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Saturday 11, October 2025

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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन

गायत्री माता
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गायत्री माता - अखंड दीपक
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चरण पादुका
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चरण पादुका
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सजल श्रद्धा - प्रखर प्रज्ञा (समाधि स्थल)
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प्रज्ञेश्वर महादेव - देव संस्कृति विश्वविद्यालय
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शिव मंदिर - शांतिकुंज
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हनुमान मंदिर - शांतिकुंज
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आज का सद्चिंतन (बोर्ड)

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आज का सद्वाक्य

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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन


केवल भजन से उद्धार संभव नहीं | Kewal Bhajan Se Uddhar Sambhav Nhi

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!! शांतिकुंज दर्शन 11 October 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!

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परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश



बेटे, युग निर्माण संकल्प में छपा है — साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा। चारों चीजें ऐसी हैं, चारों चीजें ऐसी हैं, जिसमें से एक को भी आप त्याग नहीं सकते। एक को हम नहीं त्याग सकते, और एक अकेली को इनमें से कोई लेना चाहे, तो आप बढ़ नहीं सकते।

हम भजन करेंगे — यह ख़्याल रहेगा — बिल्कुल ग़लत है। भजन से आपका उद्धार, भजन से उद्धार आपका नहीं हो सकता।

भजन के बारे में, भजन के बारे में एक दिन मेरी निष्ठा इस क़दर डगमगा गई थी कि मैं नास्तिक हो गया होता। और आप — नास्तिक होने को थे बेटे! जब मेरे गुरु ने एक साल के लिए पिछली बार हिमालय बुलाया था, तब मैं तंग हो गया।

उन्होंने चार दिन अपने पास रखा, और उसके बाद में एक साल के लिए गंगोत्री मुझे भेज दिया। जहाँ भगीरथ ने तप किया था, वहाँ भेज दिया। मुझे भेज दिया भागीरथ शिला पर, बैठकर के मैं अपना अनुष्ठान करता था।

और रात्रि को एक स्वामी जी थे — स्वामी कृष्णानंद। अब तो देहांत हो गया उनका। मालवीय जी की हिंदू विश्वविद्यालय की शिला रखने के लिए वही रातों-रात आए थे, और रात-रात पत्थर रख करके, रातों-रात चले गए थे।

नंगे रहते थे वो। उनके बारे में यह कहा जाता था कि जब बर्फ जमती थी, तब वो जम जाते थे, और जब बर्फ पिघलती थी, तब वो उठ के खड़े हो जाते थे। उनके बारे में कहा जाता है।

और उनकी उम्र भी इतनी थी कि जब हिंदू विश्वविद्यालय का शिलान्यास हुआ, अस्सी बरस करीब होने को आए, तभी भी वो जवान थे। तब भी वो जवान थे।

तब लोगों ने बताया — जिस समय उनकी मृत्यु हुई है, दो वर्ष पहले — तब उनकी उम्र दो सौ से कम नहीं थी। दो सौ से कम नहीं थी। बड़े समर्थ महात्मा थे।

उनके यहाँ मुझे रात को रखा गया। वहाँ मैंने एक बात देखी, एक घटना ऐसी देखी कि जिससे हम पागल होते-होते बचे, और नास्तिक होते-होते बचे।

गंगोत्री जहाँ मैं रहता था, गंगोत्री जहाँ मैं रहता था, वहाँ बाक़ी महात्मा तो ऐसे गर्मी के दिनों में आते थे और बाद में चले जाते थे, क्योंकि वहाँ जमती थी बर्फ। हमेशा बर्फ जमी रहती थी।

उन चार महीने बद्रीनाथ में भी भगवान के मंदिर के पट बंद हो जाते हैं। और भगवान को बंद करके लोग चले आते हैं। बहुत ठंड पड़ती है। गंगोत्री में भी ऐसा होता है।

गंगोत्री में से गंगा जी की मूर्ति को उठाकर के वहाँ से तीस मील दूर एक गाँव है — नाम भूल गया मैं इस वक़्त — वहाँ से कंधे पर रख करके उस मूर्ति को ले आते हैं, गाँव में ले आते हैं। वहीं पूजा-सेवा करते हैं।

और जब बर्फ पिघल जाती है, तब उस मूर्ति को कंधे पर रखकर के लाते हैं, फिर उस मंदिर में स्थापित कर देते हैं। वहाँ ले जाते हैं। बद्रीनाथ वहीं बंद रहते हैं, गंगोत्री ले आते हैं।

ठंड से वहाँ कोई रह नहीं सकता। वहाँ रहने के लिए थोड़े से महात्मा रह जाते थे।

वहाँ जब मैं था, मुझे एक साल के लिए रखा गया था। और मुझे तो ठहरना ही था। मैं उनकी आज्ञा का कैसे उल्लंघन करता? मुझे उसी साल रहना पड़ा।

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अखण्ड-ज्योति से



भय और मनोबल, अशुभ और शुभ चिन्तन आशंकाएं और आशाएँ सब मन के ही खेल हैं। इनमें पहले वर्ग का चुनाव जहाँ व्यक्ति को आत्मघाती स्थिति में धकेलता है वही दूसरे प्रकार का चुनाव उसे उत्कर्ष तथा प्रगति के लिए प्रेरित और प्रोत्साहित करता है। सर्वविदित है कि आत्मघात, व्यक्तित्व का हनन या असफलता का चुनाव व्यक्ति किन्हीं विवशताओं के कारण ही चुनता है। अन्यथा सभी अपना विकास, प्रगति और अपने अभियानों में सफलता चाहते हैं। जब सभी लोग सफलता और प्रगति की ही आकाँक्षा करते हैं तो मन में समाये भय के भूत को जगाकर क्यों असफलताओं को आमन्त्रित करता है? इसके लिए मन की उस दुर्बलता को उत्तरदायी ठहराया जा सकता है जिसे आत्मविश्वास का अभाव कहा जाता है।

प्रथम तो अशुभ चिन्तन और अमंगलकारी आशंकाओं से ही बचा जाना चाहिए। लेकिन यह स्वभाव में सम्मिलित हो गया है और अपने आपके प्रति अविश्वास बहुत गहरे तक बैठ गया तो उसके लिए भी प्रयत्न करना चाहिए। इस दिशा में सचेष्ट होते समय यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि हम स्वयं ही भय की रचना करते हैं, उसे बुलाते और अपनी हत्या के लिए आमन्त्रित करते हैं। यह जान लिया गया तो यह समझ पाना भी कठिन नहीं है कि स्वयं ही भय को नष्ट भी किया जा सकता है।

 

अपने लगाये पेड़ को स्वयं काटा भी जा सकता है और सन्दर्भों में यह बात लागू होती हो अथवा नहीं होती हो किन्तु मन के सम्बन्ध में यह बात शत प्रतिशत लागू होती है कि वह तभी भयभीत होता है, जब जाने अनजाने उसे भयभीत होने की आज्ञा दे दी जाती है। यह आज्ञा अशुभ आशंकाओं के रूप में भी हो सकती है और अतीत के कटु अनुभवों तथा दुःखद स्मृतियों के रूप में भी। कहने का आशय यह कि किसी भी व्यक्ति के मन में उसकी इच्छा और अनुमति के विपरीत भय प्रवेश कर ही नहीं सकता। तो भीरुता को अपने स्वभाव से हटाने के लिए पहली बात तो यह आवश्यक है कि भय को अपने मनःक्षेत्र में प्रवेश करने की अनुमति न दी जाए।

.... क्रमशः जारी
श्रीराम शर्मा आचार्य
 अखण्ड ज्योति जून 1981 पृष्ठ 21

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