विवाहोन्माद प्रतिरोध आन्दोलन (भाग 2)
हिन्दू समाज में विवाहों का आरम्भ आज जिस ढंग से, जिस विचारधारा के साथ आरम्भ किया जाता है, उसे अत्यन्त निराशाजनक एवं दुर्भाग्यपूर्ण ही कहना चाहिए। उपयुक्त जोड़ी ढूँढ़ने से लेकर दोनों कुटुम्बों में परस्पर अगाध स्नेह सहानुभूति रहने तक जो उल्लासपूर्ण वातावरण रहना चाहिए और दो आत्माओं के आत्मसमर्पण यज्ञ की जो परम पवित्र धार्मिक सद्भावना पूर्ण परिस्थितियाँ रहनी चाहिए, उनका कहीं ढूँढ़े भी दर्शन नहीं होता। सच तो यह है कि सब कुछ इससे विपरीत होता है। छोटे-छोटे अबोध बालकों को गृहस्थ निर्माण का भार वहन करने के लिए विवाह वेदी पर प्रस्तुत कर दिया जाता है।
युवावस्था आने से पूर्व विवाह करना, अबोध बालकों का बाल विवाह भी भला कोई विवाह है। उसे तो एक श्रेष्ठ परम्परा का थोथा प्रदर्शन मात्र कहा जा सकता है। इसी प्रकार अनमेल विवाह भर्त्सना के योग्य है। अधेड़ एवं बूढ़े आदमी यदि अपनी बेटी, पोतियों की आयु की बच्चियों से विवाह करें तो उसमें क्या तो नैतिकता मानी जायगी और क्या मानवता एवं क्या सामाजिकता? कई-कई बच्चे होते हुए भी पुरुष एक के बाद दूसरे कई-कई विवाह करते चले जायें, पर स्त्री यदि अल्पायु में भी विधवा हो जाय तो उसे उस प्रकार की सुविधा न मिले। इस तरह के पक्षपात एवं अन्याय युक्त कानून जिस समाज में प्रचलित हों और उसके लोग इस अनीति का समर्थन भी करते हों, तो उसे अपने को धर्मवान कहलाने का भला क्या अधिकार हो सकता है?
आज जिस ढंग से, जिस आडम्बर, अहंकार और तामसी वातावरण में विवाह-शादियाँ होती हैं, उन्हें देखकर किसी भी प्रकार यह नहीं कहा जा सकता कि यह दो आत्माओं के आत्म-समर्पण के लिए आयोजित सर्वमेध यज्ञ का धर्मानुष्ठान है। उन दिनों तमोगुण की ही घटायें छाई रहती हैं। अश्लील गीत, गन्दे नाच, ओछे मखौल, पान, बीड़ी, भाँग शराब की धूम, देखकर उसकी संगति यज्ञ से कैसे बिठाई जाय?
.... क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति जुलाई 1965 पृष्ठ 44
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