अवतार का ठीक समय
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आज की विषम स्थिति में प्रभु का आना आवश्यक है।
अब ठीक यह समय अवतार होने का है। सृष्टि का संतुलन बहुत ही ऊँचा नीचा हो गया है। मानव जीवन की स्वाभाविक स्थिति बहुत ही विकृत हो गई। सरल जीवन कठिन और कंटकाकीर्ण बना हुआ है। प्रकृति की दी हुई वस्तुओं पर दूसरों का अनुचित कब्जा है। लोगों को स्वाभाविक आवश्यकताओं की पूर्ति से वंचित रहना पड़ता है। संसार में जीवन यापन के लिए आवश्यक वस्तुओं की कमी नहीं है, पर व्यवस्था ऐसी गड़बड़ है कि एक ओर तो असंख्य व्यक्ति भूखे तड़प तड़प कर प्राण दे रहे हैं। दूसरी ओर अन्न राशि को अग्नि की भेंट इसलिए किया जा रहा है कि पैसे वालों की इच्छानुसार भाव रहें। एक ओर बेकारी और गरीबी के चक्र में दुनिया पिस रही है , दूसरी ओर अमीरों के खजाने तूफानी वेग से बढ़े जा रहे है। सामाजिक जीवन और भी पेचीदा हो गया है। बाल विवाह, वृद्ध विवाह, कन्या विक्रय और क्रय, अपहरण, बलात्कार, तलाक, दुराचार आदि कारणों से दांपत्ति जीवन का स्वर्गीय आनन्द नष्ट हो गया है और उसके स्थान पर नारकी कलह एवं मनोमालिन्य उठ खड़ा हुआ है। मनुष्य-मनुष्य के बीच भाईचारे का प्रेम सम्बन्ध टूट गया है। काले, गोरे, दास, मालिक, गरीब, अमीर, ऊँच, नीच, छूत, अछूत, के बीच में इतनी गहरी खाई है कि एक दूसरे से बहुत दूर पड़ गये हैं। एक ही पिता की संतान, अपने भाई की छाया पड़ने से भी अपवित्र हो जाती है। हमारे अहंकार, हमारे अन्धकार! तेरा नाश हो।
स्वास्थ्य के नियमों का पालन करने के स्थान पर फैशन का शैतान विराजमान है। सिर से पैर तक फैशन से लदे हुए, अनावश्यक, अपवित्र और हानिकर टीमटाम के द्वारा रोगों का आशीर्वाद प्राप्त हो रहा है। इन्द्रिय लिप्सा से अन्धे होकर लोग शरीर के ईश्वर दत स्वतों को गला रहे हैं। आँखें गड्ढ़े में धँसी हुई, मुख सूखा हुआ, हंड्डियों का ढोल मात्र धारण किये हुए बाबू लोग इधर से उधर घूमते दिखाई देते हैं चुरुट का धुआँ फक फक फूँकते हुए नकली आँखों की सहायता से देखने वाले ये युवक जीते तो हैं, पर यदि इनकी जिन्दगी को भी जिन्दगी कहेंगे, तो मौत किस चीज को कहा जायेगा। रोगों का घर, व्याधियों का मन्दिर शरीर बना हुआ है। जो कमाते हैं डाक्टरों के बिल में चुका देते हैं, गरम पानी (चाय) से बासी रोटियाँ (बिस्कुट) खाना बस यही इनके भाग्य में बदा है। असली दूध दही मिलना मुश्किल हो रहा है। औसत आयु 20-22 वर्ष रह गई है। मक्खियों की तरह पैदा होते हैं और मच्छरों की तरह मर जाते हैं। बालकपन की पूँछ से बुढ़ापा जुड़ा आता है।
राजनीति अब धर्म-नीति नहीं रही है, उसे कूट नीति बनना पड़ा है। संधियाँ, वायदे, वचन, लोकहित, विश्व-कल्याण यह सब बात उपहासास्पद समझी जाती है। झूठ, फरेब कपट, स्वार्थ-साधन, जिस प्रकार भी होता हो वही राजनीति है। हम देख रहे हैं कि राजनीति के करणधार अपने विरोध को बुरा सिद्ध करने के लिए धर्म और न्याय की दुहाई देते हैं, पर उनके अपने व्यवहार में धर्म और न्याय को जरा भी स्थान देने के लिए तैयार नहीं होते। जनहित की संघ शक्ति शासन सत्ता आज चन्द लोगों का हित साधन करती हैं और अधिकाँश भूखे, नंगे लोग उनके भार से दबे हुए कराहते हैं।
धर्म के स्थान को पाखण्ड ने ग्रहण कर लिया है। अशिक्षित, आलसी, चोर, डाकू, लम्पट, शूद्र, पाखण्डी आज धर्म गुरु बने हुए हैं। कायर, प्रमादी, हरामी और व्यसनी भिखमंगे लाखों की संख्या में साधु संन्यासी बने हुए जनता को पथ भ्रष्ट करते फिर रहे हैं। अपना बड़प्पन प्रकट करने, पैर पुजाने, शिष्य बनाने और भिक्षा प्राप्त करने के अतिरिक्त और कोई कार्य धर्म गुरुओं का प्रतीत नहीं होता। सिद्धान्त और उपदेश उनकी जिह्वा तक ही है। पर उपदेश में कुशल हैं, किन्तु कुछ भी कष्ट सहन का प्रसंग आ जायं तब तो उनकी नानी ही मरती है।
आध्यात्म-ज्ञान! बस, यहाँ तो पूरी अराजकता है। अन्ध श्रद्धा, अज्ञान, भ्रम, उन्माद, हठधर्मी, यही अध्यात्मतत्त्व की चार दीवारी है। आज कपिल और कर्णादि हमें दिखाई नहीं देते, जो अपने तर्क और अनुभव की कुल्हाड़ी से भ्रम जंजालों की कटीली झाड़ियाँ को काट दें और आध्यात्म तत्व को अन्धकार में से उबारकर किनारे तक पहुँचा दें।
सभी दिशाओं में अव्यवस्था का साम्राज्य छाया हुआ है। इस अशान्ति की मरुभूमि में से दो पिशाच पैदा हुए हैं (1) स्वार्थ (2) असत्य। हर मनुष्य अपने स्वार्थ के साधन में प्रवृत्त है, इसके लिए वह बुरे से बुरे काम, नीच से नीच कुकर्म करने को तैयार है। पुरुष रुपयों के बदले अपनी कन्या का माँस तराजू से तोल कर वृद्ध और रोगी कुत्तों को बेचने लगे और स्त्रियाँ सतीत्व का व्यापार करने लगीं। चोरी, दगाबाजी, विश्वासघात, ठगी ऋण मारना, हत्या, कौन सा ऐसा जघन्य कार्य है जिसे मनुष्य अपने स्वार्थ साधन के लिए नहीं करते। पति पत्नी और पिता पुत्र का रिश्ता स्वार्थ की आधार शिला पर स्थापित होने लगे है। मनुष्य भेड़िये की तरह जीभ निकलकर दूसरों का रक्तपान करने के लिए इधर-उधर दौड़ता फिर रहा है। तृष्णा के मारे अन्धा हो रहा है अपना पराया उसे कुछ सूझ नहीं पड़ता। स्वार्थ और असत्य के पिशाचों ने मनुष्य जाति को अपनी मोहिनी में फाँस लिया है और संसार को अपनी उंगली के इशारे पर नचा नचा कर इस देव दुर्लभ भूमि को मरघट बनाये हुए है। अब दुनिया इस शोकानी चक्र में पड़ी-पड़ी व्याकुल हो रही है। अनाचार के बोझ से दबी हुई वसुन्धरा प्रार्थना कर रही है कि हे नाथ! अब मुझ से सहा नहीं जाता। भगवान उसकी प्रार्थना को स्वीकार करते हुए शीघ्र ही प्रकट होने की तैयारी कर रहे हैं।

