कारण-कार्य विवेचन
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सम्प्रति विश्व में इतस्ततः यह उद्घोष हो रहा है, कि निकट भविष्य में युग परिवर्तनार्थ विश्वाधार जगद् गुरु का आविर्भाव होने वाला है। जिसका सम्बोधन यथा विधि अध्यात्मकों ने अध्यात्मविद्या से, नैयायिकों ने नीति सिद्धान्तों से, तत्वज्ञों ने तात्विक विवेचन से और गणितज्ञों ने गणित के प्रमाणों से प्रस्तुत सत्युगाँक में बड़ी खूबी के साथ कराया है।
मेरा अपना भी यह अभिमत है कि अनेक जन्मों में लौकिक और पारलौकिक बहुशः अनुभवों से परिपक्व और पूर्ण होकर जीव पूर्णता की ओर जाता है। जिन विशिष्ट बातों को वह एक जन्म में सीखने से वंचित रहता है, उन्हें उत्तर जन्म में सीखता है और अन्ततः उस कक्षा में जा पहुँचता है, जहाँ सीखना बिलकुल शेष नहीं रह जाता। उस स्थिति में उसका संसार में आना और कार्य सम्पादन करना, उसकी एकान्त इच्छा पर या ईश्वराज्ञा, पर अवलम्बित रहता है।
ऐसे ही कैवल्य प्राप्त या मुक्त पुरुष गुरुजन रूप से संसार का व्यवस्थापन करते हैं। क्योंकि कभी कभी संसार की अव्यवस्थित और अप्रयोजनीय अवस्था के परिवर्तनार्थ वे पार्थिव शरीर भी धारण करते हैं और उचित तथा अनुचित का सम्पादन कर पुनः अपने लोक को प्रयाण कर जाते हैं।
इसके अतिरिक्त जब कि कार्य-सृष्टि में ऐसा असन्तुलन परिलक्षित होता है, जो उक्त महान आत्माओं द्वारा सम्यक् रूप से निवारित नहीं हो सकता, तब कारण स्वरूप परब्रह्म परमेश्वर को अपनी विशेष शक्ति नियोजित कर सृष्टि को सन्तुलित करना अनिवार्य हो जाता है। इसीलिये जगनिवास, जगदीश्वर को निज व्यवस्थापक गुण का सन्तुलन कार्य करना पड़ता है। उसी कर्त्ता आद्यशक्ति और व्यवस्था कर्त्तव्य गुण सम्पन्न विग्रह को बुद्धिमान अवतार रूप से अभिहित करते हैं। उसकी पूजा−अर्चा में निरत रहते हैं, जो कि हमारे कल्याणार्थ सर्वथा उचित भी है।
क्योंकि सृष्टि के सचराचर प्राणियों का यह स्वभाविक गुण है कि वे उपरोक्त ईश्वरीय-व्यवस्थापक गुण के अनुसार अपने अपने आत्मजों को जब कभी संकटापन्न अवस्था में देखते और अनुभव करते हैं, जो कि उनके पक्ष में अनिवार्य होता है, तब वे स्वयं उन्हें अपनी अपनी बुद्धिबल आदि गुणों के अनुसार संकट से बचाते हैं।
यह समग्र सृष्टि परम पिता परमेश की आत्मज हैं, क्योंकि वह सब में आत्म रूप से विद्यमान है। अतः जब सृष्टि अपनी संरक्षा करने में अक्ष्य और असमर्थ सिद्ध होती है। तब परम प्रभु परमात्मा को अपने पारमात्मिक गुणों का विशेष रूपेण प्रयोग करना पड़ता है।
कहने का प्रयोजन नहीं कि प्रस्तुत अंक का कलेवर इस विषय के ऊहापोहात्मक निबन्धों से परिपूर्ण है और उनके द्वारा जिज्ञासुओं को इस विषय की मानसिक ठोस भोजन पूर्ण सामग्री अनायास प्राप्त होती है।
अब प्रश्न यह है कि युग परिवर्तन क्या है? ‘युग‘ परिस्थिति सूचक काल या समय को कहते हैं। व्यवस्थित परिस्थिति सूचक समय कलियुग और सुव्यवस्थित परिस्थिति सूचक समय सतयुग कहलाता है।
जब सृष्टि में आसुरी संपदा विलुप्त होने लगती है, अथवा आसुरी स्वभाव वाले मनुष्य जो परपीड़ा में ही अपना मंगल सोचते, कर्त्तव्य कार्य में प्रवृत्त होना और अकर्त्तव्य से निवृत्त होना जानते ही नहीं, अगणित संख्या में बढ़ जाते हैं, उनमें सुव्यवस्थापक गुण बाह्य और अन्तर की शुद्धि तथा सत्य भाषण आदि की प्रभावना नहीं रहती। द्वेष, ईर्ष्या, घृणा, अभिमान आदि कुप्रवृत्तियां उन्हें अपना लक्ष्य बेध बना लेती हैं, तो वे नाना प्रकार के मारात्मक और सृष्टि संहारक कार्यों का अनुष्ठान करते हैं।
ऐसे ही असंयत और अव्यवस्थित काल को कलियुग और जब विभ्रान्त तथा विपर्यस्त जीवों को इन आसुरी सम्पदा वालों का निधन देख कर वास्तविक चैतन्य लाभ हो जाता है, निर्बल बलवानों के दया पात्र होकर उचित संरक्षता प्राप्त करते हैं और सर्वत्र सब अवस्थाओं में प्रेम, परोपकार, न्याय, संवेदना प्रभृति गुण उत्कर्ष पाते हैं, उस स्वर्ण के समय को ही सतयुग कहते हैं।
अतएव मनुष्य मात्र को उपरोक्त लोकोत्तर गुणों के प्रगटीकरण द्वारा अपने में देश और काल की हित सम्वर्द्धना के नाते पात्रता उत्पन्न करना चाहिये। आसुरी वृत्तियों के शमन और दैवी-वृत्तियों के सेवन का ही दूसरा नाम-सतयुग का आवाह्न कर्म है, मानव इसका हृदयंगम करते हुए साधना पथ में अपने को उत्तरोत्तर अग्रसर होने दें, यही कामना है। शुभमस्तु।
- ऋषिराम शुक्ल।

