Thursday 30, January 2025
दूसरों की तरह हमारे भी दो शरीर हैं, एक हाड़-मांस का, दूसरा विचारणा एवं भावना का।* हाड़-मांस से परिचय रखने वाले करोड़ों हैं। लाखों ऐसे भी हैं जिन्हें किसी प्रयोजन के लिए हमारे साथ कभी सम्पर्क करना पड़ा है। *अपनी उपार्जित तपश्चर्या को हम निरन्तर एक सहृदय व्यक्ति की तरह बाँटते रहते हैं।* विभिन्न प्रकार की कठिनाइयों एवं उलझनों में उलझे हुए व्यक्ति किसी दलदल में से निकलने के लिए हमारी सहायता प्राप्त करने आते रहते हैं।
*अपनी सामर्थ्य के अनुसार उनका भार हलका करने में कोई कंजूसी नहीं करते।* इस संदर्भ में अनेक व्यक्ति हमारे साथ संपर्क बनाते और प्रयोजन पूरा होने पर उसे समाप्त कर देते हैं। *कितने ही व्यक्ति साहित्य से प्रभावित होकर पूछताछ एवं शंका समाधान करने के लिए, कितने ही आध्यात्मिक साधनाओं के गूढ़ रहस्य जानने के लिए, कई अन्यान्य प्रयोजनों से आते हैं।* इनकी सामयिक सेवा कर देने से हमारा कर्त्तव्य पूरा हो जाता है। उनके बारे में न हम अधिक सोचते हैं और न उनकी कोई शिकायत या चिंता करते हैं।
*हमारे मन में भावनाएँ उनके लिए उफनती हैं जिनकी पहुँच हमारे अंतःकरण एवं भावना स्तर तक है।* भावना शरीर ही वास्तविक शरीर होता है। *हम शरीर से जो कुछ हैं, भावना की दृष्टि से कहीं अधिक हैं।* हम शरीर से किसी की जो भलाई कर सकते हैं उसकी अपेक्षा अपनी भावनाओं, विचारणाओं का अनुदान देकर कहीं अधिक लाभ पहुँचाते हैं। पर अनुदान ग्रहण वे ही कर पाते हैं जो भावनात्मक दृष्टि से हमारे समीप हैं।
*जिन्हें हमारे विचारों से प्रेम है, जिन्हें हमारी विचारणा, भावना एवं अंतःप्रेरणा का स्पर्श करने में अभिरुचि है उन्हीं के बारे में यह कहना चाहिए कि वे तत्त्वतः हमारे निकटवर्ती एवं स्वजन संबंधी हैं। उन्हीं के बारे में हमें कुछ विशेष सोचना है, उन्हीं के लिए हमें कुछ विशेष करना है।*
पं श्रीराम शर्मा आचार्य*
अखण्ड ज्योति, जुलाई 1966, पृष्ठ 42
मनः शक्तियों का सदुपयोग, Manah Shaktiyon Ka Sadupyog*
क्यों मनोयोग से काम करना जरूरी है ? | Kyo Manoyog Se Kam Krna Jaruri Hai
गुरुदेव के कष्ट | Gurudev Ke Kasht
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
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!! परम पूज्य गुरुदेव का कक्ष 30 January 2025 गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
!! अखण्ड दीपक Akhand Deepak (1926 से प्रज्ज्वलित) एवं चरण पादुका गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 30 January 2025 !!
!! आज के दिव्य दर्शन 30 January 2025 !! !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
!! परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी का अमृत सन्देश !!
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
इस समय तो आपको मूलभूत सिद्धांतों को दिमाग में लेकर के जाना पड़ेगा, और किसी न किसी तरीके से, किसी न किसी तरीके से बच्चों के मनों में, उनके अभिभावकों के मनों में, अध्यापकों के मनों में, तीनों के मनों में इस बात को जमाना पड़ेगा कि इन बच्चों का विकास और उत्थान कहां है। अब तो लोग स्वयं कुछ समझ पाए और कुछ समझ ही नहीं पाए। क्या समझ पाए हैं? ये समझ पाए हैं कि बच्चों को विलासी और अय्यास बनाने के लिए, बच्चों को सुविधाजनक साधन देने के लिए, उनको जो कुछ भी कर सकना संभव हो, वो करना चाहिए। बच्चे के लिए मोटर का इंतजाम करना चाहिए ताकि वह स्कूल चला जाए, पैदल नहीं चलने देना चाहिए, क्योंकि हम अमीर हैं और बड़े आदमी हैं। क्योंकि हम अमीर और बड़े आदमी हैं, इसलिए हमारे बच्चे को तो पब्लिक स्कूल में भर्ती कराना चाहिए। गरीब लोग यह कहते हैं कि, "अरे साहब, हमारे बच्चे को तो 25 रुपये महीना, 15 रुपये महीना खर्च करने को नहीं है, और देखिए, वह बड़े साहब का लड़का वहां जाता है पब्लिक स्कूल में, 400 रुपये महीना खर्च करता है।" और लड़का भी कह दे, "तू क्या जानता है? तू था हमारा पड़ोसी, तो क्या तेरा बाप भी तो 15 रुपये खर्च नहीं कर सकता? देख, हमारा बाप कैसा अमीर है, 400 रुपये हमको स्कूल में भेजता है।" यह है आदमी के अहंकारों की वृद्धि। मित्रों, निखालिस अहंकारों की वृद्धि है, इसमें कुछ रखा है क्या? पब्लिक स्कूलों के लड़के कैसे बेहूदे और कैसे बदमाश होते हैं, हम जानते हैं। एटीट्यूड सीख करके आते हैं, यह एटीट्यूड सीखने के अलावा और क्या-क्या खुराफातें सीख करके आते हैं, और किस तरीके से स्वार्थी, कैसे कमीने बन करके आते हैं, हम जानते हैं।
पंडित श्रीराम श्रीराम आचार्य
अखण्ड-ज्योति से
यों कर्मठ व्यक्तियों की हर क्षेत्र में आवश्यकता रहती है पर सामाजिक क्रान्ति के गृह-युद्ध में पग-पग पर मोर्चा जमाये अड़े रहने वाले सैनिकों जैसी क्रान्तिकारी भावनाएं जिनके अन्दर विद्यमान हों ऐसे लोगों का अस्तित्व हो आशा का केन्द्र बन सकता हैं। पिछले दिनों स्वाधीनता संग्राम ही राजनैतिक क्रान्ति हो कर चुकी है। उसमें मातृभूमि के लिये एक से एक बढ़ कर उत्सर्ग करने वाले, अहिंसक एवं हिंसात्मक संघर्ष में भाग लेने वाले अगणित क्रान्तिकारियों का तप त्यागपूर्ण व्यक्तित्व ही सफलता का आधार बना था। ठीक वैसी ही आवश्यकता इस सामाजिक क्रान्ति के लिये भी अभीष्ट होगी।
एक माता की गोद से बच्चा छूट कर नदी की प्रबल धारा में बहने लगा। माता अपने शिशु की प्राण रक्षा के लिये सहायता को चीत्कार कर रही हैं। ‘होशियार’ लोग मौखिक सहानुभूति तो दिखा रहे थे पर करने को कुछ भी तैयार न थे। उसी समय एक नव-युवक उफनती नदी में अपने प्राण हथेली पर रख कर कूदा और बहते बच्चे को पकड़ कर किनारे पर ले आया। इस युवक का नाम था अब्राहम लिंकन जो अपनी ऐसी ही महानताओं के कारण अमेरिका का प्रेसीडेण्ट हुआ।
आज विवाहों का अपव्यय एक ऐसी उफनती नदी बना हुआ है जिसमें सारे समाज की बालिकाएं बही चली जा रही हैं और प्रत्येक अभिभावक उनको बचाने के लिए चीत्कार कर रहा है। यह दृश्य हम सब देखते सुनते तो हैं। मौखिक विरोध और दुख भी प्रकट करते हैं पर करने की बारी आती है तो ‘अक्लमन्द’ लोगों की तरह पल्ला झाड़ कर अलग खड़े हो जाते हैं। ऐसे कुसमय ये स्वर्गीय अब्राहम की आत्मा देखती है कि उसके जैसे उदार और साहसी लोगों से भारत की भूमि रहित क्यों हो गई?
कोई प्राण हथेली पर लेकर नदी में कूदने और इन बच्चियों को बचाने के लिए क्यों तैयार नहीं होता? आत्मा के अमर और शरीर को नश्वर मानने वाले, गीता-पाठी लोगों में से मोह और लोभ को छोड़ कर धर्म के लिए कुछ साहस कर सकने वाले लोग क्यों कहीं दृष्टिगोचर नहीं होते? इसका उत्तर युग की आत्मा हम से माँगती हैं और हम क्लीव, निर्जीव की तरह सिर नीचा किये मुरझाये- से खड़े हैं। इस धिक्कार योग्य स्थिति में पड़ी हुई अपनी पीढ़ी की मनोदशा पर आँसू ही बहाये जा सकते हैं।
.... क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति मार्च1964 पृष्ठ 51
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