Sunday 28, September 2025
क्या माँ गायत्री वास्तव में हमें प्राणवान बना सकती हैं? डॉ. चिन्मय पण्ड्या जी
Book: 01, EP: 01, ''ॐ भूर्भुव: स्व: | ईश्वर का विराट रूप | Gayatri Mantra Ke 24 Akshar
बाहरी संपदा आंतरिक समृद्धि की छाया मात्र है
“सच्ची भक्ति वही है, जिसमें निस्पृहता और पुरुषार्थ हो”
धनी कौन | Dhani Koun
Maa Katyayani
अमृत सन्देश:- सच्चे प्रेम का सिद्धांत क्या है ? | Sacche Prem Ka Siddhant Kya Hai
आया-आया नवरात्रि त्यौहार | Aaya Aaya Navratri Tyohar | Rishi Chintan
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! शांतिकुंज दर्शन 28 September 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
!! #गायत्री_माता_मंदिर #Gayatri_Mata_Mandir गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 28 September 2025 !!
!! सप्त ऋषि मंदिर गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 28 September 2025 !!
!! परम पूज्य गुरुदेव का कक्ष गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 28 September 2025 !!
!! महाकाल महादेव मंदिर शांतिकुञ्ज हरिद्वार 28 September 2025 !!
!! प्रज्ञेश्वर महादेव मंदिर #Prageshwar_Mahadev 28 September 2025 !!
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
अखण्ड-ज्योति से
देवता स्वर्ग में नहीं रहते अपितु महामानवों के रूप में इस धरती पर विचरते हैं। नवयुग देवत्व प्रधान होगा। उसमें वे प्रयत्न चलेंगे जो मनुष्य में देवत्व बसते हैं वहाँ स्वर्ग होता है। जहाँ स्वर्ग होगा वहाँ देवता ही बसते होंगे। इसी तथ्य के आधार पर यह अपेक्षा की गई है कि उत्कृष्ट व्यक्तियों द्वारा जो सुखद वातावरण बनेगा, उसे धरती पर स्वर्ग के अवतरण की उपमा दी जा सकेगी।
युग संधि की नवरात्रियों में विशेष संभावना इस बात की है कि उनमें अदृश्य लोकों में देवत्व की अतिरिक्त वर्षा हो और उस अनुदान को पाकर देव मानवों का समुदाय अधिक प्रखरता सम्पन्न होता हुआ दृष्टिगोचर होने लगे। युग परिवर्तन की अवतार प्रक्रिया को गतिशील बनाने में इन देवमानवों का ही योगदान प्रमुख रहा है। तत्वदर्शी कहते हैं कि अवतार अकेले ही अपना प्रयोजन पूरा नहीं कर लेते, उनके साथ-साथ अनेक सहयोगी भी होते हैं और वे भी देवलोक से उसी प्रयोजन के लिए शरीर धारण करते हैं। पाँचों पाण्डव पाँच देवताओं के अवतार थे। हनुमान, अंगद आदि के बारे में भी ऐसी ही मान्यता है। इन दिनों सृजन योजनाओं में देवमानवों का यह साहस एवं प्रयास ही अग्रिम मोर्चा संभालता दिखाई देगा।
नवयुग सृजन की प्रेरणाओं को क्रियान्वित करने तथा उस दिशा में कदम बढ़ाने का यही शुभ मुहूर्त है। प्रज्ञा युग की प्रेरणा को अपनाने और विधि-व्यवस्था को चरितार्थ करने के लिए यों हर घड़ी पवित्र और महत्वपूर्ण है, पर इस प्रयोजन के लिए नवरात्रि पर्व की अत्यधिक गरिमा मानी गई है। यों उपासना की चिन्ह-पूजा भी बीजारोपण की दृष्टि से उपयोगी मानी गई है और उसे किसी भी रूप में, किसी भी मनःस्थिति में अपनाये रहने पर जोर दिया गया है। फिर भी उसे निष्ठापूर्वक अपनाने की प्रौढ़ता का स्तर सदा ऊँचा ही रहता है। उच्चस्तरीय सत्परिणामों की आशा-अपेक्षा योजनाबद्ध तपश्चर्या अपनाकर की जाने वाली साधना के साथ अविच्छिन्न रूप से संबंधित है।
नवरात्रि पर्व का ऋतु संध्या मुहूर्त विज्ञान की दृष्टि से ही नहीं विशिष्ट साधना पद्धति के कारण भी महत्वपूर्ण माना गया है। नैष्ठिक साधकों के लिए आश्विन और चैत्र की नवरात्रियों में अनुष्ठान साधना एक अत्यावश्यक पुण्य परम्परा के रूप में सदा-सर्वदा से अपनाई जाती रही है। सर्दी और गर्मी दो ही प्रधान ऋतुएँ हैं, उनका मिलन एक प्रकार से वैसा ही संधिकाल है जैसा कि रात्रि के अंत्र और दिन के प्रारंभ में प्रभातकाल के रूप में उपस्थित होता है। सन्धियाँ सदा मार्मिक होती हैं। शरीर में अस्थिपंजर से बने हुए जोड़ों को भी संधियाँ कहते हैं। इन्हीं के यथावत रहने पर काया की विभिन्न क्रिया-प्रक्रियाएँ गतिशील रहती हैं। यह जोड़ यदि जकड़ने लगे तो फिर चलना-फिरना तो दूर मुड़ना भी संभव न रहेगा।
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1996
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