परमहंस रामकृष्ण जी के उपदेश!
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पानी पड़ते ही मिट्टी गल जाती है किन्तु पत्थर ज्यों का त्यों बना रहता है। दुर्बल श्रद्धा वाले मनुष्य दुःखों में घबरा जाते हैं किन्तु परमात्मा पर विश्वास करने वाला पत्थर की तरह अविचल बना रहता है। पटरी पर चलने वाला इंजन, लोहे व पत्थर से भरे हुए अनेकों डिब्बों को खींचता हुआ दौड़ता रहता है। धर्म मार्ग पर चलने वाला अनेक साँसारिक मनुष्यों को अपने साथ पार करता जाता है।
बच्चे एक खम्भे को पकड़ कर उसके चारों ओर घूमते रहते हैं, किन्तु गिरते नहीं। इसी तरह ईश्वर का अवलम्ब रख कर मनुष्य साँसारिक कर्म करता हुआ भी पतित नहीं होता।
फटे-पुराने जूते और कपड़े पहनने से नम्रता के विचार उत्पन्न होते हैं और कोट-बूट पहनने से अभिमान पैदा होता है। चिकन का कुर्ता और पल्लेदार टोपी पहन कर गज़लें गाने की सूझती है तो गेरुआ वस्त्र पहन कर वैराग्य के विचार उठते हैं। वस्त्र निर्जीव हैं फिर भी उनकी श्रेणी के अनुसार विचार उत्पन्न होते हैं। सादगी पसन्द लोगों को सादे वस्त्र पहनने चाहिये।
सूर्य प्रकाश सब जगह एक समान पड़ता है परन्तु पानी या शीशे जैसे स्वच्छ पदार्थों पर ही, उसका प्रतिबिम्ब पड़ता है, इसी प्रकार का ईश्वर प्रकाश सर्वत्र सामने है, किन्तु वह दिखाई पवित्र आत्माओं में ही देता है।
कचौड़ियाँ बाहर से तो आटे की होती हैं, किन्तु भीतर मसाला भरा होता है, उनकी अच्छाई, बुराई भीतर के मसाले से देखी जाती है, इसी प्रकार सब मनुष्यों के शरीर तो प्रायः एक से ही होते हैं, परन्तु हृदयों में अन्तर होता है, इसी अन्तर के कारण भले और बुरे, की पहचान की जाती है।

