मधु संचय
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(संकलन कर्त्ता-श्री दाऊ गंगा प्रसाद जी अग्रवाल, आरंग)
1-जिस धर्म से मनुष्यों को हानि पहुँचती हो वह धर्म मनुष्य का बनाया हुआ है ईश्वरकृत नहीं है।
2-ईश्वरीय धर्म वही है, जिससे सारे प्राणियों पर दया हो।
3-बने जितना कम बोलो, पूछे बिना सलाह देने को न दौड़ो। जो बिना पूछे बोलता है, उसे लज्जित होना पड़ता है। किसी का जी दुखे ऐसी बातें मत कहो। सत्य ही प्रधान गुण है इस अपनाओ।
4-बने जितना कम देखो, किसी के दोष देखने में दक्षता प्रकट मत करो, यदि हो सके तो एकान्त में दोष निवारण का उपदेश दो।
5-बने जितना कम सुनो-विषय चर्चा, बैर बढ़ाने वाली पर निन्दा की बातों से तो जरूर ही अलग रहो, जहाँ शान्ति भंग हो वहाँ जाने से पहले भली-भाँति विचार कर लो।
6-आहार-विहार, निद्रा पर नियन्त्रण रखो। ऐसा करने से स्वस्थ रहोगे और ज्ञान द्वारा सुख रूपी परमात्मा की प्राप्ति कर सकोगे।
7-सन्तोष, शान्ति और सादगी का पालन करो।
8-राग-द्वेष और बैर-भाव को त्यागकर अपने बन्धुओं का, देश का हित करो।
9-धन, लक्ष्मी, विद्या, जाति, युवावस्था का मद त्याग करो।
10-संयम विहीन जीवन शुष्क एवं पशु के समान निःसार है।
11-माता-पिता, पुत्र, स्त्री, बान्धव आदि सम्बन्धियों का मिलन धर्मशाला में एकत्र हुए पथिकों के समान है। कोई किसी का नहीं है। कुछ काल के लिए एकत्र हुए हैं, पीछे अपने-अपने भिन्न मार्ग पर सभी लोग चल बसेंगे। रहेंगे कोई नहीं। अतः अहंता, ममता को छोड़कर एक मात्र उस परमात्मा की निरन्तर चिन्ता करनी चाहिये।
12-कुसंग से परचर्चा पर निन्दा में प्राप्ति होती है, 2-विषय शक्ति और भोग कामना बढ़ती है। 3-काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह, इन शत्रुओं की वृद्धि होती है। 4-दंभ, दर्प, अभिमान, असहिष्णुता, अविवेक, असत्य, कायरता, निर्दयता आदि की वृद्धि होती है। 5-राग, द्वेष, इच्छा, वासना, अहंकार को वृद्धि होकर अज्ञान का परदा मजबूत होता है। 6-भाँति-भाँति के दुराचार बढ़ते है। इसलिए कुसंग का त्याग करना ही उचित है।
13-भगवान की पूजा के लिए पुष्प उपयोगी हैं-अहिंसा, इन्द्रिय संयम, प्राणियों पर दया, मन का वश में करना, क्षमा, ध्यान और सत्य इन फूलों से भगवान प्रसन्न होते हैं।
14-जो सदा सन्तुष्ट है, वही यथार्थ धनी है। इन्द्रियाँ ही मनुष्यत्व की शत्रु है। विषयों का अनुराग ही बन्धन है।
15-धन का मोह मनुष्य की बुद्धि को अनिश्चयात्मक बना देता है, इसलिए सदैव सावधानी से मन को ठीक रास्ते पर रक्खें। ध्यान रखो जो कुछ भी धन कमाओ, वह न्याय और धर्म के आधार पर ही होना चाहिए।
16-जिसमें अधिक गुण हों, वही वास्तव में बड़ा है।
17-पिता के कर्ज को चुकाने वाले तो पुत्र आदि भी होते, परन्तु भव बन्धन से छुड़ाने वाला तो अपने सिवा कोई नहीं है।
18-उखड़ो मत, झल्ला न उठो, झुंझलाना छोड़ दो, धीरता से सुनो, अपनी झूठी निन्दा भी चुपचाप सुनो, फिर शान्त चित्त से विचार करो क्यों वह तुम्हारी निन्दा करता है? जरूर कोई कारण मिलेगा। अधिकाँश में तो अपनी कोई कमजोरी ही मिलेगी, उसे दूर करो और निन्दक का उपकार मानो।
धन की आवश्यकता क्यों है।
19-जिसके पास धन होता है, उसी को मित्र मिलते हैं।
20-जिसके पास धन है, उसके सभी भाई-बन्धु हैं।
21-कुल, शील, पांडित्य, रूप, भोग, यश, सुख ये सब धनवान को ही प्राप्त होता है।
22-धन हीन मनुष्य को तो उसके स्त्री पुत्र भी त्याग देते हैं।
23-दरिद्र हैं वे-जो धर्म का अनुष्ठान नहीं कर सकते।
24-स्वर्ग प्राप्ति के लिए सात्विक यज्ञ कार्य पोखरें खुदवाना आदि कर्म हैं, वह भी धन के अभाव में नहीं हो सकता।
25-दान संसार के लिए स्वर्ग की सीढ़ी है, किन्तु निर्धन व्यक्ति के द्वारा उसकी भी सिद्धि होनी असंभव है।
26-व्रत आदि का पालन, धर्मोपदेश आदि का श्रवण, पितृ यज्ञ आदि का अनुष्ठान तथा तीर्थ सेवन, ये शुभ कर्म धन हीन मनुष्य के लिए नहीं हो सकते।
27-रोगों का निवारण, पथ्य का सेवन, औषधि का संग्रह, अपने शरीर की रक्षा तथा शत्रुओं पर विजय आदि कार्य भी धन से ही सिद्ध होते हैं।
28-जिनके पास धन होता है, उनको इच्छानुसार भोग प्राप्त होते हैं, इसलिए न्याय पूर्वक धन कमाओ।

