मन चंगा तो कठौती में गंगा
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शरीर सा प्रदोष या निर्दोष होना, स्वस्थ या रोगी होना मन के ऊपर निर्भर है, क्योंकि वस्तुतः शरीर पर मन का ही शासन है। जिस प्रकार शासक को पराजित किये बिना कोई शत्रु राज्य पर अधिकार नहीं कर सकता। उसी प्रकार मन के परास्त हुए बिना दुःख शोकों का आगमन शरीर में नहीं हो सकता। इस सुदृढ़ दुर्ग की सब दीवारें अभेद्य हैं, आवागमन का केवल वही एक द्वार है, जिस का प्रहरी मन है। मन जब तक अपना दरवाजा न खोल दे कहीं से कोई वस्तु इस शरीर में आ जा नहीं सकती।
यह समझना भ्रम है कि शरीर पर मन का कोई विशेष अधिकार नहीं होता। हम रोज देखते हैं, कि मनोभावों की प्रतिक्रिया तत्क्षण शरीर के ऊपर होती है। एक समाचार को सुन कर दिल धड़कने लगता है, तो दूसरे को सुन कर उसकी गति मन्द पड़ जाती है। प्रेम और आशा की भावनाओं से चेहरा दमकने लगता है, भय से रक्त का अवरोध होता है, घृणा से सिर चकरा जाता है, क्रोध से रक्त सूखता है, लोभ से मन्दाग्नि पैदा होती है और कामुकता के विचारों से क्षयी तक उत्पन्न हो जाती है। इससे सिद्ध होता है कि आत्मा और शरीर का सम्बंध सूत्र मन ही है और मन की स्वस्थता अस्वस्थता से शारीरिक प्रत्यक्ष परिस्थितियाँ उत्पन्न होती हैं।
कहा जाता है कि आहार के अनुसार शरीर बनता है। हमारा मत है कि मन के अनुसार शरीर बनता है। अमुक वस्तु बहुमूल्य है, अमुक श्रेणी के विटामिनों से युक्त है, इससे यह प्रमाणित नहीं होता कि यह पदार्थ शरीर को लाभ ही पहुँचावेगा। कई मनुष्यों को दूध से घृणा हो जाती है, यदि वे एक बूँद भी दूध पी लें तो उलटी हुए बिना न रहेगी। डॉक्टरी मतानुसार अण्डा एक पौष्टिक भोजन है, किन्तु एक धार्मिक मनोवृत्ति के हिन्दू को अण्डा खिला दिया जाए तो वह बीमार हुए बिना न रहेगा। मछली का तेल किन्हीं के लिए टॉनिक हो सकता है, परन्तु कोई ऐसे भी होते हैं, जिन्हें उसकी गंध मात्र उलटी करा देने के लिए काफी है। इसका तात्पर्य यह है कि भोजन के गुण, खाने वाले के मनोभावों के सदृश्य होते हैं। क्रोध और शोक के साथ किया हुआ बहुमूल्य भोजन विषैले पदार्थ की तुलना करेगा, किन्तु हंसी खुशी के साथ खाई हुए कोदों की रोटी अंगूरों के रस जैसी बलदायक होगी।
जो लोग स्वस्थ और निरोग रहना चाहते हैं, उन्हें समझ लेना चाहिए कि इसका मूल केन्द्र मन है। कहा है कि- मन चंगा तो कठौती में गंगा। मन के पवित्र और प्रसन्न होने पर कठौती जैसे क्षुद्र साधन के अंतर्गत गंगा जैसे दुर्लभ तत्व भरे जा सकते हैं, यह कोई कल्पना नहीं, वरन् अक्षरशः सत्य है। अपनी स्थिति के अनुसार जो कुछ भोजन तुम प्राप्त कर सकते हो उसे पवित्रता और प्रसन्नता के साथ खाओ। एक-एक ग्रास के चर्वण के साथ अमृतत्व की भावना करते जाओ। थाली पर हाथ डालते और छोड़ते समय परमात्मा से प्रार्थना करो कि हे प्रभु यह अन्न हमारे लिए कल्याणकारी हो हमें अमृतत्व प्रदान करें। निश्चय ही वह अन्न हमारे लिए उत्तम पौष्टिक पदार्थों के समान बलवर्द्धक सिद्ध होगा।
अपने दैनिक जीवन में मन को ऐसी स्थिति में रखिए कि वह प्रसन्न रहे और निराशा एवं क्षोभ के अन्ध कूप में न गिरने पावे। अपने कार्यों को निर्दोष एवं पवित्र रखिए, जिससे आन्तरिक शान्ति नष्ट न होने पावे। निर्भय और निर्द्वन्द रहिए ताकि रोग शोक आपको देखते ही उल्टे पाँवों लौट जावें कहते हैं कि भूत वहाँ जाते हैं जहाँ उन्हें बुलाया जाता है। इसी प्रकार रोग वहाँ जाते हैं, जहाँ उनका आदर होता है जो रोग की आवभगत नहीं करता यहाँ तक कि उनके आने का विचारक तक मन में नहीं उठने देता, उसके घर ‘तिरस्कृत अतिथि की तरह वे पुनः वहाँ जाने की इच्छा नहीं करते। दुर्गुणों और कुविचारों के लिये अपने मन के कपाट मत खोलिये क्योंकि रोग और शोक इन्हीं का नाम है। आप चाहे कुछ कहते रहें पर हमें दृढ़तापूर्वक यही घोषणा करने दीजिये कि सुविचार ही स्वास्थ्य है, प्रसन्नता की शक्ति है। यदि कोई स्वस्थ रहना चाहता है तो मन को पवित्र और प्रसन्न रखे, क्योंकि मन चंगा तो कठौती में गंगा का सिद्धाँत बिलकुल सत्य है।

