हरिवंश पुराण में सतयुग
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(ले. पं. श्यामबिहारी लाल, रस्तोगी बिहार शरीफ)
शस्य चौरा भविष्यन्ति तथा चैला पहारिणः।
भक्ष्य भोज्या पहारश्च करण्डा नाँश्च हारिणः॥ 22
चौरा श्चौरस्य हन्तारो हन्ता हर्तु भविष्यति।
चौरे श्चौर क्षये चापि कृते क्षेमं भविष्यति॥23॥
लोग अन्न, वस्त्र, तथा खाने पीने की चीजों को भी चुराने लगेंगे। चोर आपस में ही चोरी करेंगे, और एक दूसरे को मारेंगे, इस प्रकार जब चोरों से चोरों का नाश होगा तब शान्ति होगी। उस समय-
निःसारे क्षुभित लोके निष्क्रिये कन्तर स्थिते।
नराः श्रयिष्यन्ति वनं कर भारं प्रपीड़िता॥24॥
दुनिया के लोग अपने को निःसार और बेकार समझ कर दुखित होंगे और क्या करें क्या न करें सोचेंगे ठीक इसी समय प्रजा पर इतने अधिक टैक्स जायेंगे की प्रजा दुखित होकर वन को चली जायेगी और सारी प्रजा -
कृत्रनं वा हिम वल्पार्श्व कूलं च लवणाँ भसाँ।
अरन्येषु च वत्स्यन्ति नरा म्लेच्छग्गौःसह॥32।
सम्पूर्ण हिमालय के बगल में, या लवण सागर के तट पर वनों में मनुष्य म्लेच्छगणों के संग निवास करेंगे उस समय संसार में इतने कम लोग रहेंगे कि -
नैव शून्या न चा शून्या भविष्यति वसुँधरा।
गौप्तार चाणय गोप्तारः, प्रभविष्यन्ति शास्त्रिणः॥33
न तो ‘पृथ्वी खाली हो गई’ यह कहा जा सकेगा और न यही कहा जा सकेगा कि पृथ्वी में काफी मनुष्य हैं, उस समय इतने व्यक्ति ही मौजूद रहेंगे, जितने हिमालय के तट पर तथा वनों में रह सकें क्योंकि सभी व्यक्ति तो महायुद्ध इत्यादि के कारण काल के गाल में रहेंगे जो थोड़े से व्यक्ति रह जायेंगे वे ही वनों में और हिमालय के बगल में रहेंगे। इनमें भी जो शस्त्रधारी होंगे वे कुछ रक्षक होंगे और कुछ सताने वाले। वन में भी इन मनुष्यों को -
कीट मूषक सर्पाश्च घर्ष मिष्यन्ति मानवान्।
क्षेमंसंभिक्ष मारोग्यं सामम्त्रयं वापि वन्धुषु॥
उदेशतो नर श्रेष्ठे भविष्यन्ति युग क्षये॥
कीट मूषक सर्प मनुष्यों को सतायेंगे, क्षेम, सुभिक्ष, आरोग्य, बन्धुओं में ममता, यह सब किसी न किसी मतलब से होंगे उस समय के वन और हिमालय वासी गण-
मृगैर्तैमत्सय विहंगश्च श्वापदै सर्प कीटकैः॥
मधु शाक फ र्लै मूर्लै वर्तयिष्यन्ति मानवाः॥34।
चीरं पर्ण च वहुलं वल्कलान्यधिना निचः।
स्वयं कृतानि वत्स्यन्ति यथा मुनि जनास्तथाः।35॥
मृग, मछली, विहंग, श्रखपद, कीट, मधु शाक, फल, मूल इन से अपनी आजीविका करेंगे और चीर अनेक प्रकार के वर्ण बक्कल आदि यह सब मुनि जनों के समान धारण करेंगे -
भविष्यति तदात तेजाँ रोगै रैर्निद्रय सक्षयः।
आयुः प्रक्षय सं रोधा द्विषादः प्रभविष्यति॥41॥
सुश्रुषवो भविष्यन्ति साधुना दर्शनेरताः।
सत्यं च प्रति पश्यान्त व्यवहारोप संक्षयात्॥42।
भविष्यन्ति च कामानाम लाभार्द्धम शीलिनः।
करिष्यन्ति च संकोचं रवपथ्य क्षय पीड़िताः॥43॥
एवं श्रुशुजनो दाने सत्य प्राणा निरक्षणे।
चतुष्पादः प्रवृत्त श्च धर्मः श्रेयोऽभियत्यते।44।
तेषाँ लब्धानुमाना नान् गुणोषु परिवर्तताम्।
स्वादु किंम्बिति विज्ञाय धर्म एवं वदिष्यति।45।
यथा हानि क्रमात्प्राप्ता तथा वृद्धि क्रमागता।
प्रगृहीत यतो धर्मे प्रवत्स्यन्ति कृतयुगत्॥46॥
उस समय से ही रोगों से उन की इन्द्रियों का क्षय होगा और आयु क्षय के संरोध से परम विषाद को प्राप्त होंगे उन्हें साधुओं के टहल और दर्शन की इच्छा होगी और साधुओं से उपदेश ग्रहण करेंगे, रोगी रहने के कारण सभी प्रकार के व्यवहार बन्द हो जाने के कारण सत्य वचन को बोलने लगेंगे। काम के न होने से धर्मशील हो जायेंगे आयु क्षय और रोग होने के डर से दुराचार को करने में संकोच करेंगे और दान करने लगेंगे प्रिय और सत्य बोलने के कारण जब वे सेवा भाव को अख़्तियार करेंगे तब धर्म चारों और से आ पहुंचेगा तब उन के मन में यह बात पैदा होगी कि अधर्म करना बुरा है, और धर्म करना बहुत अच्छा है तब सब कोई धर्म का उपदेश करेंगे और स्वयं धर्म ही पर चलेंगे जिस क्रम से क्रमशः करके धर्म की इतनी हानि हुई है, वैसे ही क्रम क्रम करके धर्म की वृद्धि होगी और जब सब धर्मी हो जायेंगे तब वही सतयुग कहा जायेगा। और जब सतयुग और धर्म दानों आ पहुँचेंगे तो सुख सम्पत्ति आप ही आ जायेंगी इसी प्रकार सारा संसार सुखी और सतयुगी होगा।

