महाभारत में सतयुग
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ततस्तुमुल संघाते वर्तमान युगक्षये।
द्विजाति पूर्वको लोकः क्रमेण प्रभविष्यति॥
दैवःकालान्तरे ऽन्यास्मिन्युनर्लोकं विवृद्धये।
भविष्यति पुनर्देवमनुकूलं यदृच्छया॥
यदा चन्द्रश्च सूर्यश्च तथा तिष्य बृहस्पती।
एक राशौ समेष्यन्ति प्रपत्सयति तदा कृतम्॥
कल वर्षी च पर्जन्यों नक्षत्राणि शुभानिच।
क्षेमं सुभिक्षमारोग्यं भविष्यति निरामयम्॥
(महाभारत, बन पर्व अध्याय 190 श्लोक 88,89,90,91)
“वर्तमान युग के समाप्त होने के समय बड़ी कठोर घटनाएं घटेंगी। और उत्तम वर्ण वाले मनुष्यों की धीरे-धीरे उन्नति होने लगेगी। कुछ समय पश्चात दैव की इच्छा से लोक की वृद्धि करने वाला समय फिर आ जायेगा। जब तिष्य में चन्द्र, सूर्य और बृहस्पति एक राशि पर समान अंशों में आवेंगे तो सतयुग फिर आरम्भ हो जायेगा। फिर यथा समय वर्षा हुआ करेगी, सब लोग स्वस्थ और प्रसन्न रहेंगे।”
उपरोक्त पंक्तियों में “तिष्य” शब्द आया है। इसके दो अर्थ होते है पौष मास या पुष्य नक्षत्र। पौष का अर्थ स्वीकार करने वालों के मत से कुछ वर्ष पर्व यह आ चुका है और सतयुग आरम्भ हो गया है। पुष्य नक्षत्र मानने वालों के मत से यह योग श्रावण कृष्णा अमावस्या संवत् 2000 में आ रहा है। तब कलियुग समाप्त होकर सतयुग का आरम्भ होगा।

