प्राणियों को रचने वाला
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(महामना पं. मदनमोहन जी मालवीय)
हम देखते हैं कि प्राणात्मक जगत् की रचना इस बात की घोषणा करती है कि इस जगत् का रचने वाला एक ईश्वर है। यह चैतन्य जगत् अत्यन्त आश्चर्य से भरा हुआ है। जरायु से उत्पन्न होने वाले मनुष्य, सिंह, हाथी, घोड़े, गौ आदि; अण्डों से उत्पन्न होने वाली पक्षी; पसीने और मैल से पैदा होने वाले कीड़े; पृथ्वी को फोड़कर उगने वाले वृक्ष, इन सबकी उत्पत्ति, रचना और इनका जीवन परम आश्चर्यमय है। नर और नारी का समागम होता है। उस समागम में नर का एक अत्यन्त सूक्ष्म किन्तु चैतन्य अंश गर्भ में प्रवेश कर नारी के एक अत्यन्त सूक्ष्म सचेत अंश से मिल जाता है, इसको हम जीव कहते हैं।
एक बाल के आगे के भाग के खड़े-खड़े सौ भाग कीजिये और उन सौ में से एक के फिर सौ खड़े-खड़े टुकड़े कीजिये और इसमें से एक टुकड़ा लीजिये तो आपको ध्यान में आवेगा कि उतना सूक्ष्म जीव है। यह जीव गर्भ में प्रवेश करने के समय से शरीर रूप से बढ़ता है। विज्ञान के जानने वाले विद्वानों ने अणुवीक्षण यंत्र से देखकर यह बताया है कि मनुष्य के वीर्य के एक बिन्दु में लाखों जीवाणु होते हैं और उनमें से एक ही गर्भ में प्रवेश पाकर टिकता और वृद्धि पाता है। नारी के शरीर में ऐसा प्रबंध किया गया है कि यह जीव गर्भ में प्रवेश पाने के समय से एक नली के द्वारा आहार पावे, इसकी वृद्धि के साथ-साथ नारी के गर्भ में एक जल से भरा थैला बनता जाता है जो गर्भ को चोट से बचाता है। इस सूक्ष्म से सूक्ष्म, अणु से अणु, बाल के आगे के भाग के दस हज़ार वे भाग के समान सूक्ष्म वस्तु में यह शक्ति कहाँ से आती है कि जिससे यह शक्ति कहाँ से आती है कि जिससे यह धीरे-धीरे अपने माता और पिता के समान रूप रंग और सब अवयवों को धारण कर लेता है? कौन सी शक्ति है, जो गर्भ में इसका पालन करती और इसको बढ़ाती है? यह क्या अद्भुत रचना है, जिससे बच्चे के उत्पन्न होने के थोड़े समय पूर्व ही माता के स्तनों में दूध आ जाता है? कौन सी शक्ति है, जो सब असंख्य प्राणवन्तों को, सब मनुष्यों को, सब पशु-पक्षियों को, सब कीट-पतंगों को, सब पेड़-पल्लवों को पालती है और उनको समय से चारा और पानी पहुँचाती है? कौन सी शक्ति है, जिससे चींटियाँ दिन में भी और रात में भी सीधी-भीत पर चढ़ती चली जाती हैं? कौन सी शक्ति है, जिससे छोटे से छोटे और बड़े से बड़े पक्षी अनन्त आकाश में दूर से दूर तक बिना किसी आधार के उड़ा करते हैं?
नरों और नारियों की, मनुष्यों की, गौवों की, सिंहों की, हाथियों की, पक्षियों की, कीड़ों की सृष्टि कैसे होती है? मनुष्यों से मनुष्य, सिंहों से सिंह, घोड़ों से घोड़ा, गौवों से गौ, मयूरों से मयूर, हंसों से हंस, तोतों से तोते, कबूतरों से कबूतर, अपने-अपने माता-पिता के रंग-रूप-अवयव लिये हुए कैसे उत्पन्न होते हैं? छोटे से छोटे बीजों से किसी अचिन्त्य शक्ति से बढ़ाये हुए बड़े और छोटे असंख्य वृक्ष उगते हैं तथा प्रतिवर्ष और बहुत वर्षों तक पत्ती, फल, फूल, रस, तैल, छाल और लकड़ी से जीवधारियों को सुख पहुँचाते, सैकड़ों, सहस्रों स्वादु, रसीले फलों से उनको तृप्त और पुष्ट करते, बहुत वर्षों तक श्वास लेते, पानी-पीते, पृथ्वी से और आकाश से आहार खींचते, आकाश के नीचे झूमते-लहराते रहते हैं?
इस आश्चर्यमयी शक्ति की खोज में हमारा ध्यान मनुष्य के रचे हुए एक घर की ओर जाता है। हम देखते हैं, हमारे सामने यह एक घर बना हुआ है। इसमें भीतर जाने के लिये एक बड़ा द्वार है। इसमें अनेक स्थानों में पवन और प्रकाश के लिये खिड़कियाँ तथा झरोखे हैं। भीतर बड़े-बड़े खम्भे और दालान हैं। धूप और पानी रोकने के लिये छतें और छज्जे बने हुए हैं। दालान-दालान में, कोठरी-कोठरी में भिन्न-भिन्न प्रकार से मनुष्य को सुख पहुँचाने का प्रबंध किया गया है। घर के भीतर से पानी बाहर निकालने के लिये नालियाँ बनी हुई हैं। ऐसे विचार से घर बनाया गया है कि रहने वालों को सब ऋतु में सुख देवें। इस घर को देखकर हम कहते हैं कि इसकी रचना करने वाला कोई चतुर पुरुष था, जिसने रहने वालों के सुख के लिये जो-जो प्रबंध आवश्यक था, उसको विचार कर रचा। हमने रचने वाले को देखा भी नहीं, तो भी हमको निश्चय होता है कि घर का रचने वाला कोई था या है और वह ज्ञानवान विचारवान पुरुष है।
अब हम अपने शरीर की ओर देखते हैं। हमारे शरीर में भोजन करने के लिये मुँह बना है। जिसको पचाने के लिये गले में नानी बनी है। उसी के पास पवन, के मार्ग के लिये एक दूसरी नाली बनी हुई है। भोजन को रखने के लिये उदर में स्थान बना है। भोजन पचकर रुधिर का रूप धारण करता है, वह हृदय में जाकर इकट्ठा होता है और वहाँ से सिर से पैर तक सब नसों में पहुँच कर मनुष्य के सम्पूर्ण अंगों को शक्ति, सुख और शोभा पहुँचाता है। भोजन का जो अंश शरीर के लिये आवश्यक नहीं है। उसके मल होकर बाहर जाने के लिये मार्ग बना है। दूध, पानी या अन्य रस का जो अंश शरीर को पोसने के लिये आवश्यक नहीं है, उसके निकलने के लिये दूसरी नाली बनी हुई है। देखने के लिये हमारी दो आँखें, सुनने के लिये दो कान, सूँघने को नासिका के दो रन्ध्र और, चलने-फिरने के लिये हाथ-पैर बने हैं। सन्तान की उत्पत्ति के लिये जनन इन्द्रियाँ हैं। हम पूछते हैं- क्या यह परम आश्चर्यमय रचना केवल जड़ पदार्थों के संयोग से हुई है? या इसके जन्म देने और वृद्धि में, हमारे घर के रचयिता के समान, किन्तु उससे अनन्त गुण अधिक किसी ज्ञानवान विवेकवान शक्तिमान आत्मा का प्रभाव है?
इसी विचार में डूबते और उतराते हुए अपने मन की ओर ध्यान देते हैं तो हम देखते हैं कि हमारा मन भी एक आश्चर्यमय वस्तु है इसकी-हमारे मन की विचारशक्ति, कल्पनाशक्ति गणनाशक्ति, रचना शक्ति, स्मृति, घी, मेधा हमको चकित करती है। इन शक्तियों से मनुष्य ने क्या-क्या ग्रंथ लिखे हैं, कैसे-कैसे काव्य रचे क्या-क्या विज्ञान निकाले हैं, क्या-क्या आविष्कार किये हैं और कर रहे हैं। यह थोड़ा आश्चर्य नहीं उत्पन्न करता। हमारी बोलने और गाने की शक्ति भी हमको आश्चर्य में डुबा देती है। हम देखते हैं कि यह प्रयोजन व्रती रचना सृष्टि में सर्वत्र दिख पड़ती है और यह रचना ऐसी है कि जिससे अन्त तथा आदि का पता नहीं चलता इस रचना में एक-एक जाति के शरीरियों के अवयव ऐसे नियम से बैठाए गये हैं कि सारी सृष्टि शोभा से पूर्ण है। हम देखते हैं कि सृष्टि के आदि सारे जगत् में एक कोई अद्भुत शक्ति काम कर रही है, जो सदा से चली आई है, सर्वत्र व्याप्त और अविनाशी है।
हमारी बुद्धि विवश होकर इस बात को स्वीकार करती है कि ऐसी ज्ञानात्मिका रचना का कोई आदि, सनातन, आज, अविनाशी, सत-चित्-आनन्द स्वरूप जगत-व्यापक, अनन्त-शक्ति सम्पन्न रचयिता है। उसी एक अनिर्वचनीय शक्ति को हम ईश्वर, परमेश्वर, परब्रह्म, नारायण भगवान वासुदेव, शिव, राम कृष्ण, जिसके जिहोवा, गाँड, खुदा, अल्लाह आदि सहस्रों नाम से पुकारते हैं।

