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Tuesday 11, March 2025

शुक्ल पक्ष त्रयोदशी, फाल्गुन 2025




पंचांग 12/03/2025 • March 12, 2025

फाल्गुन शुक्ल पक्ष त्रयोदशी, पिंगल संवत्सर विक्रम संवत 2081, शक संवत 1946 (क्रोधी संवत्सर), फाल्गुन | त्रयोदशी तिथि 09:11 AM तक उपरांत चतुर्दशी | नक्षत्र मघा 04:05 AM तक उपरांत पूर्व फाल्गुनी | सुकर्मा योग 12:59 PM तक, उसके बाद धृति योग | करण तैतिल 09:12 AM तक, बाद गर 09:51 PM तक, बाद वणिज |

मार्च 12 बुधवार को राहु 12:27 PM से 01:55 PM तक है | चन्द्रमा सिंह राशि पर संचार करेगा |

 

सूर्योदय 6:34 AM सूर्यास्त 6:19 PM चन्द्रोदय 4:43 PM चन्द्रास्त 5:59 AM अयन उत्तरायण द्रिक ऋतु वसंत 

 

  1. विक्रम संवत - 2081, पिंगल
  2. शक सम्वत - 1946, क्रोधी
  3. पूर्णिमांत - फाल्गुन
  4. अमांत - फाल्गुन

तिथि

  1. शुक्ल पक्ष त्रयोदशी   - Mar 11 08:14 AM – Mar 12 09:11 AM
  2. शुक्ल पक्ष चतुर्दशी   - Mar 12 09:12 AM – Mar 13 10:36 AM

नक्षत्र

  1. मघा - Mar 12 02:15 AM – Mar 13 04:05 AM
  2. पूर्व फाल्गुनी - Mar 13 04:05 AM – Mar 14 06:19 AM


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SHRAVAN
POST

घृणित विचार, क्षणिक, उत्तेजना, आवेश हमारी जीवनी शक्ति के अपव्यय के अनेक रूप हैं। जिस प्रकार काले धुएँ से मकान काला पड़ जाता है, उसी प्रकार स्वार्थ, हिंसा, ईर्ष्या, द्वेष, मद, मत्सर के कुत्सित विचारों से मनो मन्दिर काला पड़ जाता है। हमें चाहिए कि इन घातक मनोविकारों से अपने को सदा सुरक्षित रक्खें। गंदे, ओछे विचार रखने वाले व्यक्ति से बचते रहें। वासना को उत्तेजित करने वाले स्थानों पर कदापि न जायं, गन्दा साहित्य कदापि न पढ़े। अभय पदार्थों का उपयोग सर्वथा त्याग दें।

शान्त चित्त से बैठकर ब्रह्म-चिन्तन, प्रार्थना, पूजा इत्यादि नियमपूर्वक किया करें, आत्मा के गुणों का विकास करें। सच्चे आध्यात्मिक व्यक्ति में प्रेम, ईमानदारी, सत्यता, दया, श्रद्धा, भक्ति और उत्साह आदि स्थाई रूप से होने चाहिए। दीर्घकालीन अभ्यास तथा सतत शुभचिंतन एवं सत्संग से इन दिव्य गुणों की अभिवृद्धि होती है।

अपने जीवन का सदुपयोग कीजिए। स्वयं विकसित होइये तथा दूसरों को अपनी सेवा, प्रेम, ज्ञान से आत्म-पथ पर अग्रसर कीजिए। दूसरों को देने से आपके ज्ञान की संचित पूँजी में अभिवृद्धि होती है।

हमारे जीवन का उद्देश्य भगवत्प्राप्ति या मुक्ति है। परमेश्वर बीजरूप से हमारे अन्तरात्मा में स्थित हैं। हृदय को राग, द्वेष आदि मानसिक शत्रुओं, सांसारिक प्रपंचों, व्यर्थ के वितंडावाद, उद्वेगकारक बातों से बचाकर ईश्वर-चिन्तन में लगाना चाहिए। दैनिक जीवन का उत्तरदायित्व पूर्ण करने के उपरान्त भी हममें से प्रायः सभी ईश्वर को प्राप्त कर ब्रह्मानन्द लूट सकते हैं।
एषा बुद्धिमताँ बुद्धिर्मनीषा च मनीषिणाम्।
यत्सत्यमनृतेनेह मर्त्येनाप्नोति माऽमृतम्॥
    
मानव की कुशलता, बुद्धिमत्ता साँसारिक क्षणिक नश्वर भोगों के एकत्रित करने में न होकर अविनाशी और अमृत-स्वरूप ब्रह्म की प्राप्ति में है।

 सब ओर से समय बचाइए; व्यर्थ के कार्यों में जीवन जैसी अमूल्य निधि को नष्ट न कीजिए, वरन् उच्च चिन्तन, मनन, ईशपूजन में लगाइए, सदैव परोपकार में निरत रहिए। दूसरों की सेवा, सहायता एवं उपकार से हम परमेश्वर को प्रसन्न करते हैं।

 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
 अखण्ड ज्योति, फरवरी १९५७ पृष्ठ ६

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होली उल्लास एवं उमंग का पर्व हैं | Holi Ullas va Umang Ka Parv Hai | श्रद्धेय डॉ प्रणव पण्ड्या

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भगवान का असली रूप क्या है ? Bhagwan Ka Sahi Roop Kya Hai |

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धर्म की प्रथम घोषणा | Dharm Ki Pratham Ghoshna

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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन

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गायत्री माता - अखंड दीपक
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चरण पादुका
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चरण पादुका
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प्रज्ञेश्वर महादेव - देव संस्कृति विश्वविद्यालय
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शिव मंदिर - शांतिकुंज
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हनुमान मंदिर - शांतिकुंज
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आज का सद्चिंतन (बोर्ड)

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आज का सद्वाक्य

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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन


!! आज के दिव्य दर्शन 12 March 2025 !! !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!

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!! परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी का अमृत सन्देश !!

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परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश



श्रद्धा और विश्वास अगर हमारे जीवन में हो, तो भगवान हमारे पास आएं। भगवान हमारे लिए जन्म लेंगे। भगवान ने अवतार कहां-कहां लिया था? भगवान ने बहुत जगह अवतार लिया था। एक कौशल्या के यहां, जहां अवतार लिया था, एक देवकी के यहां, अवतार लिया था। मैं कहता हूं, आपके यहां भगवान अवतार ले और आपके पेट में से भगवान अवतार ले, आपकी आंखों में से भगवान ले, और आपके दिमाग में अवतार ले। और जितनी आपकी श्रद्धा है, उतनी शक्ति से संपन्न भगवान हो करके आए और आपके लिए करता हुआ चला जाए। सारे के सारे सिद्ध पुरुषों का इतिहास यही है। यह रहस्य समझ में आता नहीं है। लोगों के सामने पत्थरों के सामने झक मारते हैं।  उसके पास जाएंगे, वहां चमत्कार है। उस देवता का चमत्कार है, उस देवी का चमत्कार है। बेटे, किसी का चमत्कार नहीं है, अपनी श्रद्धा का चमत्कार है। श्रद्धा तेरे पास है। हां, छाती पर हाथ रख, शीशे में अपना मुंह देख। अगर तेरे पास श्रद्धा है, तो मैं कहता हूं, तेरे पास जो भी देवी है, वही चमत्कार दिखा जाएगी। कौन-कौन देवी चमत्कार दिखा जाएगी?  एक स्वामी जी थे, एक पंडित जी थे। बस, वो जाते गंगा की जब धारा आती और गंगा का बहाव होता। बहुत से आदमी कहते, "नाव नहीं है, हम पार जाना चाहते हैं, कोई ऐसा मंत्र बता दीजिए, जिससे कि हम पार निकल जाएं और हम डूबने ना पाएं।" वह कहते, "छाती ठोक कर के तुझे डूबने नहीं देंगे, तो हमारे मंत्र को जप करता हुआ चला जा, और पार गंगा जी में, चाहे जितनी बाढ़ हो, तू पार हो जाएगा।" "कौन सा मंत्र है?"                                                                                     
"मेरे कान में बताऊंगा, ऊपर बताया था, राम-राम, राम-राम," कहता हुआ पार निकल जाता। ये मंत्र देख, मैंने दिया है, और असली मंत्र है। तू इसी को कहते हुए पार निकल जाना। पार निकल जाता, बेचारा पार हो जाता। एक थोड़ी दूर पर एक मुसलमान फकीर रहता था। मुसलमान उधर हो के निकलते हैं। वो कहते, "देखिए, हिंदुओं का जो फकीर है, उसके पास तो बड़ा भारी मंत्र है, और यह गारंटी करता है कि हमारे मंत्र को जपता हुआ कोई पार निकले गंगा जी में, हम डूबेगा नहीं, हमारी जिम्मेदारी है, और हर आदमी पार निकल जाता है, "और हमारे मुसलमानी धर्म में तो कोई बात, कोई मंत्र ऐसा है नहीं।"
मौलवी साहब कहते, "हमारे पास भी एक मंत्र है, हमारे पास वैसा ही मंत्र है, हमारे पास मंत्र कोई कम है क्या?" "तो आप बता दीजिए, मौलवी साहब," मौलवी साहब कान में बताते, "क्या बताऊं, बता देते।" और वह क्या कहता? वह कहता, "सिर्फ खुदा, खुदा कहते हुए निकल जा। डूब जाए, तो हमारी जिम्मेदारी है।" बस, खुदा, खुदा, खुदा, खुदा कहते हुए निकल जाते, मुसलमान सब पार निकल जाते हैं। और हिंदुओं को यह कहते हैं, "अरे, तुम्हारे पंडित जी का ही मंत्र नहीं है, हमारे मौलवी साहब का भी मंत्र है, उतना ही जबरदस्त है। दोनों का मंत्र अपनी-अपनी जगह बड़ा काम का है।" एक आदमी था, कैसा आदमी? आपके जैसा और हमारे जैसा चालाक, चालाक आदमी था। उसने कहा, "कुछ काम राम से निकालेंगे, कुछ काम खुदा से निकालेंगे, राम में भी चमत्कार है, और खुदा में भी चमत्कार है। राम का चमत्कार 50 परसेंट, खुदा का चमत्कार, दोनों से काम निकाल लेंगे। तो आधा घंटे में पार होते थे, 15 मिनट में पार हो जाएंगे, और 15 मिनट बचाएगा खुदा, और 15 मिनट बचाएगा राम। डबल फायदा हो जाएगा, डबल फायदा हो जाएगा।" बस, वो चला और बीच में से चला, "राम, खुदा, राम, खुदा, राम, खुदा" कहता हुआ चल पड़ा, डूब गया।

पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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अखण्ड-ज्योति से



धर्म का प्रथम आधार है - आस्तिकता, ईश्वर विश्वास। परमात्मा की सर्वव्यापकता, समदर्शिता और न्यायशीलता पर आस्था रखना, आस्तिकता की पृष्ठभूमि है। यह मान्यता मनुष्य की दुष्प्रवृत्तियों पर अंकुश रख सकने में पूर्णतया समर्थ होती है। सर्वव्यापी ईश्वर की दृष्टि में हमारा गुप्त-प्रकट कोई आचरण अथवा भाव छिप नहीं सकता। समाज की, पुलिस की आँखों में धूल झोंकी जा सकती है, पर घट-घटवासी परमेश्वर से तो कुछ छिपाया नहीं जा सकता ।

सत्कर्मों का या दुष्कर्मों का दण्ड आज नहीं तो कल मिलेगा ही, यह मान्यता वैयक्तिक एवं सामाजिक जीवन में नीति और कर्त्तव्य का पालन करते रहने की प्रेरणा देती है। सत्कर्म करने वाले को यदि प्रशंसा, मान्यता या सफलता नहीं मिली है तो ईश्वर भविष्य में देगा ही, यह आस्था उसे निराश नहीं होने देती और असफलताएँ मिलने पर भी वह सदाचरण के पथ पर आरूढ़ बना रहता है। इसी प्रकार कुकर्मी निर्भय नहीं हो पाता।
आस्तिकता धर्म का इसलिए प्रथम आवश्यक एवं अनिवार्य अंग माना गया है कि उससे हमारा सदाचरण अक्षुण्य बना रह सकता है।

पं श्रीराम शर्मा आचार्य
 युग निर्माण योजना - दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम-६६ (६.१०)

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