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Magazine - Year 1942 - Version 2

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अवतार का उद्देश्य

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(अवतार क्यों और किस लिए होते हैं)

जब कि आत्मा परमात्मा का अमर पुत्र है और स्वेच्छा से अपने पिता की लीला भूमि में विचरण कर रहा है तो उसे अवतारी कहने में कुछ हर्ज नहीं है। इस दृष्टि से हर मनुष्य अवतार है। यदि ऐसा मानने में कुछ अड़चन हो तो महान् नेताओं को अवतार मानने में तो कुछ हर्ज है ही नहीं। मनुष्यों की लघुता महता उनकी आत्मिक योग्यता के ऊपर निर्भर है, जिसने परमात्मा का जितना अधिक भाग अपनी आत्मा में भर लिया है, वह उतना ही श्रेष्ठ है, पूजनीय है। क्योंकि उसमें परमात्मा की कलाएँ अधिक हैं। हिन्दू धर्म के अवतारों की कलाओं का भी उल्लेख है। परशुराम में 3, राम में 12, कृष्ण में 16 कलाएं बताई जाती हैं, इसका तात्पर्य है कि यह लोग आपस में एक दूसरे से छोटे बड़े भी थे। कलाओं की न्यूनाधिकता सिद्ध करती है कि यह लोग पूर्ण परमात्मा नहीं थे, इनमें कुछ न्यूनता थी। ठीक ही है शरीर धारी में कुछ न कुछ न्यूनता होती है, जब तक अविनाशी आत्मा जन्म मरण के चक्र में झूल रही है तब तक उसमें कुछ न कुछ त्रुटि ही प्रतीत होती है। अवतार और पूर्ण परमात्मा में जो अन्तर है वह यहाँ प्रगट हो जाता है।

सर्व व्यापक परमात्मा यदि एक ही स्थान पर एकत्रित हो जाये तो उसके सर्व व्यापकत्व में दोष आता है। जिस प्रकार अग्नि तत्व सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त है और यथा अवसर वह चिंगारी दीपक की लौ या धू धू जलती प्रचण्ड अग्नि शिखा के रूप में प्रकट होती रहती है, वैसे ही परमात्मा संज्ञा के अंश जीव अपने पिता की कलाएँ लेकर आवश्यकतानुसार प्रकट होते हैं। जब जाड़े की ऋतु आती है तो गाँवों में झोपड़ी झोपड़ी के आगे अलाव जलते नजर आते हैं। बढ़ी हुई सर्दी से सृष्टि की रक्षा करने के लिए जाड़े के दिनों में थोड़ी थोड़ी कलाओं के असंख्य अग्नि अवतार प्रति दिन होते है। अंधियारे पक्ष में दीपकों के अवतार बढ़ जाते हैं, किन्तु गर्मी आते ही अग्नि की और उजाले पक्ष में दीपकों की आवश्यकता घट जाती है, इसलिये उसके अवतार भी कम हो जाते हैं। तब लोहे की एक बड़ी राशि गलानी होती है तो सैकड़ों मन कोयलों की एक बड़ी भारी भट्ठी जलानी पड़ती है, उसी प्रकार महान् कार्यों को पूरा करने के लिए परमात्मा की अधिक कलाएँ लेकर कुछ दिव्य आत्माएँ अवतीर्ण होती हैं परमात्मा अपनी सृष्टि का संतुलन ठीक रखना चाहता है, इसलिए समय समय पर अलग अलग प्रकार के अवतार भेजता है। इनके कार्य यद्यपि एक दूसरे से भिन्न प्रतीत होते हैं पर वास्तव में एक ही वस्तु के कई रूप हैं जो स्थूल दृष्टि से देखने पर ठीक ठीक समझ में नहीं आते। ऋतुओं का परिवर्तन सर्दी, गर्मी और वर्षा कार एक दूसरे से विपरीत स्वरूप देख कर मूर्ख लोग इस असमंजस में पड़ जाते हैं कि ऐसा विपरीत अकारण क्यों होता है? पर सूक्ष्म दृष्टि से देखने पर यह विपरीत कार्य केवल समय की आवश्यकता को पूरा करने के लिए ही होते हैं और जब उनका कार्य समाप्त हो जाता है तो अन्तर्धान होकर दूसरे रूप में प्रकट होते हैं अवतारों के कार्य एक दूसरे के विपरीत प्रतीत होते हैं। भगवान बुद्ध और अवतारी शंकराचार्य के सिद्धान्त में पूरा पूरा विरोध है, ऐसा ही जैसा माघ की सर्दी में और वैशाख की गर्मी में। पर वास्तव में यह विरोध नहीं है, जब हिंसा, हत्या और पाखण्ड का जोर था तब बुद्ध ने अवतार लिया, जब संन्यास, अकर्मण्यता और नास्तिकता बढ़ गई तो शंकराचार्य को प्रकट होना पड़ा। सृष्टि का संतुलन रहना आवश्यक है। जिन जीवों की प्रजनन शक्ति अधिक होती है वे मरते भी तेजी से हैं, क्योंकि अनावश्यक वृद्धि की इस संसार में गुंजाइश नहीं है। पेट में कब्ज हुई कि कै, दस्त हुए, खून में खराबी आई, कि फोड़ा फुन्सी हुई, काट छाँट की कैंची हमेशा सिर पर लटकती रहती है। हमारा माली बहुत होशियार है, वह जरा भी झाड़ झंकार बढ़ने नहीं देता। बगीचे की शोभा उसे अभीष्ट है, इसलिए जरूरत के मुताबिक खोदने, खाद देने, सींचने, घास पात को नराने, उसे निकम्मे पेड़ों को उखाड़ने में जरा भी देर नहीं करता। पापों के बढ़ते ही, वह अपने खुरपी कुदाली सँभालता है और काट छाँट कर संतुलन ठीक कर देता है। इसी पुनरुद्धार मरम्मत परिवर्तन के बोलचाल की भाषा में युग परिवर्तन या क्रान्ति कहते हैं। जिस कुदाली के द्वारा यह कार्य सम्पन्न होते हैं, उसे दुनिया पूजती है क्योंकि वह अवतार है। अवतार की पूजा होनी ही चाहिये।

रामचन्द्रजी ईश्वर के विशिष्ट अवतार हैं, यदि त्रेता में लोगों को ऐसा विश्वास होता तो रामायण की कथा दूसरी ही प्रकार लिखी जाती। क्या कैकयी उन्हें वनवास दिलाती? क्या दशरथ पुत्र शोक में मरते? क्या रावण सीता को चुराता? बालि विरोध करता? निशाचर युद्ध करते? क्या लंका का सर्वनाश होता? तब इनमें एक भी बात न होती। भगवान जो घट घट में विराजमान है रावण के हृदय में जरासी प्रेरणा कर देते। बाल्मीकि की तरह वह भी तो सुधर सकता था, फिर इतनी गड़बड़ इकट्ठी करने की क्या जरूरत थी? लेकिन ऐसा हुआ नहीं? किसी ने उन्हें नहीं जाना। हनुमान और सुग्रीव ने बारबार परीक्षा की हनुमान ब्राह्मण का रूप बनाकर पहुँचे, सुग्रीव ने ताड़ के सात पेड़ों को जड़ से कटवा कर विश्वास किया, जिनका सम्बन्ध जन्म जन्मान्तरों से था व तक अड़चन में पड़े तो अन्य साधारण व्यक्तियों की तो बात ही क्या? असली में बात यह है कि अवतार की बात तब तक प्रगट नहीं हो सकती जब तक कि वह अपने उद्देश्य में सफल न हो जाय, या उसकी यह लीला समाप्त न हो जाये। सुखान्त अवतारों को सफलता के बाद पूजा जाता है और दुखान्त अवतारों को इनकी मृत्यु के पश्चात। राम को लंका विजय के बाद अवतार माना गया तो ईसा को क्रूस पर चढ़ने के बाद। यदि ईसा को जीवित दशा में ही अवतार मान लिया जाता तो क्या उसका खास शिष्य केवल 30/- के लिए उसे पकड़वा कर मरवा देता। अवतार का महत्व उसके छिपे रहने में ही है। जब तक पता नहीं चलता कि किसी की हार−जीत होगी तभी युद्ध होता है, यदि इस बात की पक्की धारणा हो जाये कि अमुक पक्ष की ही जीत होगी तो दूसरा पक्ष फिर विरोध न करेगा।

आध्यात्मिक तत्व के आचार्य इस बात को अच्छी तरह जानते हैं कि प्रभु की प्रेरणा से जो दिव्य आत्माएँ भू भार को हटा कर तात्कालिक संतुलन ठीक करने के लिए अवतार लेती हैं वे अलौकिक चमत्कार नहीं दिखातीं वरन् अपनी आत्मशक्ति का प्रचंड प्रयोग करके अदृश्य वातावरण को शुद्ध करती हैं। बाजीगरी के खेल दिखाने से पापी मनुष्य कुछ डर तो अवश्य जायेंगे पर अपनी चाल न छोड़ेंगे, वे अवतार का सामना न करेंगे और इधर-उधर घात सोचेंगे। जितने भी अवतार हुए हैं उनका निज का जीवन बड़ी कठिनाइयों से भरा हुआ है। कृष्ण को जीवन भर युद्ध संघर्ष, कलह, अपमान विद्रोह सहने पड़े और अन्त में बहेलिये के तीर का मर्मान्तक आघात सहना पड़ा। राम ने क्या क्या कष्ट नहीं सहे। ईसामसीह और मुहम्मद का जीवन ऐसी ही विघ्न−बाधाओं से भरा हुआ है। यह बातें प्रकट करती हैं कि अवतारों को उसके जीवन काल लोग जान ही नहीं पाते। बहुत बार तो कई अवतार तक को अपनी दिव्य दृष्टि का स्वयं पता नहीं चलता और जब उन्हें अचानक यह प्रतीत होता है कि मैं थोड़े से प्रयत्न से बड़ी भारी सफलता प्राप्त मिल रही तो उसके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहता। कहीं उसे अपने अन्दर भरी हुई विशेष कलाओं का ज्ञान होता है, रूस का उद्धारकर्ता लेनिन एक साधारण प्रतिभा का व्यक्ति था। जब वह अपने अज्ञात वास में पड़ा हुआ मृत्यु के दिन गिन रहा था तो उसने अचानक यह समाचार पढ़ा कि रूस में राज्य क्रान्ति हो गई और वह जिस सुनहरे स्वप्न को देखा करता था वह अचानक ही पूरा हो गया। युवराज गौतमबुद्ध एक मामूली से गृहस्थ थे उन्हें क्या पता था कि मैं संसार के कल्याण के लिए आया हूँ। भरी जवानी में जो राज महलों के शाही आनन्द लूट रहा था वह शायद ही कभी सोचता हो कि मुझे संन्यासी बनकर एक ईश्वरीय महान कार्य पूरा करना है।

हर मनुष्य अवतारी है यदि वह अपने सम्बन्ध में विचार करें और अपने महत्व का समुचित उपयोग करे तो ईश्वर अपनी इच्छा पूरी करने का उत्तर दायित्व उसे सौंप सकता है। आप बोझ को उठावेंगे जिसे कि अवतारों को उठाना पड़ता है तो आप भी अवतार बन सकते हैं ईश्वर की सभा में बीड़ा पड़ा हुआ है और वह अपने पुत्रों से पूछ रहा है कि क्या तुम से कोई अवतार की जिम्मेदारी ले सकता है? आप अपना हृदय टटोलिए और यदि साहस हो तो आगे को हाथ बढ़ा दीजिए।

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