Tuesday 15, July 2025
अमृतवाणी:- नया युग, नई दिशाएं, नया मनुष्य | Naya Yug Nayi Dishayen Naya Manushay
बृहत्तर परिवारों की संरचना एक सामयिक आवश्यकता |Rishi Chintan Youtube Channel
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! शांतिकुंज दर्शन 15 July 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
अमृतवाणी: मांगने से पहले योग्य बनो | पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
हमारे पास जो शक्तियाँ हैं, और सामथ्र्य हैं और जो साधन है उनका हम ठीक तरीके से उपयोग कर सके तो बेटे हम निहाल हो सकते हैं नई चीजें पाने की जरूरत क्या है? तुझें जो चीजें हैं पहले उनको तो इस्तेमाल कर ले नई चीजें दिलवाई, नया पैसा दिलवाई है हम बेटे नया पैसे दिलवाएंगे तुझे हमारी जिम्मेदारी है पर तू पहले यह बता कि जो पैसा तुझे मिलता रहा है उसको तूने खर्च कहाँ किया? बस हम यह तेरी तमीज, और तेरी औकात, तेरी अकल और तेरी पात्रता इस आधार पर करेंगे तुझें जो मिलता रहा है वो खर्च कहाँ करता है? पहले यह बता नहीं साहब आपको क्या मतलब है? इससे हम चाहे जैसे खर्च करेंगे आप तो पैसा दिलवाईये नहीं हम नहीं दिलवाएंगे तुझें पैसा पहले तो यह बात बता तू कहाँ खर्च करता है? तू किस काम के लिए माँगता है? नहीं साहब हम चाहे जैसे खर्च कर सकते हैं नहीं चाहे जैसे नहीं खर्च कर सकते पैसा मिलता है पात्रता के हिसाब से गांधी जी को लोगों ने पैसे दिए और एक दिन एक पैसा जमीन पर गिर पड़ा गिर पड़ा बड़ी भारी भीड़ थी गांधीजी बैठ गये जमीन पर और जमीन में से रेत में से उस पैसे को तलाश करने लगे लोगों ने यह पूछा, एक पैसे के लिए आप क्यों समय खराब करते हैं? हम आपको और दूसरा पैसा दे देंगे और आप चलिए यहाँ समय खराब होता है उन्होंने कहा आपके लिए शायद पैसे की कीमत कम हो सकती है लेकिन जिस आदमी ने अपना पेट काटकर के इस जिम्मेदारी से मुझे दिया था कि मेरे पैसे का सही इस्तेमाल होगा उसको मैं अब क्या जवाब दूँगा यह बताइए? उसको मैं अब क्या जवाब दूँगा? उसने यह समझ कर दिया था गाँधी इस पैसे का ठीक इस्तेमाल करेगा और मैं ठीक इस्तेमाल नहीं कर सका और मैंने इसको गवाँ दिया मैं उसको क्या जवाब दूँगा? बेटे आपको तरह-तरह की चीज माँगने से पहले तरह-तरह की फरमाइशें करने से पहले यह देखना पड़ेगा कि आप में इतनी तमीज और इतनी योग्यता और इतनी पात्रता है कि कोई चीज आपको भगवान दे तो आप भगवान की दी हुई चीजों का इस्तेमाल कर सके अपने हाथ पाँव से कमाइए, बिगाड़िये भगवान से क्या मतलब है? नहीं साहब हम तो महात्मा जी से माँगेंगे सत्पुरुष से माँगेंगे हाँ सत्पुरुष भी दे सकते हैं और महात्मा भी दे सकते हैं देवता भी दे सकते हैं और देते हैं और दे रहे हैं लेकिन तू बता करेगा क्या? नहीं महाराज जी आपको क्या मतलब है? नहीं बेटे हमको मतलब है हम तेरी औकात और तेरा व्यक्तित्व और तेरी तमीज और तेरा अज्ञानता और ज्ञान और तेरी पात्रता इस बात से हम नहीं जान सकते कि तूने क्या कमाया? तूने खर्च कैसे किया सीधी बात बता खर्च कैसे किया? तेरे पास जो अक्ल है उसका तू कहाँ खर्च करता है? मुझे यह बता मैं तुझे नई अकल दूँगा।
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड-ज्योति से
नयी व्यवस्था के अनुसार जहाँ भी कम से कम 10 सदस्य सूत्रबद्ध हो सके वहाँ परिवार शाखा की स्थापना की जानी चाहिए तथा उसकी समुचित व्यवस्था बनाई जानी चाहिए-
अपनी श्रद्धा एवं तत्परता के आधार पर अंशदानी व्रतधारी परिजन, वरिष्ठ सदस्य कहे जावेंगे उन्हीं में से न्यूनतम पाँच एवं अधिकतम दस सदस्यों की एक कार्यकारिणी समिति बनायी जायेगी। उन्हीं में से एक को कार्यवाहक नियुक्त कर दिया जाय। सबसे योग्य व्यक्ति ही कार्यवाहक बने यह आवश्यक नहीं। जो पर्याप्त समय दे सके तथा सबसे संपर्क सूत्र बनाये रख सके, ऐसे ही किसी प्रामाणिक कर्मठ सदस्य को कार्यवाहक मान लिया जाय। अन्य वरिष्ठ सदस्य उसे सहयोग एवं मार्ग दर्शन देते रहे। बड़े स्थानों पर जहाँ एक ही व्यक्ति को संपर्क सूत्र बिठाने में कठिनाई होती हो, वहां एक से अधिक कार्यवाहक भी नियुक्त किए जा सकते हैं।
जहाँ परिवार शाखा में सदस्यों की संख्या अधिक हो वहाँ उन्हें कई टोलियों में बाट लेना चाहिए। टोलियाँ दस से बीस व्यक्तियों तक की रहे। हर टोली किसी सुनिश्चित क्षेत्र एवं सुनिश्चित कार्यों का उत्तरदायित्व सँभालें। महिला जागरण के लिए महिलाओं की टोलियाँ भी बनाई जाये। महिला जागरण भी युग निर्माण परिवार के कार्यों का ही एक अंग है, अतः हर परिवार शाखा का इसके लिए भी कटिबद्ध होना ही चाहिए। महिलाओं में महिलाएँ ही ठीक से कार्य कर सकती है। इसलिए महिला टोलियों का गठन तथा महिला कार्यवाहिका की नियुक्ति भी की जानी चाहिए।
कार्यवाहक-कार्यवाहिका की नियुक्ति मथुरा से कराई जाय। कभी परिवर्तन की आवश्यकता हो तो किसी केन्द्रीय प्रतिनिधि की उपस्थिति में यह कार्य सहज भाव से कर लिया जाय। अपने संगठनों को चुनाव के झंझट एवं पदलोलुपता के विष से बचाना आवश्यक है। सारे कार्य परिवार भाव से चलाये जाने चाहिए। परिवार शब्द हमें अत्यन्त प्रिय है। उसमें वे सभी विशेषताएँ जुड़ी हुई है जो इस धरती पर स्वर्ग के अवतरण के लिए आवश्यक है। हम सदैव से परिवार संस्था की गरिमा बखानते रहे हैं। आदर्श परिवार, व्यक्तित्व निर्माण की पाठशाला एवं नररत्नों की खदान सिद्ध हो सकते हैं। व्यक्ति ओर समाज को जोड़ने वाली शृंखला भी यही है। स्वस्थ पारिवारिक भावना जितनी व्यापक होती जाएगी, उसी अनुपात से मनुष्यों के बीच आत्मीयता एवं सहकारिता बढ़ेगी और उदार आदान प्रदान का पथ प्रशस्त होगा।
आदर्श परिवार वही है जिसके सदस्य एक दूसरे का हित साधन ही अपना सर्वोत्तम स्वार्थ समझते हो तथा अधिकार छोड़ने एवं कर्तव्य पालन के लिए तत्पर रहते हो। यह दिव्य वृत्तियाँ परिवारों में ही विकसित हो सकती है। आरम्भिक अभ्यास, व्यक्तिगत परिवार की छोटी व्यायामशाला में भी किया जा सकता है। किन्तु मात्र इतना ही पर्याप्त नहीं। वंश परिवार को विश्व परिवार के रूप में विकसित करना होगा। वसुधैव कुटुम्बकम् के आदर्श जब व्यवहार में उतरेंगे तभी सतयुग का पुनरागमन होगा। पारिवारिकता की भावना का उत्थान अभ्युदय ही समाज निर्माण का, विश्व शान्ति का, मानवी उज्ज्वल भविष्य का एकमात्र आधार है।
परिवार शब्द हमारी नस नस में उत्साह भर देता है। उसका निखरा हुआ स्वरूप कही भी बनता दिखे, तो आँखें चमकने लगती है। गायत्री परिवार, युग निर्माण परिवार, नामकरण हम इसी दृष्टि से करते रहे हैं। इस नामकरण के साथ ही हम वह भाव भी पिरो देना चाहते हैं, जो हमें पुलकित करता रहता है। हम अपने पीछे ऋषि परम्परा के अनुकूल एक आदर्श परिवार छोड़ जाना चाहते हैं। इसलिए उसके सदस्यों में ऐसे लोगों को ही सम्मिलित करना चाहते हैं, जिनमें उर्वरता के व उत्कृष्टता के, जीवन और जागृति के कुछ चिन्ह पहले से ही विद्यमान हो, इन मौलिक गुणों के चिन्ह जहाँ होगे, वहाँ अपने परिश्रम का भी कुछ परिणाम निकलेगा। इन दिनों, इस गुरु पूर्णिमा पर हम अपने परिवार का पुनर्जीवन इसी दृष्टि से कर रहे हैं। उनके विकास तथा पुष्टि के लिये कुछ सुगम किन्तु प्रभावशाली कार्यक्रम नियमित रूप से अपनाने का आग्रह भी किया गया है।
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति जुलाई १९७७ पृष्ठ ५४
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