दो सरल प्राणायाम
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दिन भर काम करने में शरीर का बहुत सा अंश खर्च हो जाता है और उसे थकावट आ जाती है, खर्च हुए पदार्थों में से कुछ तो स्थूल होते हैं, जो भोजन आदि द्वारा प्राप्त हो जाते हैं; किन्तु कुछ ऐसे होते हैं, जिनका सम्बंध सूक्ष्म लोक से है। यह पदार्थ भोजन से नहीं, वरन् मन की आकर्षण शक्ति द्वारा प्राप्त होते हैं।
कुविचारों और दुर्भावनाओं के कारण माँस पेशियों और नाड़ी संस्थान पर एक प्रकार का तनाव और अनावश्यक खिंचवा पड़ता है, इससे ओर भी अधिक परिमाण में शक्तियों का ह्रास होता है, तदनुसार मनुष्य मृत्यु को निकट खिंचता जाता है। क्रोध आने से भौहें बनी रहती हैं, कपट से चेहरे के भाव दूसरी तरह के बनाने पड़ते हैं। धोखेबाज लोगों के कंठ पर अधिक खिंचाव पड़ने के कारण उनकी वाणी में कर्कशता आ जाती है। धीरे-धीरे यह बाह्य चिन्ह आदत का रूप धारण कर लेते हैं और शरीर में स्थायी अड्डा जमा कर बैठ जाते हैं।
शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के इच्छुकों को चाहिये कि नित्य अपने मन की दुर्भावनाओं को मिटाने और तज्जनित स्नायविक तनाव को दूर करने का प्रयत्न करते रहें। नीचे ऐसे ही दो अभ्यास बताये जाते हैं।
1. शरीर को ढीला और सम स्थिति में रख कर आसन के ऊपर सुखपूर्वक बैठ जाओ। ठोड़ी को थोड़ा सा भीतर की ओर झुकाओ और मुँह बन्द कर लो। पर दांतों को भींच कर मिलाने की जरूरत नहीं हैं। स्थिरतापूर्वक बैठ कर नाक के द्वारा धीरे-धीरे साँस लेना आरंभ करो और जब पूरी साँस खींच लो, तो 5 सेकिंड उसे अन्दर रोको और फिर उसे धीरे-धीरे बाहर निकाल दो। साँस खींचते समय इस प्रकार की भावना करो कि वायु के साथ पवित्र प्राण तत्व हमारे शरीर में प्रवृष्ट हो रहा है। कुँभक करते समय अनुभव करो कि खींची हुई जीवनी शक्ति शरीर के अंग प्रत्यंगों में व्याप्त होकर उन्हीं में घुल रही है। साँस छोड़ते समय मनन करो कि अन्दर के शारीरिक और मानसिक विष बलपूर्वक खींच कर बाहर फेंके जा रहे हैं।
इस बात का पूरा ध्यान रखना चाहिये कि अभ्यास के समय में तनाव कम होता जावे। हर अंग को ढीला-ढाला और विश्राम करने की हालत रखना चाहिए। इससे कुविचारों के कारण अवयवों को तने रहने की जो आदत पड़ जाती है, वह छूटने लगती है और शरीर अनावश्यक शक्ति व्यय करने से बच जाता है। पहला अभ्यास कम से कम 4 सप्ताह करना चाहिए, इसके बाद दूसरे अभ्यास का साधन करने के लिए आगे बढ़ना चाहिए।
2. पूर्वोक्त शिथिलासन पर बैठ कर दाहिने हाथ की उंगलियों से नाक का बाँया छिद्र बंद करो और फिर दाहिने छेद से धीरे-धीरे साँस खींचो। जब पूरी वायु खींच लो, तो अंगूठे से खुले हुए छेद को भी बन्द कर लो और जितनी देर आसानी से वायु रोक सको भीतर रोके रहो। तदुपरान्त दाहिने छेद को बन्द करके बाँए छेद से धीरे-धीरे साँस निकाल दो। अब कुछ देर बिना साँस के रहो और फिर पहले की तरह साँस खींचने, रोकने और छोड़ने की क्रिया दुहराओ। इस प्रकार पाँच मिनट से आरंभ करके आधे घंटे तक यह प्राणायाम करने का अभ्यास बढ़ाना चाहिये। हर क्रिया के साथ शुद्ध प्राण तत्व खींचने, उसे सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त होने और विषैले पदार्थों के बाहर निकल जाने की भावनाओं को क्रमानुसार अवश्य दुहराना चाहिए। इसी प्रकार नाड़ियों को पूर्ण रूप से ढीला रखने का ध्यान रखना चाहिये। इस अभ्यास को लगातार करते रहने से मन में उत्तम गुणों का समावेश होता है और बुराइयाँ हटने लगती हैं।

