Sunday 13, October 2024
शुक्ल पक्ष एकादशी, आश्विन 2081
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SHRAVAN
अखिल विश्व गायत्री परिवार प्रतिनिधि एवं देव संस्कृति विश्वविद्यालय प्रतिकुलपति आदरणीय डॉ. चिन्मय पंड्या जी बाल्टिक देशों के प्रवास के क्रम में विल्नियस, लिथुआनिया पहुंचे और भारतीय राजदूत माननीय श्री देवेश उत्तम जी, लिथुआनिया के विदेश सचिव श्री जूलियस प्रणवेसिउस और विल्नियस विश्वविद्यालय के निदेशक एवं विख्यात इंडोलॉजिस्ट श्री ऑड्रियस बिनियोरिस के साथ सुखद भेंटवार्ता संपन्न की।
गायत्री परिवार - प्रेम से प्रकाश की ओर... | Resp. Dr. Chinmay Pandya
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! आज के दिव्य दर्शन 14 October 2024 !! !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
!! आज के दिव्य दर्शन 14 October 2024 !! !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
अमृत सन्देश:-
गायत्री उपासना के बारे में अनुसंधान | Gaytatri Upasana Ke Bare Mei Anusandhan
Pt Shriram Sharma Acharya Ji
कोई आदमी यह कलंक लगाने न पाए गुरू जी ने स्वयं तो गायत्री उपासना की थी और लोग उनको गायत्री का सिद्ध पुरूष कहते थे और यह कहते थे गायत्री माता का आचार्य जी ने साक्षात्कार किया है। गायत्री स्वरूप में लोग कहते हैं इसमें मिलावट भी हो सकती है और बड़ी बात भी हो सकती है। लेकिन जहां तक मैं समझता हूं, मैंने गायत्री के बारे में जानकारी प्राप्त करने में कोई कमी नहीं रखी है और उसका अनुसंधान करने में मैंने अपने व्यक्तिगत जीवन में कोई चूक नहीं की है.....
अखण्ड-ज्योति से
छिद्रान्वेषण की वृत्ति अपने अन्दर हो तो संसार के सभी मनुष्य दुष्ट दुराचारी दिखाई देंगे। ढूँढ़ने पर दोष तो भगवान में भी मिल सकते है, न हों तो थोपे जा सकते हैं। कोई हानि होने या आपत्ति आने पर लोग करने भी हैं। कई तो अपने ऊपर आई हुई आपत्ति का कारण तक पूजा को मान लेते हैं और उसी पर सारा दोष थोपकर छोड़कर अलग हो जाते हैं।
मनुष्यों में दोष ढूँढ़ते रहने पर तो उनमें असंख्य दोष निकाले या सोचे जा सकते हैं। ऐसी छिद्रान्वेषी प्रकृति के लोगों को सारी दुनियाँ बुराइयों से भरी हुई दुष्ट दुराचारी और अपने प्रति शत्रुता रखने वाली दिखाई देती हैं। उन्हें अपने चारों ओर नारकीय वातावरण दृष्टिगोचर होता है। निन्दा और आलोचना के अतिरिक्त कभी किसी के प्रति अच्छे भाव वे प्रकट ही नहीं कर पाते किसी की प्रशंसा उनके मुख से निकलती ही नहीं। ऐसे लोग अपनी इस क्षुद्रता के कारण ही सब के बुरे बने रहते हैं।
पीठ पीछे की हुई निन्दा नमक-मिर्च मिलकर उस आदमी के पास जा पहुँचती है जिसके बारे में बुरा अभिमत प्रकट किया गया था। आमतौर पर सुनने वाले लोग अपनी विशेषता प्रकट करने के लिए उस सुनी हुई बुराई को उस तक पहुँचा देते हैं जिसके संबंध में कटु अभिमत प्रकट किया गया था ऐसी दशा में वह भी प्रतिरोध की भावना में शत्रुता का ही रुख धारण करता है और धीरे−धीरे उसके विरोधी एवं शत्रुओं की संख्या बढ़ती जाती है।
रूठे बैठे रहने वाले, मुँह फुलाकर बात करने वाले, भौहें बढ़ाये रहने वाले और कर्कश स्वर में बोलने वाले व्यक्ति किसी के मन में अपने लिए आदर भाव प्राप्त नहीं कर सकते उन्हें बदले में द्वेष, घृणा, विरोध ही उपलब्ध होते हैं। अपना मन हर घड़ी खिन्न, संतप्त और क्षुभित रहता है उसकी जलन से होने वाले शारीरिक एवं मानसिक दुष्परिणामों की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति जून 1962
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