सूर्य की जीवनदात्री शक्ति
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प्राणियों को जीवन और आरोग्य प्रदान करके उनके रोग और अंधकार को दूर करने की जितनी शक्ति सूर्य में हैं, उतनी संसार भर के समस्त आरोग्यप्रद पदार्थों को मिला देने से भी नहीं हो सकती। भारतीय तत्वदर्शी इस रहस्य को अतीतकाल से जानते हैं, अतएव उन्होंने सूर्य को भगवान माना है और अपने दैनिक कार्यों एवं धार्मिक विधान में सूर्य के सम्मुख रहने, उससे शक्ति प्राप्त करने की उत्तम व्यवस्था की है।
वैज्ञानिक खोजों ने सूर्य की अद्भुत शक्ति को एक स्वर से स्वीकार किया है। सर्वप्रथम विज्ञान-वेत्ता नौर्मन डेवी ने अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में अपने महत्वपूर्ण अनुसंधानों के पश्चात् यह घोषित किया था कि “सूर्य से बढ़ कर रोगों को दूर करने वाला और कोई चिकित्सक नहीं है। सूर्य रश्मियों की समता संसार की कोई औषधि नहीं कर सकती, करोड़ों बीमारियों को बहुत ही शीघ्र दूर कर देना सूर्य शक्ति के अर्न्तगत ही हो सकता है।”
एक दूसरे आधुनिक अन्वेषक ने निर्विवाद-रूप से इस बात को मान लिया है, कि रोग कीटों को नष्ट करने की सूर्य किरणों में प्रचंड शक्ति है। कृमिनाशक, जर्मीसाइड (Germicide) या फनायल आदि किसी वस्तु में वैसा गुण नहीं है।
सर आलिवर लाज इस बात पर आश्चर्य प्रकट करते हैं, कि लोग स्वास्थ्य की उन्नति के लिए अनेक भोज्य पदार्थों, औषधियों और विशिष्ट क्रिया की खोज तो करते हैं, किन्तु सूर्य की किरणें जो आरोग्यता की अद्वितीय शक्ति रखती हैं और मुफ्त मिलती हैं, उन्हें न जाने क्यों नहीं अपनाते?
इंग्लैंड के मेडिकल सुपरिन्टेन्डेन्ट सर हेनरी गौवेन अपना अनुभव बताते हुए कहते हैं, कि जिन लोगों को सूर्य का प्रकाश नहीं मिलता या कम मिलता है, अधिकाँश वे ही लोग पागल, दुष्टकर्मा, अपाहिज, अशक्त और बीमार रहते हैं। मृत्यु रजिस्टरों की रिपोर्ट इस बात की साक्षी है, कि जिस ऋतु में कुहरा अधिक रहता है और सूर्य की किरणें पृथ्वी पर कम आती हैं, उन दिनों में मृत्यु संख्या अधिक बढ़ जाती है। सबसे अधिक अंधेरा सूर्योदय से कुछ घड़ी पहले रहता है, इसलिए उसी समय बहुत बड़ी संख्या में रोगियों का महाप्रयाण होता है।
टाइम्स के सन् 1923 के 18 अप्रैल के अंक में उसका मेडीकल रिपोर्टर लिखता है, कि इस वर्ष इंग्लैंड और वेल्स में मृत्यु संख्या का अनुपात 1.21 रहा। इतनी कम मृत्युएं आज तक कभी इस देश में नहीं हुई थी। कारण यह है कि इस साल सूर्य का प्रकाश हमारे देश को प्रचुर परिमाण में प्राप्त हुआ, जो कि निश्चित रूप से रोगों को दूर करने वाला और जीवनी शक्ति को बढ़ाने वाला है।
तपेदिक की बीमारी-क्षय के सम्बंध में हैलिंग द्वीप के सैंडी वाइंट स्थान में बहुत अन्वेषण हुआ है और वहाँ बड़े-बड़े शरीर शास्त्रियों ने इस सम्बंध में गहरी खोजें की हैं, इस सब का विस्तृत विवरण श्री सी. ई. लोरेन्स ने एक पुस्तक में प्रकाशित किया है, वे कहते हैं कि- ‘यह प्रभाव प्रत्यक्ष देख लिया गया है, कि सूर्य की किरणों के प्रयोग से बीमारों के फेफड़े की सूजन कम हो जाती है और भीतर की क्षय के कीटाणु धूप लेने के बाद बहुत घट जाते हैं। इसी प्रकार जो अनेकानेक परिवर्तन होते हैं, उनका कारण अल्ट्रा वायलेट (द्यह्लह्ड्ड कद्बशद्यद्गह्ल) किरणें ही नहीं, वरन् धूप के अन्य तत्व भी हैं, जिनका अनुसंधान अभी किया ही जा रहा है।
डाँक्टर मेवरिन ने इस बात को प्रमाणित किया है, कि बच्चे की हड्डियाँ टेढ़ी हो जाने का रोग (Ricket) सूर्य का प्रकाश पर्याप्त न मिलने के कारण होता है और जब इन रोगी बच्चों को धूप की समुचित व्यवस्था कर दी जाती है, तो वह बीमारी अच्छी हो जाती है।
वेद कहता है, कि सूर्य संसार की आत्मा है। भौतिक विज्ञान, इस सूत्र के एक-एक पद पर महाभाष्य रच रहा है। विश्व के समस्त तत्वज्ञ एक स्वर से घोषित करते हैं, सूर्य से बढ़ कर कोई डॉक्टर नहीं। किन्तु हाय, अज्ञानी मनुष्य अब भी सभ्यता के नाम पर धूप का सेवन करना नहीं चाहते और खोये हुए स्वास्थ्य को सुधारने के लिए सद्वैद्य सूर्य से बच कर इधर-उधर टक्करें खाते फिरते हैं। प्रभु, इस अज्ञान को शीघ्र दूर करें।

