Wednesday 25, June 2025
भगवान के पास बैठ जाने का मर्म | Bhagwan Ke Pass Bath Jane Ka Marm | Shraddheya Shail Jiji
Create Happiness In Life Book:- The Angelic Light Of Rishi Thought
मानवता का कायाकल्प – ज्ञान की अग्नि से | Manavta ka Kayakalp - Gyan Ki Agni Se पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
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व्यष्टि का समष्टि में विसर्जन | Vyasti Ka Samisti Mai Visarjan
अमृत सन्देश:- सांसारिक जीवन में सफलता के तीन महत्वपूर्ण पहलू | Sansaraik Jivan Mei Safalta Ke Teen Pehalu पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
परमशान्ति की भावदशा | Paramshanti Ki Bhavdasha शिष्य संजीवनी | Shishya Sanjeevani लेखक:- श्रद्धेय डॉ प्रणव पण्ड्या जी
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! शांतिकुंज दर्शन 25 June 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
अमृतवाणी: गुरु की विरासत और जिम्मेदारी | पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
शांतिकुंज, यही हमारा एक देह है, एक शरीर है। यहां हम फैले हुए हैं, यहां हम फैले हुए हैं। हमने यहां कितना सारा वर्ष व्यतीत किए हैं। 15 वर्ष की हमारी उपासना है यहां। 15 वर्ष से अखंड दीप, 15 वर्ष में यहां करोड़ों-करोड़ गायत्री के जप अनुष्ठान हुए हैं। यह स्वयं में एक सिद्ध पीठ है।
आप इस सिद्ध पीठ में कभी भी आना, कहीं भी कहना, अपने मन में कहना, किसी से मत कहना। हम आपकी बात सुन लेंगे। हम आपकी बात सुन लेंगे और न केवल सुन लेंगे, बल्कि आपको जवाब भी देंगे। न केवल जवाब देंगे, बल्कि आपकी मदद भी करेंगे। यह क्रम हमारे जिंदगी का था, और जब तक हम जिंदा रहेंगे, तब तक यह क्रम कभी हमारा बंद होगा ही नहीं।
आप उसके लिए मत ख्याल कीजिए। आप तो बड़ी बातों के लिए ख्याल कीजिए कि गुरु, वे विश्वामित्र के शिष्य थे। राजा हरिश्चंद्र। हरिश्चंद्र को कितना शानदार बना दिया, कितना शानदार बना दिया कि उन्होंने हजारों गांधी पैदा कर दिए। राजकोट में उन्होंने उनका ड्रामा देखा था — राजा हरिश्चंद्र का। किसने? गांधी जी ने। और ड्रामा को देख कर के इतने भावविभोर हुए, कहा कि हम भी हरिश्चंद्र की जिंदगी जिएंगे।
एक गांधी क्या, जाने कितने गांधी बनाए उन्होंने। इस तरीके से कुछ काम कराना होगा, आपको तो मांधाता की तरीके से कराएंगे। शंकराचार्य से मांधाता ने पूछा — कुछ काम बताइए। तो उन्होंने कहा — चारों धाम बनवाने हैं।
चारों धाम बना दे। तो उन्होंने कहा — चारों धाम के लिए मैं कहां से लाऊंगा रुपया? खबरदार, जो यह कहा कभी — कहां से लाऊंगा रुपया, कहां से लाऊंगा रुपया, कहां से लाऊंगा अकल, कहां से लाऊंगा बुद्धि, कहां से लाऊंगा समय, कहां से लाऊंगा जीवट।
बोया और काटा हमने। बोया है जिंदगी भर और काटा है। तुम भी बोवो। 100 गुना हो जाता है एक बीज। 100 गुना हो जाता है एक मक्का। 100 गुनी हो जाती है एक बाजरी। जौ 100 गुनी हो जाती है। और अगर आप बोलेंगे तो आपके पास शक्तियों की कमी रहेगी क्या? 100 गुनी हो जाएगी।
हमारे पास शक्तियों की कुछ कमी है क्या? नहीं। जितनी हमारे पास शक्ति थी — हमारी स्वयं की कमाई हुई अथवा हमारे माता-पिता की दी हुई — उसकी अपेक्षा सौ गुनी शक्ति हमारे पास है। और भले में खर्च करते हैं। आप भी ऐसे करना। आपको भी हम यह कह जाते हैं।
अखण्ड-ज्योति से
कुछ समय से नर- नारी के सान्निध्य का प्रश्न अतिवाद के दो अन्तिम सिरों के साथ जोड़ दिया गया है। एक ओर तो नारी को इतनी आकर्षक चित्रित किया गया कि उसकी माँसलता को ही सृष्टि की सबसे बड़ी विभूति सिद्ध कर दिया गया। कला ने नारी के अंग- प्रत्यंग की सुडौलता को इतना सराहा कि सामान्य भावुक व्यक्ति यह सोचने के लिए विवश हो गया कि ऐसी सुन्दरता को काम तृप्ति के लिए प्राप्त कर लेना जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है। गीत, काव्य, संगीत, नृत्य, अभिनय, चित्र, मूर्ति आदि कला के समस्त अंग जब नारी की माँसलता और कामुकता को ही आकाश तक पहुँचाने में जुट जाये, तो बेचारी लोकवृत्ति को उधर मुड़ना ही पड़ेगा। इस कुचेष्टा का घातक दुष्परिणाम सामने आया।
यौन प्रवृत्तियाँ भड़की, नर- नारी के बीच का सौजन्य चला गया और एक दूसरे के लिए अहितकर बन गये। यौन रोगों की बाढ़ आई, शरीर और मन जर्जर हो गया, पीढ़ियाँ दुर्बल से दुर्बलतर होती चली गई, मनःस्थिति उस कुचेष्टा के चिन्तन में तल्लीन होने के कारण कुछ महत्त्वपूर्ण चिन्तन कर सकने में असमर्थ हो गयी। तेज, ओज, व्यक्तित्व, प्रतिभा, मेधा, शौर्य और वर्चस्व जो कुछ महान था, वह सब कुछ इसी कुचेष्टा की वेदी पर बलि हो गया। दुर्बल काया और मनःस्थिति को लेकर दीन- हीन और पतित- पापी ही बन सकता था, सो बनता चला गया। नारी को रमणी सिद्ध करके तुच्छ सा मनोरंजन भले पाया हो, पर उससे जो हानि हुई उसकी कल्पना कर सकना भी कठिन है। जिनने भी मानवीय प्रवृत्तियों को इस पतनोन्मुख दिशा में मोड़ने के लिये प्रयत्न किया है वस्तुतः एक दिन वे मानवीय विवेक और ईश्वरीय न्याय की अदालत में अपराधियों की तरह खड़े किये जायेंगे।
अतिवाद का एक सिरा यह है कि कामिनी, रमणी, वैश्या आदि बना कर उसे आकर्षण का केन्द्र बनाया गया। अतिवाद का दूसरा सिरा है कि उसे पर्दे, घूँघट की कठोर जंजीरों में जकड़ कर अपंग सदृश्य बना दिया गया, उस पर इतने प्रतिबन्ध लगाये गये जितने बन्दी और पशु भी सहन नहीं कर सकते। जेल के कैदियों को थोड़ा घूमने- फिरने की, हँसने- बोलने की आजादी रहती है। पर घर की छोटी सी कोठरी में कैद नववधू के लिए परिवार के छोटी आयु वालों के सामने ही बोलने की छूट है। बड़ी आयु वालों से तो उसे पर्दा ही करना होता है। न उनके सामने मुँह खोला जा सकता है और न उनसे बात की जा सकती है। पर्दा सो पर्दा, प्रथा सो प्रथा, प्रतिबन्ध सो प्रतिबन्ध। इससे न्याय, औचित्य और विवेक के लिए क्यों गुंजायश छोड़ी जाय। पशु को मुँह पर नकाब लगाकर नहीं रहना पड़ता। वे दूसरों के चेहरे देख सकते हैं और अपने दिखा सकते है। जब मर्जी हो चाहे जिसके सामने अपनी टूटी- फूटी वाणी बोल सकते हैं। पर नारी को इतने अधिकार से भी वंचित कर दिया गया।
अखण्ड ज्योति 1995 अगस्त पृष्ठ 31
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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