढाल लिया है। चिरकाल तक अन्धेरे में बंद रहने वाले कैदियों की तरह उसके मन में भी प्रकाश के संपर्क में आने का साहस टूट गया है। आवश्यकता प्रस्तुत समूचे वातावरण को बदलने की है। ताकि सुधार प्रक्रिया की लीपा-पोती न करके उसकी जड़ तक पहुँचने और वहाँ अभीष्ट परिवर्तन कर सकना सम्भव हो सके।

देखा गया है कि नारी उत्थान के नाम पर प्रौढ़ शिक्षा, कुटीर उद्योग, शिशु पालन, पाकविद्या, गृह व्यवस्था जैसी जानकारियाँ कराने में कर्तव्य की इतिश्री मान ली जाती है। यों यह सभी बातें भी आवश्यक हैं और किया इन्हें भी जाना चाहिए। पर मूल प्रश्न उस मान्यता को बदलने का है। जिसके आधार पर नारी को पिछड़ेपन में बाँधें रहने वाली व्यापक मान्यता में कारगर परिवर्तन सम्भव हो सके।

क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1988 पृष्ठ 58

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ब्राह्मण का काम ज्ञान-यज्ञ के द्वारा, क्षत्रियों का कार्य संघर्षों के द्वारा और वैश्य एवं साधारण व्यक्ति जिनकी सेवा में रुचि है, उनके लिए रचनात्मक कार्यक्रम का आयोजन है। रचनात्मक कार्यक्रम तीन अंगों में हैं। गायत्री के तीन चरणों के अनुरूप हमने युग निर्माण योजना को तीन भागों में बाँट दिया है। अभी ज्ञान यज्ञ, अगले दिनों रचनात्मक कार्यक्रम और अंततः संघर्ष जो ऐसे होंगे जो पाप को अंततः विनाश करके ही छोड़ेंगे, अनाचार को जीवित नहीं ही रहने देंगे। अविवेक, अज्ञान और अन्याय जो सारे समाज पर छाया हुआ है, उसे जड़-मूल से हटा करके ही छोड़ें ऐसा एक अंतिम युद्ध होगा, जिसको हम भावी महाभारत कहेंगे। भारत छोटा नहीं रह जायेगा बल्कि एक विश्वव्यापी भारत होगा जिसको हम महान भारत कह सकते हैं। ऐसा एक महाभारत अर्थात ऐसा एक संघर्ष होगा जिसके कारण कोई पाप, कोई कुरीति और कोई अनाचार बचेगा नहीं। इस तरह के संघर्ष के लिए हमको तैयारी करनी चाहिए और जहाँ कहीं इसका छोटा-मोटा स्वरुप खड़ा किया जाना सम्भव हो, वहाँ विरोध आंदोलन के रूप में और हस्ताक्षर आंदोलन के रूप में तथा बुरे काम न करने की प्रतिज्ञा के रूप में आरंभ करने चाहिए और धीरे-धीरे उनका विकास करना चाहिए। 

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अखण्ड-ज्योति से



समय की माँग के अनुरूप दो दबाव इन दिनों निरंतर बढ़ते जा रहे हैं। एक व्यापक अवांछनीयताओं से जूझना और उन्हें परास्त करना, और दूसरा है- नवयुग की सृजन व्यवस्था को कार्यान्वित करने की समर्थता। निजी और छोटे क्षेत्र में भी यह दोनों कार्य अति कठिन पड़ते हैं। फिर जहाँ देश, समाज या विश्व का प्रश्र है, वहाँ तो कठिनाई का अनुपात असाधारण होगा ही।

प्रगति पथ पर अग्रसर होने के लिए तदनुरूप योग्यता एवं कर्मनिष्ठ उत्पन्न करनी पड़ती हे। इनके बिना सामान्य स्थिति में रहते हुए किसी प्रकार दिन काटते ही बन पड़ता है। अनेकों समस्याएँ और कठिनाइयों, आए दिन त्रास और संकट भरी परिस्थितियों बनी रही रहती हैं। जो कठिनाइयों से जूझ सकता हैं और प्रगति की दिशा में बढ़ चलने के साधन जुटा सकता है, उसी को प्रतिभावानन्ï कहते हैं।

औचित्य कहाँ है, इसकी विवेचना बुद्धि इनमें नहीं के बराबर होती है। वे साधनों के लिए, मार्गदर्शन के लिए दूसरों पर निर्भर रहते हैं, यहाँ तक कि जीवनोपयोगी साधन तक अपनी स्वतंत्र चेतना के बलबूते जुटा नहीं पाते। उनके उत्थान पतन का निमित्त कारण दूसरे ही बने रहते हैं। दूसरा वर्ग वह है जो समझदार होते हुए भी संकीर्ण स्वार्थपरता से घिरा रहता है। योग्यता और तत्परता जैसी विशेषताएँ होते हुए भी वे उन्हें मात्र लोभ, मोह, अहंकार की पूर्ति के लिए ही नियोजित किए रहते हैं।

तीसरा वर्ग प्रतिभाशालियों का है। वे भौतिक क्षेत्र में कार्यरत रहते हैं, तो अनेक व्यवस्थाएँ बनाते हैं। अनुशासन में रहते और अनुबंधों से बँधे  रहते हैं। बड़ी योजनाएँ बनाते और चलाते हैं। जिन्होंने महत्त्वपूर्ण सफलताएँ पाईं, प्रतिस्पर्धाएँ  जीतीं, उनमें ऐसी ही मौलिक सूझ-बूझ होती है। सबसे ऊँची श्रेणी देवमानवों की है, जिन्हें महापुरुष भी कहते हैं। वे प्रतिभाशाली होते हैं, पर उसका उपयोग आत्म परिष्कार से लेकर लोकमंगल तक के उच्च स्तरीय प्रयोजनों में ही किया करते हैं। समाज के उत्थान और सामयिक समस्याओं के समाधान का श्रेय उन्हें ही जाता है। किसी देश की सच्ची संपदा वे ही समझ पाते हैं, जो अपने कार्यक्षेत्र को नंदनवन जैसा सुवासित करते हैं।

 बड़े कामों को बड़े शक्ति केन्द्र ही सम्पन्न कर सकते हैं। दलदल में फँसे हाथी को बलवान्ï हाथी ही खींचकर पार करते हैं। पटरी से उतरे इंजन को समर्थ क्रेन ही उठाकर यथा स्थान रखती है। समाज और संसार की बड़ी समस्याओं को हल करने के लिए ऐसे ही वरिष्ठï प्रतिभावानों की आवश्यकता पड़ती है। प्रतिभाएँ वस्तुत: ऐसी सम्पदाएँ है, जिनसे न केवल प्रतिभाशाली स्वयं भरपूर श्रेय अर्जित करते हैं, वरन्ï अपने क्षेत्र, समुदाय और देश की अति विकट दीखने वाली उलझनों को भी सुलझाने में सफल होते हैं। इसी कारण भावनावश ऐसे लोगों को देवदूत तक कहते हैं।
  
आड़े समय में इन उच्च स्तरीय प्रतिभाओं की ही आवश्यकता होती है। उन्हीं को खोज और उभारा जाता है। मनस्वी, तेजस्वी और ओजस्वी ऐसे कर्मयोग की साधना में ही निरत रहते हैं, जो उनके व्यक्तित्व को प्रामाणिक और कर्तृत्व को ऊर्जा का उद्ïगम स्रोत सिद्ध कर सकें। वर्तमान समय विश्व इतिहास में अद्ïभुत एवं अभूतपूर्व स्तर का है। इसमें एक ओर महाविनाश का प्रलयंकर तूफान अपनी प्रचंडता का परिचय दे रहा है, तो दूसरी ओर सतयुगी नवनिर्माण की उमंगें भी उछल रही हैं। विनाश और विकास एक दूसरे के प्रतिद्वन्द्वी हैं, तो भी उनके एक ही समय में अपनी-अपनी दिशा में चल सकना संभव है। इन दिनों आकाश में सघन तमिस्त्रा का साम्राज्य है, तो दूसरी ओर ब्रह्मïमुहूर्त का आभास भी प्राची में उदीयमान होता दीख पड़ता है। इन दोनों के समन्वय को देखते हुए ही अपना समय युगसंधि का समय माना गया है।

 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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