Tuesday 15, October 2024
शुक्ल पक्ष चतुर्दशी, आश्विन 2081
आज का पंचांग • अक्टूबर 16, 2024
आज का हिन्दू पंचांग हिंदी में: आज 16 अक्टूबर, 2024 बुधवार आश्विन माह के शुक्ल पक्ष चतुर्दशी तिथि है | हिन्दू कैलेंडर और पंचांग से जाने आज का शुभ मुहूर्त, अशुभ समय और राहुकाल |
Aaj Ka Panchang (October 16, 2024) - आश्विन शुक्ल पक्ष चतुर्दशी, पिंगल संवत्सर विक्रम संवत 2081, शक संवत क्रोधी 1946, आश्विन |आज है शरद पूर्णिमा and काजोगरा पूजा|
आज चतुर्दशी तिथि 08:40 PM तक उपरांत पूर्णिमा | नक्षत्र उत्तरभाद्रपदा 07:17 PM तक उपरांत रेवती | ध्रुव योग 10:09 AM तक, उसके बाद व्याघात योग 05:56 AM तक, उसके बाद हर्षण योग | करण गर 10:31 AM तक, बाद वणिज 08:41 PM तक, बाद विष्टि | आज राहु काल का समय 12:02 PM - 01:27 PM है | आज चन्द्रमा मीन राशि पर संचार करेगा |
सूर्योदय6:24 AM | सूर्यास्त5:41 PM | चन्द्रोदय5:01 PM.| \चन्द्रास्त5:54 AM | अयनदक्षिणायन | द्रिक ऋतुशरद
- विक्रम संवत - 2081, पिंगल
- शक सम्वत - 1946, क्रोधी
- पूर्णिमांत - आश्विन
- अमांत - आश्विन
तिथि
- शुक्ल पक्ष चतुर्दशी
- Oct 16 12:19 AM – Oct 16 08:40 PM - शुक्ल पक्ष पूर्णिमा
- Oct 16 08:40 PM – Oct 17 04:56 PM
नक्षत्र
- उत्तरभाद्रपदा - Oct 15 10:08 PM – Oct 16 07:17 PM
- रेवती - Oct 16 07:17 PM – Oct 17 04:20 PM
SHRAVAN
अनेक महत्त्वपूर्ण विधाएँ गुरु के माध्यम से प्राप्त की जाती हैं और तंत्र विद्या का प्रवेश द्वार तो अनुभवी मार्गदर्शक के द्वारा ही खुलता है। अक्षराम्भ यद्यपि हमारी दृष्टि में सामान्य सी बात है, पर छोटा बालक उस कार्य को अध्यापक के बिना अकेला ही पूर्ण करना चाहे, तो नहीं कर सकता, भले ही वह कितना ही मेधावी क्यों न हो। गणित, शिल्प, सर्जरी, साइन्स, यन्त्र निर्माण आदि सभी महत्त्वपूर्ण कार्य अनुभवी अध्यापक ही सिखाते हैं। कोई छात्र शिक्षक की आवश्यकता न समझे और स्वयं ही यह सब सीखना चाहे, तो उसे कदाचित्ï ही सफलता मिले। रोगी को अपनी चिकित्सा कराने के लिए किसी अनुभवी चिकित्सक की शरण लेनी पड़ती है, यदि वह अपने आप ही इलाज करने लगे, तो उसमें भूल होने की सम्भावना रहेगी, क्योंकि अपने संबंध में निर्णय करना हर व्यक्ति के लिए कठिन होता है।
अपनी निज की त्रुटि, अपूर्णता, बुराई, स्थिति एवं प्रगति के बारे में कोई बिरला ही सही अनुमान लगा सकता है। जिस प्रकार अपना मुँह अपनी आँखों से नहीं देखा जा सकता, उसके लिए दर्पण की या किसी दूसरे से पूछने की आवश्यकता पड़ती है, उसी प्रकार अपने दोष-दुर्गुणों का, मनोभूमि का, आत्मिक स्तर का एवं प्रगति का भी पता अपने आप नहीं चलता, कोई अनुभवी ही इस संबंध में विश्लेषण कर सकता है और उसी के द्वारा उद्धार एवं कल्याण का मार्गदर्शन किया जा सकता है। जिसने कोई रास्ता स्वयं देखा है, कोई मंजिल स्वयं देखी है, कोई मंजिल स्वयं पार की है, वही उस रास्ते की सुविधा-असुविधाओं को जानता है, नये पथिक के लिए उसी की सलाह उपयोगी हो सकती है। बिना किसी से पूछे स्वयं ही अपना रास्ता आप बनाने वाले संभव हैं, मंजिल पार कर लें, निश्चित रूप से उन्हें कठिनाई उठानी पड़ेगी और देर भी बहुत लगेगी। इसलिए जब तक सर्वथा असंभव ही न हो जाय, तब तक मार्गदर्शक की तलाश करना ही उचित है। उसी के सहारे आध्यात्मिक यात्रा सुविधापूर्वक पूर्ण होती है।
प्राकृतिक नियमों का अध्ययन करने पर भी यही प्रतीत होता है कि जीव शक्ति, ज्ञान और भाव के संबंध में स्वावलम्बी नहीं है, परावलम्बी है। उसे बाह्यï शक्तियों के सहयोग की अपेक्षा रहती है। इसके बिना पंगु ही बना रहता है। जब उसकी आंतरिक शक्ति और बौद्धिक विकास में पर्याप्त वृद्धि हो जाती है, तब उसे बाह्य शक्तियों की अपेक्षा भले ही न हो, परन्तु फिर भी उसे अन्तस्ï की अचिन्त्य शक्ति का आलम्बन स्वीकार करना ही होगा, तभी वह पूर्ण विकास के पथ पर अग्रसर हो सकता है।
भौतिक ज्ञान के शिक्षक अपने विषय की जानकारी देकर अपना कत्र्तव्य पूरा कर लेते हैं, पर आध्यात्मिक मार्ग में इतने से ही काम नहीं चल सकता। वहाँ शिक्षा ही पर्याप्त नहीं, वरन् गुरु द्वारा दिया हुआ आत्मबल भी दान या प्रसाद रूप में उपलब्ध करना पड़ता है। जिस प्रकार कोई रोगी चिकित्सा की शिक्षा मात्र से अच्छा नहीं हो सकता, उसे चिकित्सक से औषधि भी प्राप्त करनी पड़ती है। उसी प्रकार सच्चे गुरु न केवल आत्म-कल्याण का मार्ग बताते हैं, वरन्ï उस पर चल सकने योग्य साहस, बल और उत्साह भी देते हैं। यह देन तभी संभव है, जब गुरु के पास अपनी संचित आत्म-संपदा पर्याप्त मात्रा में हो। इसलिए गुरु का चयन और वरण करते समय उसकी विद्या ही नहीं, आत्मिक स्तर पर तप की संगृहीत पूँजी को भी देखना पड़ता है। यदि वह सभी गुण न हों, तो कोई व्यक्ति अध्यात्म मार्ग का उपदेशक भले ही कहा जा सके, पर गुरु नहीं बन सकता। गुरु के पास साधन, तपस्या, विद्या एवं आत्मबल की पूँजी पर्याप्त मात्रा में होनी चाहिए।
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
अखिल विश्व गायत्री परिवार संस्थापक पूज्य गुरुदेव पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी के मिशन को विस्तार देने के उद्देश्य से विभिन्न देशों की यात्रा के क्रम में पूज्य गुरुदेव के नैष्ठिक शिष्य एवं देव संस्कृति विश्वविद्यालय प्रतिकुलपति आदरणीय डॉ. चिन्मय पंड्या जी पोलैंड पहुंचे और रॉकलो में भारत के कॉन्सुलेट जनरल श्री जौहरी जी से मुलाकात की। श्री जौहरी जी एवं आदरणीय डॉ. पंड्या के मध्य पोलैंड में संपन्न हुए इस महत्त्वपूर्ण विमर्श का विषय पोलैंड में भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार की योजना को क्रियान्वित करना रहा।
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी का अमृत सन्देश !!
!! आज के दिव्य दर्शन 16 October 2024 !! !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
योग का उद्देश्य मानसिक परिष्कार है।
योग का उद्देश्य मानसिक परिष्कार है।
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
योग का उद्देश्य मानसिक परिष्कार है। उसमें संगृहीत कुसंस्कारों का शमन करना पड़ता है। स्वभाव का अंग बनी हुई दुष्प्रवृत्तियों के उन्मूलन में जुटना होता है। भौतिक लिप्साओं की ललक शांत करनी पड़ती है। चिंतन को उत्कृष्टता में रस लेने के लिए सहमत किया जाता है। आत्मा और परमात्मा के बीच की खाई पाटनी होती है। ये सारे कार्य अंतः परिशोधन और आत्मपरिष्कार से संबंधित हैं। इसलिए योग साधना वस्तुतः मन को साधने की ही विद्या है।
-पं० श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड-ज्योति से
महानता की प्राप्ति के लिए हमें महान् आदर्शों एवं महान् सम्बलों का सहारा लेना पड़ता है। सद्गुणों के रूप में महानता का आह्वान करके उसे यदि अपने अन्तःकरण में धारण करें और उन्हीं प्रेरणाओं के अनुरूप अपना जीवन क्रम चलावें तो विकट परिस्थितियों में रहते हुए भी महानता प्राप्त कर सकना सम्भव हो सकता है।
ईश्वर महान् है, इसलिए उसकी उपासना भी हमारी महानता को बढ़ाने में सहायक होती है। आवश्यक है कि जिसे महान बनने की आकाँक्षा हो, वह ईश्वर का प्रकाश एवं अनुग्रह प्राप्त करने का प्रयत्न करे।
ईश्वर प्राप्ति के लिए उत्कृष्ट भावनाओं की आवश्यकता पड़ती है। भावनाओं में प्रेम का स्थान सर्वोपरि है। प्रेम को ही भक्ति कहते हैं। भक्ति से भगवान प्राप्त किया जाता है ऐसा शास्त्रकारों का मत है। भक्ति भावना बढ़ाने का अभ्यास किसी न किसी माध्यम से किया जाता है। माता, पिता, पत्नी, पुत्र या मित्र को माध्यम बनाने में एक कठिनाई यह होती है कि इनके साथ अपना व्यावहारिक सम्बन्ध होने से कभी-कभी प्रतिकूल भावनायें भी उठ पड़ती हैं। इनमें ज्ञान, विद्या, सदाचार, दिव्य दृष्टि सात्विकता तथा निःस्वार्थता की भावनायें भी अल्प मात्रा में होने से वैसे आदर्श अपने जीवन में भी उपस्थित नहीं हो पाते अतएव गुरु-भक्ति या ईश्वर भक्ति के माध्यम से अपनी महानता के विकास का प्रारम्भ करते हैं। इस भक्ति रूपिणी साधना से आध्यात्मिक भावनाओं का तेजी से विकास होने लगता है इसलिए हमारे धर्म और संस्कृति में उपासना को सर्वप्रथम और अनिवार्य धर्म कर्तव्य माना गया है।
उन्नति और उत्थान के लिये दूसरे साधनों में “स्वाध्याय और सत्संग” को अधिक फलदायक और सुविधाजनक मानते हैं। स्वाध्याय भी एक प्रकार से विचारों का सत्संग है, किन्तु महापुरुषों की समीपता का मनुष्य के अन्तःकरण पर तीव्र प्रभाव पड़ता है। सन्तजनों की समीपता शीघ्र फलदायक होती है क्योंकि यह लाभ उनकी वाणी, विचार और व्यवहार से निरन्तर मिलता रहता है अतएव प्रगति भी उतनी ही द्रुतगामिनी होती है। आत्म-संस्कार के लिए सत्संग से बढ़कर कोई दूसरा साधन नहीं। बड़े-बड़े दुष्ट दुराचारी व्यक्ति तक सत्संग के प्रभाव के सुधरकर महान आत्मा बने हैं।*
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति जनवरी 1965 पृष्ठ 8
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