Thursday 13, February 2025
कृष्ण पक्ष द्वितीया, माघ 2025
पंचांग 14/02/2025 • February 14, 2025
फाल्गुन कृष्ण पक्ष द्वितीया, पिंगल संवत्सर विक्रम संवत 2081, शक संवत 1946 (क्रोधी संवत्सर), माघ | द्वितीया तिथि 09:52 PM तक उपरांत तृतीया | नक्षत्र पूर्व फाल्गुनी 11:09 PM तक उपरांत उत्तर फाल्गुनी | अतिगण्ड योग 07:20 AM तक, उसके बाद सुकर्मा योग | करण तैतिल 09:03 AM तक, बाद गर 09:52 PM तक, बाद वणिज |
फरवरी 14 शुक्रवार को राहु 11:09 AM से 12:31 PM तक है | 05:44 AM तक चन्द्रमा सिंह उपरांत कन्या राशि पर संचार करेगा |
सूर्योदय 7:02 AM सूर्यास्त 6:00 PM चन्द्रोदय 7:48 PM चन्द्रास्त 8:24 AM अयन उत्तरायण द्रिक ऋतु शिशिर
- विक्रम संवत - 2081, पिंगल
- शक सम्वत - 1946, क्रोधी
- पूर्णिमांत - फाल्गुन
- अमांत - माघ
तिथि
- कृष्ण पक्ष द्वितीया
- Feb 13 08:22 PM – Feb 14 09:52 PM - कृष्ण पक्ष तृतीया
- Feb 14 09:52 PM – Feb 15 11:52 PM
नक्षत्र
- पूर्व फाल्गुनी - Feb 13 09:07 PM – Feb 14 11:09 PM
- उत्तर फाल्गुनी - Feb 14 11:09 PM – Feb 16 01:39 AM
SHRAVAN
भगवान के आदर्शों की शक्ति को महसूस करें और अपना जीवन बदलें | The name of ideals is God |
अमृतवाणी:- यज्ञ से वातावरण और वायुमण्डल परिशोधन | Yagya Se Vatavaran Aur Vayumandal
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! आज के दिव्य दर्शन 14 February 2025 !! !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
!! परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी का अमृत सन्देश !!
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
जो कुछ भी आप देखते हैं, इधर से उधर, जो जिंदगी भर भी हमने इतने बड़े काम किए हैं, कितने बड़े काम किए हैं। 2400 तो गायत्री शक्तिपीठ ही बना दी है। इनके बनाने में कितना रुपया खर्च हुआ होगा। यह सब लोगों के सहयोग के ऊपर है। सहयोग ना हुआ होता, तब मिशन ऐसे कैसे बढ़ा होता। 2400 शक्तिपीठें कैसे बन गई होती। 12000 यह जो युग विद्यालय पुस्तकालय कैसे बन गए होते, यह संभव नहीं थे, बन नहीं सकते थे। सहयोग है लोगों का, लोग हमारे ऊपर यकीन करते हैं और जो जिस काम के लिए हम कहते हैं, उस काम के लिए लोग बाग बराबर हमारा सम्मान करने को तैयार रहते हैं।
देवीय अनुग्रह, भगवान का अनुग्रह, भगवान का अनुग्रह कैसे होता है, मालूम है आपको। पुराणों में लिखा हुआ है कि फूल बरसते हैं ऊपर से। फूल बरसते हैं, देवता फूल बरसाते हैं, फूल बरसाते हैं देवता और कुछ देते हैं, और कुछ नहीं देते। देवताओं के पास कुछ नहीं है, बेचारों के पास फूल हैं। और हमारे ऊपर 24 घंटे में फूल बरसते रहते हैं। कैसे बरसते रहते हैं, जिसको हम प्रोत्साहन कह सकते हैं, प्रेरणाएं कह सकते हैं, साहस कह सकते हैं, उत्साह कह सकते हैं, उम्मीदें कह सकते हैं। यह इससे भरा हुआ रहता है फूल, इन्हीं का नाम है। उत्साह का नाम फूल है, साहस का नाम फूल है, हिम्मत का नाम फूल है, उमंग का नाम फूल है, उत्साह का नाम फूल है, इन्हीं का नाम फूल है। देवता यह बराबर बरसाते रहते हैं हमारे ऊपर।
बस यह तीन चीजें सिद्धियां हैं, तीनों सिद्धियां हैं और हमको बराबर इसी रूप में मिली है। पिता की संपदा पर अधिकार हमको मिला है, क्योंकि हम पिता के सच्चे बेटे हैं। सच्चे बेटे हैं, कैसे हैं सच्चे बेटे हैं, इस मायने में कि उसका कुल को हमने कलंकित नहीं किया। जिस कुल में हम पैदा हुए हैं, भगवान के कुल में पैदा हुए हैं, ऋषियों के कुल में पैदा हुए हैं, संतो के कुल में पैदा हुए हैं, ब्राह्मण के कुल में पैदा हुए हैं और हमने इस कुल को कलंकित नहीं किया है। हमने अपने पिता की लाज रखी। एक पिता का बेटा कैसा होना चाहिए और हमने अपने पिता के व्यवसाय का संचालन किया है। उसकी जो तिजारत होती है, उस तिजारत में हमने बराबर हाथ बटाया है। हमने बराबर हाथ बंटाया है उसकी इस सृष्टि में किस तरीके से उसके इस तिजारत को, उसके व्यवसाय को, उसके इस दुनिया को, उसके उद्यान को, उसके बगीचे को बढ़िया होना चाहिए। हमने यह निरंतर किया है और पिता की संपदा पर अधिकार किया है। पिता के परिवार का भी पालन किया है। केवल उसकी तिजारत को ही नहीं चलाया है, केवल उस सृष्टि का जो स्वरूप है, उसको ही नहीं निखारा है, बल्कि हमने यह भी किया है कि हम मनुष्यों को सुसंस्कृत और उन्हें समुन्नत बनाने के लिए जो कुछ भी हमसे संभव था, वह हमने सब कुछ किया है। इसलिए हमारा पिता हमारा पिता हमसे प्रसन्न है।
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड-ज्योति से
मनुष्य की मूल शक्ति विचारणा है। उसी के आधार पर इतनी प्रगति कर सकना उसके लिए सम्भव हुआ है। समस्याएँ विचारों की विकृति से उत्पन्न होती हैं और उनका समाधान दृष्टिकोण बदलने से निकलता है। सचमुच जो जैसा सोचता है, वह वैसा ही बनकर रहता है। सोचने की दिशा में ही क्रिया बनती है और उसी की परिणति परिस्थितियों के रूप में सामने आती है। परिस्थितियों का अपने आप में कोई स्वतंत्र आधार नहीं है। वे हमारे कर्तृत्व का परिणाम मात्र हैं। इसी प्रकार कर्तृत्व भी अपने आप नहीं बन जाता है, विचारों की प्रेरणा ही हमारी कार्य पद्धति के लिये पूरी तरह उत्तरदायी होती है। इस तथ्य को समझ लेने पर ही आज की मानवीय समस्याओं का कारण और निवारण ठीक तरह समझा जा सकता है।
खेद है कि अब तक इस प्रकार का चिन्तन नहीं के बराबर हुआ है जो हुआ है उसको महत्त्व नहीं दिया गया। हमारे मूर्धन्य व्यक्ति इतना भर सोचते रहे है कि शासनतंत्र के माध्यम से सुविधा-साधन बढ़ा देने से मनुष्य सुखी रहने लगेगा और अपनी उलझनें सुलझा लेगा। पर देखते हैं कि वह मान्यताएँ गलत सिद्ध होती चली जा रही हैं। शासन तंत्र को सुधारने के लिये जितने हाथ-पैर पीटे जाते हैं उतनी ही उससे विकृतियाँ उत्पन्न होती चली जा रही हैं। अर्थ-तंत्र से नि:संन्देह कई प्रकार की सुविधाएँ उत्पन्न की हैं पर परिणाम उलटा ही रहा है। तथाकथित प्रगति की जड़ें बिलकुल खोखली हैं, किसी भी धक्के में वह लडख़ड़ा सकती है। स्थायी प्रगति और सुदृढ़ समर्थता के लिए चरित्र बल होना चाहिए और वह उत्कृष्ट विचारणा की भूमि पर ही उग सकता है।
ज्ञान-यज्ञ देखने-सुनने में छोटी बात लगती है, पर उसकी सम्भावनाएँ उतनी विशाल हैं कि यदि ठीक तरह इस अभियान को चलाया जा सका तो विश्वास है कि लोक-मानस में विवेकशीलता और सत्प्रवृत्तियों की गहरी स्थापना सम्भव हो सकेगी और नये युग के अवतरण का स्वप्न साकार किया जा सकेगा।
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
युग निर्माण योजना - दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम-66 (4.44-46)
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