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Tuesday 24, June 2025

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हे दुख भंजन मारुति नंदन सुन लो मेरी पुकार पवंसुत विनती बारंबार | Hey Dukh Bhanjan Maruti Nandan

हे दुख भंजन मारुति नंदन सुन लो मेरी पुकार पवंसुत विनती बारंबार | Hey Dukh Bhanjan Maruti Nandan

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बुराइयों से कैसे लड़ें | Buraiyon Se Kaise Laden | समस्याओं का समाधान ऋषि चिंतन से

बुराइयों से कैसे लड़ें | Buraiyon Se Kaise Laden | समस्याओं का समाधान ऋषि चिंतन से

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अमृतवाणी:- उपासना का क्रियात्मक स्वरूप : भाग 4 | समर्पण के बिना भक्ति अधूरी है Upasana Ka Kriyatmak Swaroop Part 4 परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी

अमृतवाणी:- उपासना का क्रियात्मक स्वरूप : भाग 4 | समर्पण के बिना भक्ति अधूरी है Upasana Ka Kriyatmak Swaroop Part 4 परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी

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गायत्री मन्त्र के तीन तथ्यों की व्याख्या Gayatri Mantra Ke Teen Tathayon Ki Vyakhaya

गायत्री मन्त्र के तीन तथ्यों की व्याख्या Gayatri Mantra Ke Teen Tathayon Ki Vyakhaya

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वैश्विक मंच में गूंजी भारतीय संस्कृति व योग दर्शन की ध्वनि।

वैश्विक मंच में गूंजी भारतीय संस्कृति व योग दर्शन की ध्वनि।

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महान अवलंबन का परित्याग न करें | Mahan Awalamban Ka Parityag Na Kare

महान अवलंबन का परित्याग न करें | Mahan Awalamban Ka Parityag Na Kare

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देवशिशु ने जगायी सद्बुद्धि | Dev Shishu Ne Jagayi Sadbhuddhi | अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य

देवशिशु ने जगायी सद्बुद्धि | Dev Shishu Ne Jagayi Sadbhuddhi | अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य

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गुरू भक्ति की सिद्धि सर्वोपरि, सबसे बड़ी | Guru Bhakti Ki Siddhi Sarvopari | Guru Gita,

गुरू भक्ति की सिद्धि सर्वोपरि, सबसे बड़ी | Guru Bhakti Ki Siddhi Sarvopari | Guru Gita,

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अमृत सन्देश:-  आध्यात्मिकता की पहली शर्त क्या है ? Adhyatmikta Ki Pehli Shart Kya Hai पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

अमृत सन्देश:- आध्यात्मिकता की पहली शर्त क्या है ? Adhyatmikta Ki Pehli Shart Kya Hai पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन

गायत्री माता
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गायत्री माता - अखंड दीपक
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गुरुजी माताजी
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चरण पादुका
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सजल श्रद्धा - प्रखर प्रज्ञा (समाधि स्थल)
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प्रज्ञेश्वर महादेव - देव संस्कृति विश्वविद्यालय
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शिव मंदिर - शांतिकुंज
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हनुमान मंदिर - शांतिकुंज
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आज का सद्चिंतन (बोर्ड)

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आज का सद्वाक्य

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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन


!! शांतिकुंज दर्शन 24 June 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!

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गुरु की शक्ति और ज्ञान | Guru Ki Shakti Aur Gyan

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परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश



 हम कहां रहेंगे, यह मत पूछना किसी से। हम कहां हैं, यह सवाल आपके लिए बिल्कुल बेबुनियाद है। यह तो उसी तरह का सवाल हो गया जैसे कि हम आपसे पहले मिला करते थे। गुरुजी कब मिलते हैं? कब पूजा से निवृत्त हो जाते हैं? कब बातचीत करते हैं? कब हमसे मिलेंगे?

आप यह मत कहिए। हमारे और आपके संबंध ऐसे रहेंगे, जिसमें हम आपकी बात को बड़े मजे में सुन लें और आप हमारी बात को बड़े मजे में सुन लें। हमारे गुरुदेव हिमालय पर रहते हैं, और देखा तो उनको ज़िंदगी में तीन-चार बार ही है। लेकिन चौबीसों घंटे हमारे संपर्क में रहते हैं। चौबीसों घंटे हमारे साथ-साथ में, हमसे बातचीत करते रहते हैं।

हम आपके साथ बराबर बातचीत जारी रखेंगे, और हम आपकी बात को बराबर सुनेंगे। हमारे कान जैसे भी कुछ हैं, पहले की अपेक्षा अब हमारे कान ज़्यादा साफ हो जाएंगे। ज़्यादा हम आपकी बात को सुन सकेंगे। जो आप कहना चाहते हैं, जो आपके मन में बात है, उसको हम सुन सकेंगे।

और हमारी ताकत भी अब इतनी होगी कि हम आपकी कुछ सेवा, ज़्यादा सेवा कर सकें, सहायता कर सकें। अभी तो क्या, भौतिक चीज़ों में से कुछ कहा होगा — हमारे ऊपर मुकदमा लग गया है, बाल-बच्चा नहीं होता है, मेरे पास पैसे की तंगी आ गई है। ऐसा आपने इन्हीं छोटी-छोटी बातों के लिए कहा होगा।

लेकिन हमारे गुरु ने छोटी-छोटी बातों के लिए हमको नहीं कहा था। हमको बड़ों के लिए कहा था, बड़ी-बड़ी बातों के लिए कहा था। और बड़ी-बड़ी बातों के लिए ही उन्होंने हमसे कहा था।

भगवान बुद्ध के संपर्क में अशोक आए। अशोक को उन्होंने बड़ी शानदार बात बताई — नालंदा विश्वविद्यालय बना देने के लिए। और वह धर्म को कहां से कहां उठा ले जाने के लिए। हर्षवर्धन बुद्ध के संपर्क में आए और उनको न जाने क्या-क्या बता दिया उन्होंने। आम्रपाली उनके संपर्क में आई, न जाने क्या-क्या बता दिया उन्होंने उसको। अंगुलिमाल उनके संपर्क में आया, जाने क्या-क्या बता दिया उन्होंने।

आप हमारे संपर्क में आएंगे, हम जाने क्या-क्या बताएंगे आपको। उन्हीं बातों को मत कहिए। उन बातों को माताजी से कह जाना कभी, या फिर यहां शांतिकुंज में कह जाना। शांतिकुंज में हम छाए रहे हैं, इससे आगे भी छाए रहेंगे।

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अखण्ड-ज्योति से



  मनुष्य को अपनी कार्य-सिद्धि के लिए जैसा उत्साह होता है वैसा उत्साह उसे कर्म-फल के लिए होता है वैसा ही उत्साह उसे कर्म करने में भी होना चाहिये। लोक-सेवा का स्वाभाविक फल यश की प्राप्ति है। अतएव यदि कोई यश प्राप्त करना चाहता है तो उसे लोक-सेवा में भी वैसी ही रुचि प्रदर्शित करनी चाहिए। यदि कोई दानी कहलाने की उत्कट इच्छा रखता है तो उसे दान देते समय अपना हाथ भी न सिकोड़ना चाहिये। किंतु बहुधा यह देखा जाता है कि मनुष्यों में कर्म-फल-भोग के लिए जो उत्साह देखा जाता है वैसा उत्साह कर्म करने के लिए नहीं। जहाँ कर्मोत्साह नहीं होता और कर्म-फल-भोग की भावना प्रबल होती है, वहाँ मनुष्य भटक जाता है और अधर्म करता है।      

 सच्ची उद्देश्य-सिद्धि न्याय पूर्ण तरीकों से ही हो सकती है। तभी वह स्थायी भी होती है। न्याय-संगत साधनों के प्रयोग से मनुष्य को न केवल साध्य की ही प्राप्ति होती है बल्कि उसे साधनकाल में अनेकों अन्य वस्तुओं की भी प्राप्ति हो जाती है जिनका कि मूल्य कभी-कभी उद्देश्य से भी कई गुना अधिक होता है। जो व्यक्ति न्यायपूर्ण तरीकों से धनी बनना चाहता है वह धन पाने के अतिरिक्त अध्यवसाय, मितव्ययिता आदि सद्गुण भी प्राप्त कर लेता है। जो विद्यार्थी ईमानदारी से परीक्षा पास होना चाहता है वह न केवल बी.ए., एम.ए. आदि उपाधियाँ ही प्राप्त करता है बल्कि ठोस ज्ञान भी प्राप्त करता है। वह एतर्द्थ ब्रह्मचर्य-धारण करना सीखता है, पूर्ण मनोयोग से कार्य करता है एवं अपने चित्त को विषय-विलासों से विरत रखता है। विद्याभ्यास और ब्रह्मचर्य के ही मिस से वह चित्त-संयम अथवा योग साधन में प्रवृत्त होता है जिसका कि मूल्य परीक्षा पास कर उपाधियाँ पाने और नौकरी पाने से कम नहीं।

  जिस वस्तु को हम न्यायपूर्ण तरीकों से कमाते हैं उसकी रक्षा की योग्यता को हम अपने वंशजों को भी दे जाते हैं। यदि हम अन्यायपूर्ण तरीकों से कोई धन-राशि संचित करते हैं तो हममें उसको प्राप्ति के लिए जितने अध्यवसाय और आत्म-संयम की मात्रा होना चाहिए वह न होगी और फिर हमारी संतान में भी इन गुणों के होने की कम सम्भावना है। यदि हमारी संतान में आत्म-संयम का गुण न होगा तो वह उस धनराशि का दुरुपयोग कर उसे नष्ट कर डालेगी। इस तरह हम देखते हैं कि जिसमें किसी वस्तु के न्यायोचित ढंग से प्राप्त करने की योग्यता नहीं होती उसमें तथा उसकी संतान में उसकी रक्षा करने की भी सामर्थ्य नहीं रहती। यही कारण है कि हम बहुधा लक्षाधीशों के पुत्रों को अपने जीवन काल में कंगाल होते देखते हैं और भ्रमवश यह समझते हैं कि लक्ष्मी अकारण ही चंचल है।
 
अखण्ड ज्योति 1995 अगस्त पृष्ठ 31
 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

 

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