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Thursday 17, October 2024

कृष्ण पक्ष प्रथमा, कार्तिक 2081




आज का पंचांग • अक्टूबर 18, 2024

आज का हिन्दू पंचांग हिंदी में: आज 18 अक्टूबर, 2024 शुक्रवार कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष प्रतिपदा तिथि है | हिन्दू कैलेंडर और पंचांग से जाने आज का शुभ मुहूर्त, अशुभ समय और राहुकाल |

Aaj Ka Panchang (October 18, 2024) - कार्तिक कृष्ण पक्ष प्रतिपदा, पिंगल संवत्सर विक्रम संवत 2081, शक संवत क्रोधी 1946, आश्विन |

आज प्रतिपदा तिथि 01:15 PM तक उपरांत द्वितीया | नक्षत्र अश्विनी 01:26 PM तक उपरांत भरणी | वज्र योग 09:34 PM तक, उसके बाद सिद्धि योग | करण कौलव 01:15 PM तक, बाद तैतिल 11:30 PM तक, बाद गर | आज राहु काल का समय 10:38 AM - 12:02 PM है | आज चन्द्रमा मेष राशि पर संचार करेगा |

English अक्टूबर 17कल का पंचांग 
 
पंचांग अक्टूबर 18, 2024 Haridwar, Uttarakhand, India  
सूर्योदय6:25 AM
सूर्यास्त5:39 PM
चन्द्रोदय6:14 PM
चन्द्रास्त8:18 AM
अयनदक्षिणायन
द्रिक ऋतुशरद
 
 
  1. विक्रम संवत - 2081, पिंगल
  2. शक सम्वत - 1946, क्रोधी
  3. पूर्णिमांत - कार्तिक
  4. अमांत - आश्विन
तिथि
  1. कृष्ण पक्ष प्रतिपदा   - Oct 17 04:56 PM – Oct 18 01:15 PM
  2. कृष्ण पक्ष द्वितीया   - Oct 18 01:15 PM – Oct 19 09:49 AM
नक्षत्र
  1. अश्विनी - Oct 17 04:20 PM – Oct 18 01:26 PM
  2. भरणी - Oct 18 01:26 PM – Oct 19 10:46 AM


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समर्थ गुरु रामदास के मंदिर व्यायामशालाएं | Samarth Guru Ramdas Ke Mandir Vyayamshala |

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लोक व्यवहार की कुशलता के गुप्त रहस्य Lok Vyavhar Ki Kushalta Ke Gupta Rahasya

लोक व्यवहार की कुशलता के गुप्त रहस्य Lok Vyavhar Ki Kushalta Ke Gupta Rahasya

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हमारा शरीर आहार के आधार पर बनता और बिगड़ता है। इसी प्रकार मन का बनाव और बिगाड़ विचारों पर निर्भर रहता है। सद्विचारों के संपर्क में आये बिना कोई व्यक्ति उसी प्रकार मानसिक स्वच्छता प्राप्त नहीं कर सकता जिस प्रकार आहार की सुव्यवस्था किये बिना शरीर को बलवान बना सकना संभव नहीं होता। मन तभी स्वच्छ रह सकता है जब उसे सद्विचारों का सान्निध्य मिले।       

मानसिक स्वच्छता के लिए स्वाध्याय और सत्संग की आवश्यकता उसी प्रकार है जिस प्रकार बर्तन माँजने के लिए मिट्टी और पानी की उपयोगिता होती है। सद्विचारों का प्रसार जब कम हो जाता है और कुविचारों का विस्तार बढ़ जाता है तब स्वभावतः जन मानस में मलीनता छा जाती है और पाप तापों का, क्लेश कलह का रोग शोक का वातावरण पनपता दृष्टिगोचर होने लगता है। मनुष्य के भीतरी मन की बुराइयाँ उसके सामने विपत्ति बनकर आ खड़ी होती हैं।

कुएँ की प्रतिध्वनि की तरह हमें अपनी भावनाओं के अनुरूप ही दूसरों का प्रत्युत्तर मिलता है। जैसे हम स्वयं है वैसे ही दूसरे भी दीखते हैं। स्वभावतः वे वैसे नहीं तो कम से कम हमारे लिए तो वैसे बन ही जाते हैं, अपना क्रोधी स्वभाव हो और दूसरों से झगड़ते रहने की आदत पड़ जाय तो उसके फलस्वरूप दूसरे लोग जो भले ही स्वभावतः क्रोधी न हों हमारे आचरण से क्षुब्ध होकर कुछ देर के लिए तो क्रोधी बन ही जाते हैं।

 चोर, व्यभिचारी, बेईमान, असभ्य, अकर्मण्य मनुष्य के संपर्क में आने वाले व्यक्ति कुछ देर तक तो घृणा और क्षोभ प्रकट करेंगे ही। मन का मैला मनुष्य कुढ़न का अभिशाप भोगता है अपनी सारी श्रेष्ठताएँ खोकर निम्न स्तर का बन जाता है। मित्रों को शत्रु रूप में बदल लेता है। लोक−परलोक तो उसके बिगड़ते ही हैं। इतनी हानिकारक मन की मलीनता हमारे लिए सर्वथा त्याज्य है। वैयक्तिक और सामूहिक सारे संघर्ष इसी पर ठहरे हुए हैं। पापों की जड़ यही है। इसे काट दिया जाय तो वे कटीली झाड़ियाँ जो पग−पग पर दुख देती हैं नष्ट हो सकती हैं।

पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति जनवरी 1962

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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन

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चरण पादुका
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अखंड दीपक
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चरण पादुका
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सजल श्रद्धा - प्रखर प्रज्ञा (समाधि स्थल)
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प्रज्ञेश्वर महादेव - देव संस्कृति विश्वविद्यालय
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शिव मंदिर - शांतिकुंज
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हनुमान मंदिर - शांतिकुंज
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आज का सद्चिंतन (बोर्ड)

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आज का सद्वाक्य

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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन


!! आज के दिव्य दर्शन 18 October 2024 !! !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!

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!! परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी का अमृत सन्देश !!

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अमृत सन्देश:- हमारा जीवन 55 साल का है। Hamara Jivan Pachpan Sal Ka Hai | Pt Shriram Sharma Acharya

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परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश



कल्प क्या है और कल्प के लिये आपको क्या करना पड़ेगा कल्प के लिए दूसरे भी आपकी सहायता करेंगे पर आप ये मानके चलिए कुछ आपको भी करना पड़ेगा। केवल कर्मकाण्ड तक ही सीमित होकर के रह जाएँगे, तो उद्देश्य कैसे पूरा होगा?ये कल्प कोई शारीरिक थोड़ी है। ये क्रियाओं से थोड़ी पूरा हो जाएगा ये आंतरिक कायाकल्प है इसलिए आपको अपनी मनःस्थिति को, अपने चिंतन को और अपनी विचारणाओं को, आस्थाओं को, दृष्टिकोण को भी बदलना पड़ेगा। आमतौर से ये समझते हैं लोग देवताओं की खुशामद करके और देवताओं से कुछ प्राप्त करके हम अपना फायदा उठा लेंगे अध्यात्म इसी का नाम है। ये लोगों का गलत ख्याल है। देवताओं का अनुग्रह मिलता तो है,लेकिन बिना शर्त नहीं मिलता, कुपात्रों को नहीं मिलता पात्रता पहले साबित करनी पड़ती है, इसके बाद में ही कहीं ऐसा होता है कि देवता कोई सहायता कर सकें और किसी भक्त को या साधक को लाभ देने में मददगार बन सकें।

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अखण्ड-ज्योति से



प्रत्येक मनुष्य अपने विचारों द्वारा ही अपना आत्म निर्माण करता है। क्योंकि विचार का बीज ही समयानुसार फलित होकर गुणों का रूप धारण करता है और वे गुण, मनुष्य के दैनिक जीवन में कार्य बनकर प्रकट होते रहते हैं। विचार ही वह तत्व है जो गुण, कर्म, स्वभाव के रूप में, दृष्टिगोचर होता है। मन, कर्म, वचन में विचारों का ही प्रतिबिम्ब सदा परिलक्षित होता रहता है।

 मानव मनोभूमि में सत् और असत् दो प्रकार के संकल्प काम करते रहते हैं। भलाई और बुराई दोनों ही ओर मन चलता रहता है। इस द्विधा में जिधर रुचि अधिक हुई, उधर ही प्रकृतियां बढ़ जाती है। यदि असत मार्ग पर चला गया तो अपयश, द्वेष, चिन्ता, दैवी प्रकोप, शारीरिक और मानसिक अस्वस्थता दरिद्रता एवं अप्रतिष्ठा प्राप्त होती है। और यदि सत मार्ग का अनुगमन किया गया तो प्रशंसा, प्रतिष्ठा, प्रेम, सहयोग, संतोष, दीर्घ जीवन, शारीरिक और आत्मिक बलिष्ठता एवं सदा आनन्द ही आनन्द का रसास्वादन होता है। दो प्रकार के विचार ही मनुष्य समाज को दो भागों में बाँटते हैं। सुखी-दुखी, रोगी-निरोगी, दरिद्र-सम्पन्न, दृष्ट-सज्जन, पापी-पुण्यात्मा, निन्दित-पूज्य, प्रसन्न-चिन्तित आदि द्विविधि श्रेणियाँ केवल मात्र द्विविधि विचारों द्वारा ही विनिर्मित होती हैं।

अधिक संख्या में जनसमुदाय का मानसिक धरातल परिमार्जित नहीं होता, उसमें पाश्विक वृत्तियों की प्रधानता रहती हैं। अविवेक, अज्ञान, अदूरदर्शिता, संकुचित स्वार्थपरायणता, लोभ विषय विकारों में आसक्ति एवं निकृष्ट कोटि के मनोरंजन की अभिलाषाओं से मनः दोष भरा रहता है। जिससे उसके सोचने, कार्य करने और आनंद लाभ करने की परिधि ऐसी सीमित हो जाती है जिसमें बुराई, तामसिकता एवं अशान्ति ही उत्पन्न हो सकती है। इसी कटघरे में अधिकाँश लोग बंद रहते हैं माया का यह घेरा मनुष्य को बुरी तरह जकड़े रहता है। वह जकड़ा हुआ प्राणी पराधीनता जन्म नाना प्रकार के दुखों को प्राप्त करता रहता है। यही भव बन्धन है।

अखण्ड ज्योति मार्च 1950 पृष्ठ 15-16

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