सदा कलियुग, सदा सतयुग
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(हर समय हर एक युग उपस्थित रहता है।)
समय विभाग की दृष्टि से युगों के समय अलग-अलग हैं, पर धर्माधर्म की दृष्टि से सदा कलियुग रहता है और सदा सतयुग। प्रति दिन भी युग बदलते हैं। प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त में सतयुग आरम्भ होता है, मध्याह्न काल से त्रेता लगता है, सूर्य अस्त होते ही द्वापर आरम्भ हो जाता है और आधी रात बाद कलियुग की तूती बोलती है। आयु के भी इसी प्रकार चार विभाग हो सकते हैं। छल छिद्रों से रहित, राजा दोषों मुक्त बालपन की अवस्था सतयुग है, कर्म-उत्साह, आनन्द की जवानी को त्रेता कह सकते हैं, खसती उम्र, कुछ ढिलमिल पन, उत्साह की कमी यह द्वापर की सूचक है, चारपाई पर खों खों करते हुए मृत्यु की राह में पड़े रहने का समय कलियुग है। तुरीय अवस्था सतयुग, जागृति त्रेता, स्वप्न द्वापर, और सुषुप्ति को कलियुग कह सकते हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र चारों वर्णों पर क्रमशः चारों युगों को घटा सकते हैं। ज्ञानियों को सतयुगी, कर्मवीरों को त्रेतायुगी व्यवहार बुद्धि वालों को द्वापरी और अज्ञान अन्धकार में पड़े हुए जीवों को कलियुगी कहने में कुछ हर्ज नहीं। इसी प्रकार जीवन के विभिन्न अवसरों पर युग प्रभाव के विभिन्न स्वरूप हम देखते रहते हैं। यह प्रकट करते हैं कि सब युग हर समयों में जीवित रहते हैं और यथा अवसर प्रकट हो जाते हैं।
प्राचीन युगों के इतिहास पर दृष्टिपात करने से हर युग में उसके अतिरिक्त दूसरे युगों के मौजूद रहने के प्रमाण भी बहुतायत से मिलते हैं। सतयुग में हिरण्यकश्यपु जैसे राक्षस मौजूद थे, जिन्होंने पृथ्वी पर बड़ी भारी अनीति फैलादी थी, धरती माता गौ का रूप बनाकर भगवान के पास पहुँची थी और तब अत्यधिक पाप का समन करने के लिए भगवान को अवतार धारण करना पड़ा था। भस्मासुर जैसे असुर सतयुग में थे, जिसके वध के लिए स्वयं शंकर जी को प्रपंच करना पड़ा। पाप थोड़े अंशों में हो सो बात नहीं। देवताओं से असुर किसी प्रकार कमजोर नहीं थे, वरन् कहना चाहिए कि उसकी शक्ति कुछ अधिक ही थी। आये दिन देवासुर संग्राम हुआ करते थे। हमेशा बेचारे देवताओं का पक्ष गिरता हुआ रहता था, वे बार बार भाग कर हिमायत के लिए कभी विष्णु को, कभी ब्रह्मा को, कभी किसी को कभी किसी को लिवा कर लाते, तब कहीं पार पड़ती। ब्रह्माजी से अपनी काम वासना सहन न हुई, तो सगी पुत्री के साथ रमण करने के लिए दौड़े, पुत्री बेचारी शर्म के मारे स्वर्ग को भागी, ब्रह्मा जी भी साथ-साथ ही दौड़े फिरे। इन्द्र ने ऋषि की पत्नी अहिल्या से दुराचार किया और कर्मों का फल पाया, चन्द्रमा की नीयत गुरु पत्नी के साथ बिगड़ गई। वशिष्ठ और विश्वामित्र जैसे ब्रह्मर्षि इतने तपस्वी होते हुए भी एक दूसरे की जान के ग्राहक बने रहे॥ विश्वामित्र ने तो वशिष्ठ के निरपराध छोटे छोटे बालकों का ही गला कतर डाला। कश्यप के आधे बेटे सुर थे आधे असुर। दक्ष राजा में तो इतनी ईर्ष्या थी कि उसने अपने दामाद योगिराज शंकर को उचित यज्ञ भाग देना बन्द कर दिया, शिवजी को पत्नी सती की थोड़ी भी सहनशीलता न हुई, उनके जरा से अपमान के बदले पिता का यज्ञ विध्वंस करने के निमित्त आत्म हत्या ही कर डाली। शिवजी भी किसी से कम थोड़े ही थे, स्वसुर का फौरन ही तो सिर उतरवा लिया। वे अपने पुत्र तक से तो चूके ही नहीं जरा सी भूल हुई कि बालक गणेश के कंठ पर कुल्हाड़ा धर बजाया, बेचारे बच्चे का सिर अलग था, तो धड़ अलग। माता की ममता न मानी तो शिव को भी झुकना पड़ा। गणेश के सिर पर हाथी का सिर चिपकाया। गंगावतरण की कथा जिन्होंने पढ़ी है, वे जानते हैं कि उस समय सतयुग में इतने जोर का अकाल पड़ा था कि मनुष्यों को भोजन तो दूर, पानी की बूँद प्राप्त करना भी कठिन हो गया था। उपस्ति ऋषि को तो चाण्डाल के झूठे उर्द खाकर प्राण बचाने पड़े थे। तब भागीरथ जी तप करके गंगा को लाये थे। अधिक इतिहास इन पंक्तियों में नहीं लिखा जा सकता, पर स्थाली पुलाक न्याय से यह सिद्ध है कि सतयुग में भी कलियुग के दृश्य दिखाई पड़ते थे।
अब त्रेता की बात लीजिए। उसमें सतयुग भी था और कलियुग भी। जनक जैसे कर्मयोगी, हरिश्चन्द्र जैसे सत्यनिष्ठ, दधीचि जैसे त्यागी, शिवि जैसे दानी मौजूद थे, पर साथ ही क्रूर कर्मों और नर पिशाचों की भी कमी न थी। लंका के असुर ऐसे बलवान थे कि उन्होंने देवताओं की सारी सम्पदा छीन कर अपने घर में रख ली थी। मद्यप, माँसाहारी दस्यु घातक, सभी दुर्गुण उनमें थे, राम जब वन गमन में गये हैं, तो उन्होंने हड्डियों के पर्वत जमा देखे हैं। राम ने वहाँ के निवासियों से पूछा है कि यह कैसे पर्वत हैं, तो वनवासियों ने उन्हें बताया है कि - भगवन् राक्षसों ने वनवासी ऋषियों को मार डाला है, यह उन्हीं के अस्थि पिंजर पड़े हुए हैं। ऐसे ऐसे अन्याय उस समय होते थे स्वयं राम की अयोध्या में उनकी द्विमाता कैकेयी और उनकी दासी मंथरा की करतूत सब को विदित है राम जब लंका विजय करके घर आये तो कहते हैं कि एक धोबी ने एक विरोधी आन्दोलन किया कि बेचारी निर्दोष सीता को घर से बाहर निकलना पड़ा। यह त्रेता के दो भले और दो बुरे पहलू हैं भरत का अपने भाई के साथ एक प्रकार का व्यवहार था, तो सुग्रीव और विभीषण का अपने भाइयों के साथ दूसरी प्रकार का। त्रेता में भी हमें दुरंगी दुनिया दिखाई पड़ती है।
द्वापर को लीजिए। राजा मोरध्वज अपने पुत्र को चीर देते है, कर्ण अपने शरीर के टुकड़े दान कराता है, भीष्म जीवन भर ब्रह्मचारी रहते हैं दूसरी और कौरव पक्ष के लोग बड़े बड़े लोमहर्षक कुकर्म करते हैं कंस की अनीति का भला कुछ ठिकाना था, फिर नारद को तो देखिए कैसा सत्य और धर्म से भरा उपदेश देने पहुँचे। ‘बहिन के सब बालकों को मार डाला। अच्छा पथ प्रदर्शन किया, ऋषि जी ने , रक्षा का बड़ा अच्छा मार्ग बताया न? गुरु हो तो ऐसे हों। ब्रह्मा जैसे वयोवृद्ध देवता का बछड़े चुराना, इन्द्र का नाराज होकर सारे ब्रज को जल से डुबाना, उनकी देव बुद्धि का परिचय देता है। कृष्ण की रास लीला, चीर हरण, सोलह हजार एक सौ आठ रानियाँ रखना इन सब लीलाओं का गुप्त रहस्य हर किसी की समझ में नहीं आ सकता। ऐसा था वह द्वापर। आज की भ्रूण हत्याएं करने वाली कुलटाएं अपने कर्मों को कुन्ती का उदाहरण देकर ढकना चाहती हैं। आज के राजनीतिक धर्मराज युधिष्ठिर के ‘नरोवा कुँजरोवा’ वाक्य की पुनरावृत्ति करने में कुछ दोष नहीं मानते।
फिर वर्तमान समय में ठहरा कलियुग, इस युग में तो पाप ही पाप होने चाहिए, धर्म के सारे हाथ, पैर टूट जाने चाहिए, सत्स और प्रेम का कहीं दर्शन भी न होना चाहिए। किन्तु पूर्ण रूप से यह बातें भी फलितार्थ नहीं हो रही है। प्राणी मात्र पर दया का अमृत बरसाने वाले भगवान बुद्ध और संसार को अहिंसा का पाठ पढ़ाने वाले भगवान महावीर इसी कलियुग में हुए हैं। प्रेम का अवतार ईसा इसी युग में प्रकट हुआ। सूर, तुलसी, मीराबाई ने भक्ति की अविरल सरिता इसी युग में बहाई है। कबीर, नानक, समर्थ गुरु रामदास, सन्त ज्ञानेश्वर, नरसी, बन्दा वैरागी को गुजरे अभी ज्यादा दिन नहीं बीते। जिसके होठों का दूध भी नहीं सूखा, वह वीर हकीकत राय धर्म के लिए दीवार में जिन्दा चिन जाता है, और हँसता हुआ माता पिता से कहता है, आप लोग दुखी मत हूजिए, मुझे हर्ष पूर्वक धर्म की वेदी पर बलिदान होने दीजिए, उस अबोध बालक को देखकर, देखने वालो का धैर्य छूट जाता है, पर वह विचलित नहीं होता। पूरन भक्त धर्म के विरुद्ध पथ पर पैर न रख कर एक अंधी सुन्दरी का प्रस्ताव ठुकरा देता है और खुशी शूली का दंड सहता है। महात्मा सुकरात विष का प्याला पीते हैं, देवी जौन चिता में जलती है, ईसा मसीह हँसता हुआ क्रूस पर चढ़ता है। यह घटनाएं सतयुग की नहीं, इसी कलियुग की है। लोकमान्य, तिलक, महात्मा गाँधी, ऋषि टॉलस्टाय, जार्ज वाशिंगटन, डॉ. सनयात, सेन, महात्मा कार्लमार्क्स इसी युग की तत्वदर्शी आत्मा हैं।
हम अपने आस पास ही नजर दौड़ावें तो ऐसे अनेक महानुभावों को पा सकते हैं, जिन्हें सतयुगी कहा जा सके। एक सच्चे आलोचक की दृष्टि से देखा जाय तो बुरे से बुरे जीव में भी पाप की अपेक्षा धर्म अधिक है। चूँकि पाप बुरी और अस्वाभाविक चीज है, इसलिए उसका थोड़ा होना भी अधिक और आश्चर्यजनक प्रतीत होता है। इसलिए हमें इस समय बुराइयाँ अधिक दिखाई देती हैं, किन्तु तत्वतः ऐसी बात नहीं है। सत से जब तम का अंश प्राणी में अधिक हो जायेगा, तो वह पाव भर आटे में तीन पाव नमक की रोटी की तरह स्थिर न रह सकेगा। एक दार्शनिक का कथन है कि “दुनिया में कालापन अधिक है, पर सफेदी से अधिक नहीं। जिस दिन दुनिया में धर्म की अपेक्षा पाप अधिक बढ़ जायेगा, उस दिन वह पृथ्वी मनुष्यों के रहने योग्य न रहेगी।”
मेरा मन्तव्य इतना ही है कि हर युग में दूसरे युग भी वर्तमान रहते हैं और वे किसी मनुष्य की स्वाधीनता में हस्तक्षेप नहीं करते। कलियुग में भी धर्म की उन्नति होने और सत्कर्मों के बढ़ने में कुछ भी प्रतिबंध लगा हुआ नहीं है।

