Sunday 29, June 2025
सूर्य गायत्री मंत्र, सूर्य- प्राण-शक्ति | Surya Gayatri Mantra | Lord Surya Mantra Chanting
अमृत सन्देश:- आश्रम में रहने का उद्देश्य | Ashram Mei Rehne ka Uddeshay पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! शांतिकुंज दर्शन 29 June 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
!! देवात्मा हिमालय मंदिर Devatma Himalaya Mandir गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 29 June 2025
!! अखण्ड दीपक Akhand_Deepak (1926 से प्रज्ज्वलित) चरण पादुका गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 29 June 2025
!! गायत्री माता मंदिर Gayatri Mata Mandir गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 29 June 2025
!! प्रज्ञेश्वर महादेव मंदिर Prageshwar Mahadev 29 June 2025
!! सप्त ऋषि मंदिर गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 29 June 2025
!! परम पूज्य गुरुदेव का कक्ष 29 June 2025 गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
!! महाकाल महादेव मंदिर Mahadev_Mandir गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 29 June 2025
अमृतवाणी: ज्ञानयज्ञ का विस्तार पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
ज्ञानयज्ञ का जब विस्तार होने लगे और लोग-बाग उससे प्रभावित होने लगें और ये कहने लगें कि हाँ ये विचार ठीक हैं, तब उनको कहना चाहिए कि विचार ठीक हैं तो उसमें सहयोग दीजिये और कुछ काम कीजिए । लोगों को काम पर नहीं लगाया जाए और काम नहीं दिए जाएँ तब केवल मान्यता और विश्वास और विचार टिकाऊ नहीं रह सकते। वो नष्ट हो जाते हैं, और चले जाते हैं और हवा में गायब हो जाते हैं। जोश तो किसी भी बात पर आ जाता है। जैसा हम देखते हैं, वैसे ही आ जाते हैं जोश। और बस जोश आया और पानी के बबूले की तरीके से खतम। उस जोश और विश्वास को कायम रखने के लिए रचनात्मक कार्यक्रमों की प्रक्रिया और श्रृंखला आवश्यक है। इसीलिए इसीलिए अपने इन कार्यक्रमों में इस बात को जोड़कर रखा गया है कि जो भी व्यक्ति अपने कार्यक्रमों से-विचारों से प्रभावित हों, उन्हें किसी न किसी रूप से समाज के लिए कुछ श्रम करने का और कुछ काम करने का और राष्ट्र को-विश्व को बनाने का और मनुष्य को बनाने का और परिवार को बनाने का कोई न कोई रचनात्मक कार्य करना ही चाहिए। शतसूत्रीय योजना में इसका विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। तीसरा चरण जो अपना रह जाता है, वह संघर्ष का है। संघर्ष के बिना अवांछनीय तत्त्वों को हटाया नहीं जा सकता है। कुछ निहित स्वार्थ ऐसे होते हैं, उनकी दाढ़ में ऐसा कुछ लग जाता है अथवा किसी अपनी बेवकूफी को ऐसा प्रेस्टीज प्वाइंट बना लेते हैं कि उससे पीछे हटना ही नहीं चाहते हैं। अपनी बुद्घिमानी, अपनी अक्लमंदी और अपना अहंकार-अपने घमंड को इतना ज्यादा बढ़ा लेते हैं कि अपने साथ जुड़े हुए जो विचार हैं उनका ही समर्थन करते हैं। मान लीजिए कोई बूढ़ा आदमी है, और उसने कोई गलती की, चार धाम की यात्रा करके आ गया और सारा पैसा फूँक करके घर में आ गया। अब उसकी गलती को बताओ तो कोई मानेगा नहीं और दूसरे गाँव वालों को भी कहेगा-हम तो मुक्ति ले आए, तुम भी मुक्ति ले आओ। उसे समझाओ तो मानता ही नहीं । कुछ आदमी इस तरह के होते हैं, जिनको जड़ कहते हैं और जो अपनी गलती को ही प्रेष्टीज प्वांइट बना लेते हैं।
अखण्ड-ज्योति से
काम का अर्थ विनोद, उल्लास और आनन्द है। मैथुन को ही काम नहीं कहते। काम क्षेत्र की परिधि में वह भी एक बहुत ही छोटा और नगण्य सा माध्यम हो सकता है, पर वह कोई निरन्तर की वस्तु तो है नहीं। यदा- कदा ही उसकी उपयोगिता होती है। इसलिए मैथुन को एक कोने पर रखकर उपेक्षणीय मानकर भी काम लाभ किया जाता है। स्नेह, सद्भाव, विनोद, उल्लास की उच्च स्तरीय अभिव्यक्तियाँ जिस परिधि में आती हैं उसे आध्यात्मिक काम कह सकते हैं।
नर- नारी के बीच व्यापक सद्भाव सहयोग की, सम्पर्क की स्थिति में ही व्यक्ति और समाज का विकास सम्भव है। उससे हानि रत्ती भर भी नहीं। स्मरण रखा जाय पाप या व्यभिचार का सृजन सम्पर्क से नहीं दुर्बुद्धि से होता है। पुरुष डाक्टर नारी के प्रजनन अवयवों तक का आवश्यकतानुसार आपरेशन करते है। उसमें न पाप है, न अश्लील, न अनर्थ। रेलगाड़ी की भीड़ में नर- नारियों के शरीर चिपके रहते हैं। जहाँ पाप वृत्ति न हो वहाँ शरीर का स्पर्श दूषित कैसे होगा? हम अपनी युवा पुत्री के शिर और पीठ पर स्नेह का हाथ फिराते है तो पाप कहाँ लगता है। सान्निध्य पाप नहीं है। पाप तो एक अलग ही छूत की बीमारी है जो तस्वीरें देखकर भी चित्त को उद्विग्न कर सकने में समर्थ है। इलाज इस बीमारी का किया जाना चाहिए। हमारी कुत्सा का दण्ड बेचारी नारी को भुगतना पड़े, यह सरासर अन्याय है। इस अनीति को जब तक बरता जाता रहेगा, नारी की स्थिति दयनीय ही बनी रहेगी और इस पाप का फल व्यक्ति और समाज को असंख्य अभिशापों के रूप में बराबर भुगतना पड़ेगा।
भगवान वह शुभ दिन जल्दी ही लाये जब नर- नारी स्नेह सहयोग की तरह, मित्र और सखा की तरह एक दूसरे के पूरक बनकर सरल स्वाभाविक नागरिकता का आनन्द लेते हुए जीवनयापन कर सकने की मनःस्थिति प्राप्त कर लें। हम विकारों को रोके, सान्निध्य को नहीं। सान्निध्य रोककर विकारों पर नियन्त्रण पा सकना सम्भव नहीं है। इसलिए हमें उन स्रोतों को बन्द करना पड़ेगा, जो विकारों और व्यभिचार को भड़काने में उत्तरदायी हैं। अग्नि और सोम, प्राण और रयि, ऋण और धन विद्युत प्रवाहों का समन्वय इस सृष्टि के संचरण और उल्लास को अग्रगामी बनाता चला आ रहा है। नर- नारी का सौम्य सम्पर्क बढ़ाकर हमें खोना कुछ नहीं पाना अपार है।
.... समाप्त
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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