Thursday 13, March 2025
शुक्ल पक्ष पूर्णिमा, फाल्गुन 2025
पंचांग 14/03/2025 • March 14, 2025
फाल्गुन शुक्ल पक्ष पूर्णिमा, पिंगल संवत्सर विक्रम संवत 2081, शक संवत 1946 (क्रोधी संवत्सर), फाल्गुन | पूर्णिमा तिथि 12:24 PM तक उपरांत प्रतिपदा | नक्षत्र उत्तर फाल्गुनी | शूल योग 01:23 PM तक, उसके बाद गण्ड योग | करण बव 12:24 PM तक, बाद बालव 01:26 AM तक, बाद कौलव |
मार्च 14 शुक्रवार को राहु 10:57 AM से 12:26 PM तक है | 12:56 PM तक चन्द्रमा सिंह उपरांत कन्या राशि पर संचार करेगा |
सूर्योदय 6:32 AM सूर्यास्त 6:20 PM चन्द्रोदय 6:34 PM चन्द्रास्त 6:52 AM अयन उत्तरायण द्रिक ऋतु वसंत
- विक्रम संवत - 2081, पिंगल
- शक सम्वत - 1946, क्रोधी
- पूर्णिमांत - फाल्गुन
- अमांत - फाल्गुन
तिथि
- शुक्ल पक्ष पूर्णिमा
- Mar 13 10:36 AM – Mar 14 12:24 PM - कृष्ण पक्ष प्रतिपदा
- Mar 14 12:24 PM – Mar 15 02:33 PM
नक्षत्र
- उत्तर फाल्गुनी - Mar 14 06:19 AM – Mar 15 08:54 AM
SHRAVAN
!! आप सभी को होली के पावन पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं !!
रंग बसन्ती प्रभा केशरी, पर्व होली का आ गया | Rang Basanti Prabha Kesari |
क्या ध्यान के लिए एकाग्रता जरूरी है ? Kya Dhyan Ke Liye Ekagrata Jaruri Hai
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! आज के दिव्य दर्शन 14 March 2025 !! !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
!! परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी का अमृत सन्देश !!
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
हमने गायत्री मंत्र की उपासना की, आप वैसी ही करना चाहते हो तो मैं फिर कहता हूं कि हमारे जीवन में जो कुछ भी प्रत्यक्ष चमत्कार पहले लोगों की तो गवाही नहीं देता, मैं क्योंकि आप कहेंगे, पहले लोगों की आप गवाहियाँ देते हैं, वह तो बढ़ी-चढ़ी हो सकती हैं, उसमें मिथ्या बातें भी हो सकती हैं, पर हमारी बात तो मिथ्या नहीं हैं। आप परीक्षा कर सकते हैं, देख सकते हैं, हर बात की कसौटी दे सकते हैं। जो मैंने सात लाभ आपको बताए थे, और वह लाभ आपको बताए नहीं हैं, बंद है वह लाभ। कौन से वाले जिनके कि मैं सबूत पेश नहीं करना चाहता? कर तो सकता हूं, पर पेश करना नहीं चाहता, जो मेरे आध्यात्मिक जीवन से संबंधित रखते हैं। भौतिक जीवन के साथ बात बताई थी आपको, संसार की आध्यात्मिकता की मैंने नहीं बताई है। कोई आध्यात्मिकता की बात, बात को मालूम करना हो तो मेरे मरने के बाद मालूम करना। अभी मैंने ताकि लोगों के पास ये बातें न फैलने पाएं। ये बड़े करामाती थे और चमत्कारी थे। यह बात मैं नहीं फैलाना चाहता, क्योंकि मैं धर्म सेवक बनके रहना चाहता हूं। धर्म प्रचारक के रूप में मुझे भेजा है, मैं धर्म प्रचारक के रूप में रहूंगा। मैं सिद्ध पुरुष नहीं बनना चाहता। सिद्ध पुरुष नहीं बनना चाहता, सिद्ध पुरुष बनूंगा तो जो मैं इन लोगों को समझाना चाहता हूं, समझेगा ही नहीं। जो आदमी आवेगा, खुशामद करता ही चला आवेगा। जो आदमी को कहूंगा, "क्यों भाई?" युग निर्माण? हां, महाराज जी, हम तो बड़े भारी युग निर्माण में लग गए, और जब से हमने युग निर्माण ही करते रहे, हम तो खाते भी युग निर्माण ही हैं, और टट्टी भी युग निर्माण में ही किया करते हैं, और चलते भी युग निर्माण पे ही हैं, और युग निर्माण सपने में भी युग निर्माण दिखता है।
क्यों कह रहा है? इसीलिए कह रहा है कि गुरु जी की हां में हां मिला दूंगा, गुरु जी की हां में हां मिला दूंगा, और गुरु जी को प्रसन्न कर दूंगा। तो खट से जो कुछ चाहेंगे, सो ही आशीर्वाद दे देंगे। यह कह दूंगा, मैं जानता हूं आपकी आदत। इसीलिए मैं चमत्कारी नहीं बनना चाहता।
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड-ज्योति से
"होली आई रे!" आज होली के दिन यह मस्ती भरी गूँज बाहर चारों ओर है, लेकिन यदि अंतर्चेतना में भक्ति जाग्रत् हो गई हो तो अपने हृदय की ब्रजभूमि में भी इसे हर पल अनुभव किया जा सकता है। इसकी अनूठी भस्ती में डूबा जा सकता है। बड़ा मधुर साम्य है, भक्त के जीवन और होली के त्योहार में। भक्त के जीवन में भी पहले उठती हैं तप की ऊँची और चमकती ज्वालाएँ। एक पर एक अगणित कष्ट आते ही चले जाते हैं। घर-परिवार और समाज के लोग उसे भगवान् की ओर बढ़ते हुए देखकर तरह-तरह की बाधाएँ खड़ी करते हैं। अपने अंतर्मन के कुसंस्कार, जन्म-जन्मांतर के दुष्कर्म, वासनाएँ भी अवरोधों की झड़ी लगा देती हैं, पर ज्यों-ज्यों अवरोध बढ़ते हैं, त्यों-त्यों भक्त की प्यास बढ़ती है। उसके तप में चमक आती है।
तप की इस प्रचंड अग्नि में वासनाओं की होलिका जलती है। कभी न मरने का दावा करने वाली, अपने को अमिट समझने वाली वासनाएँ जलकर राख हो जाती हैं। भक्त की पुकार के सामने अवरोध टिकते नहीं। यह पुकार ही तो भक्त का तप है। अपने प्यारे प्रभु को भक्त पुकारता है। जीवन की हर कठिनाई-वासना के हर भयावह रूप के सामने, कुसंस्कारों के हर बहकावे पर भक्त को एक ही समाधान सूझता है कि वह अपने आराध्य को पुकार ले। उसकी जिह्वा नहीं, प्राण पुकारते हैं। वह कहता है, "प्रभु हम आना चाहें तुम तक तो हम आ भी कैसे सकेंगे? हमारे पाँव बहुत छोटे हैं। तुम ही चले आओ, हे सर्व-समर्थ मेरे आराध्य!" इस तरह भक्त अपनी प्यास को, अपनी पुकार को उभारता है। उसका यह पुकार, उसकी प्यास सघन होती जाती है। एक उन्मत्त अग्नि बन जाती है, विकल प्राणों से उपजी तप की अग्नि।
तप की इस प्रचंड अग्नि में वासनाओं की होलिका जलती है, जलकर राख होती है। कुसंस्कारों का घास-फूस, जन्म-जन्मांतरों का कूड़ा-कचरा जलकर भस्म हो जाता है। रूपांतरित हो जाता है जीवन। नवधा भक्ति की नवरंगी फुहारें उसके हृदय में उठने-उफनने लगती हैं। भक्ति के रंगों की सम्मोहक छटा उसके जीवन में छा जाती है। भक्त को अपने आराध्य की कृपा से एक नई दृष्टि मिलती है और उसे होलिकोत्सव के नजारे नजर आने लगते हैं। उसे महसूस होता है कि होली का त्योहार वह अकेला नहीं समूची प्रकृति उसके साथ मना रही है।
प्रकृति के समस्त विस्तार में उत्सव-ही-उत्सव है। नाद-ही-नाद है। सब तरह के साज बज रहे हैं। पक्षियों में, पहाड़ों में, वृक्षों में, सागरों में, सब तरफ बहुत-बहुत ढंगों और रूपों में परमात्मा होली खेल रहा है। कितने रंग फेंकता है, कितनी गुलाल बिखेरता है, लेकिन इस अनूठे उत्सव को पाते वही हैं, मनाते वही हैं, जो भक्ति के रस में पगे हैं, जो अपने तप की ज्वालाओं में वासनाओं की होलिका को जला चुके हैं। होलिकादहन के बाद ही तो होली का त्योहार मनाने का विधान है।
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति मार्च 2002 पृष्ठ 35
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