Tuesday 28, January 2025
बच्चों को स्वावलंबी बनाएं | Baccho Ko Swavlambi Banaye
शांतिकुंज क्यों आया करें | Shantikunj Kyun Aaya Karen |
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! आज के दिव्य दर्शन 28 January 2025 !! !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
!! परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी का अमृत सन्देश !!
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
पहले मैं केवल बौद्धिक भाषण किया करता था और विवेचनात्मक और विचारपरक भाषण करता था। तब मैंने देखा कि देहात के क्षेत्रों में जब मैं गया तो लोग उठ-उठ कर चलने लगे थे। पीछे मैंने समझ लिया कि मुझे क्या करना पड़ेगा, इसलिए मैंने रामायण की कथाएं, अमुक की कथाएं और अन्य दृष्टांतों को अपने भाषण में मिलाया। लंबी बातों को नहीं किया, जहां मार्मिक बात थी, उसे मिलाया। इसका परिणाम यह हुआ कि जहां भी मैं भाषण देने के लिए गया, जनता बराबर बैठी रही। एक घंटा बोल दिया तो क्या, दो घंटे बोल दिया तो क्या, डेढ़ घंटे बोल दिया तो क्या, जनता ने हिलने का नाम नहीं लिया। किसी दिन आपको भी सिखाऊँगा कि कब और कैसे बोलना चाहिए। अब तो मैं आपको मूलभूत सिद्धांतों को समझा रहा हूं कि आपको क्या करना चाहिए। बच्चों को सिखाना क्या है और सिखाना किस तरीके से चाहिए। आप में से जो लोग काम के साबित होंगे, वे मुझे दिखाई देंगे, और आप ऐसे ही जोश और उमंग में आकर कार्य करेंगे, जैसे जनता धार्मिक क्रियाकलापों में आती है। हम हवन में देखते हैं कि लोग धर्म के लिए नहीं, यज्ञ के लिए नहीं आते। स्त्रियां किसके लिए आती हैं? धर्म के लिए नहीं, यज्ञीय भावना के लिए नहीं, बल्कि परिक्रमा करने के लिए आती हैं और यह कहने आती हैं कि उनकी दमे की बीमारी ठीक हो जाएगी। और किसी काम के लिए नहीं आती हैं।
पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड-ज्योति से
परिजन हम लोगों का संयुक्त जीवन अखण्ड-दीपक का प्रतीक मानकर उसे आत्म सत्ता की साकार प्रतिमा मानते रहे। वही हम लोगों के लिए मत्स्य बेध जैसा लक्ष्यबेध करने वाले शब्दबेधी बाण की तरह आराध्य बनकर रही है। साथ ही साधना का सम्बल भी। शरीर परिवर्तन की बेला आते ही यों तो हमें साकार से निराकार होना पड़ेगा; पर क्षण भर में उस स्थिति से अपने को उबार लेंगे और दृश्यमान प्रतीक के रूप में उसी अखण्ड दीपक की ज्वलन्त ज्योति में समा जायेंगे, जिसके आधार पर अखण्ड-ज्योति नाम से सम्बोधन अपनाया गया है।
शरीरों के निष्प्राण होने के उपरान्त जो चर्म चक्षुओं से हमें देखना चाहेंगे, वे इसी अखण्ड-ज्योति की जलती लौ में हमें देख सकेंगे। दो शरीर अब तक द्वैत की स्थिति में रहे है। भविष्य में दोनों की सत्ता एक में विलीन हो जायगी और उसे तेल-बाती की पृथक सत्ताओं की एक ही लौ में समावेश होने की तरह अद्वैत रूप में गंगा-यमुना के संगम रूप में देखा जा सकेगा। इसे .... श्रद्धा का एकीकरण भी समझा जा सकेगा।
अभी हम लोगों के शरीर शान्ति-कुंज में रहते हैं। पीछे भी वे इस परिकर के कण-कण में समाये हुए रहेंगे। इसकी अनुभूति निवासियों और आगन्तुकों को समान रूप से होती रहेगी। पर इसका अर्थ यह न समझा जाय कि यह युग चेतना किसी क्षेत्र विशेष में सीमाबद्ध होकर रह जायगी। जब स्थूल शरीर ने समस्त विश्व की प्रतिमाओं को झकझोरा है और उन्हें प्रसुप्ति से उबार कर कर्म क्षेत्र में कुरुक्षेत्र में ला खड़ा किया है, तो यह हम लोगों की तृप्ति-तुष्टि और शान्ति का केन्द्र क्यों अपनी कक्षा छोड़कर किसी अन्य मार्ग को अपनायेगा। स्थूल शरीर की अपेक्षा सूक्ष्म की शक्ति हजारों-लाखों गुनी अधिक होती है। हम लोग कुछ आगे-पीछे एक ही मोर्चे पर एकत्व अपनाकर कार्यरत बने रहेंगे।
अपनी अपेक्षा कार्यक्षेत्र को हजारों गुना बढ़ा लेंगे। सफलता भी अत्यन्त उच्चस्तरीय अर्जित करेंगे। हमारी प्रवृत्तियाँ मरेंगी नहीं, वरन् अखण्ड-ज्योति की बढ़-चढ़ कर अभिनव भूमिका सम्पन्न करेगी। इसलिए शरीर परिवर्तन की बात सोचने पर न हमें कुछ खिन्नता होती है और न हम लोगों का वास्तविक स्वरूप समझने वाले अन्य किसी स्वजन, परिजन को होनी चाहिए मिशन तीर की तरह सनसनाता हुआ अपने लक्ष्य की ओर बढ़ेगा। हम लोगों की स्थिति प्रत्यंचा की तरह अभी भी तनी है और भविष्य में भी वैसी ही बनी रहेगी। अखण्ड-ज्योति की ज्योति ज्वाला प्रेरणाप्रद लेखों में अबकी ही तरह भविष्य में भी प्राणवान बनी रहें, इसके लिए अगले बीस वर्षों के लिए अभी से सुनिश्चित संग्रह करके रख दिया गया है। सूत्र संचालकों ने इसमें पूरा सहयोग दिया है।
.... क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति 1988 जनवरी पृष्ठ 30
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