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Magazine - Year 1951 - Version 2

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प्रकृति माता की देन

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(श्री लक्ष्मीनारायण टण्डन प्रेमी)

प्रकृति-माता अत्यन्त कोमल हृदय हैं, किन्तु साथ ही वह कठोर शासक भी है। बच्चे भूले करते ही हैं और माता का सदा एक प्रयत्न रहता है कि साधारण भूलों का सुधार तथा परिशोध होता जाय। किन्तु यदि बच्चा कोई भयंकर अपराध कर बैठता है, तो माता कठोर होकर उसे कठोर दण्ड भी देती है। यदि वास्तव में देखा जाय तो माता का उद्देश्य बच्चे को तीव्र चेतावनी देने का होता है, जो उसकी कोमल-हृदयता तथा न्याय प्रियता का ही द्योतक होता है।

हम मानव भी नित्य प्रति प्रकृति के नियम का विरोध खान-पान, रहन-सहन आदि में असंयम करके करते हैं, फलस्वरूप अस्वास्थ्य या रोग के चंगुल में फँसते हैं। प्रकृति ने कृपा करके इन रोगों तथा अस्वास्थ्य से छुटकारा दिलाने को हमारे लिए पग-पग पर प्रयत्न किया है। यदि आप पहाड़ पर भी गए होंगे तो वहाँ एक प्रकार का पौधा जिसमें बिछू पत्ती या पलाकी निकलती हैं, देखा होगा। इनके शरीर में लग जाने से एक प्रकार का जहर सा चढ़ जाता है तथा दाने दाने से पड़ जाते हैं। किन्तु इसी बिछू पत्ती के पास ही एक अन्य प्रकार की पत्तियाँ उगी होती हैं और इन पत्तियों का रस लगाते ही बिछू पत्तियों का रस उतर जाता है। इसी प्रकार हमें अपने रोगों के इलाज में असुविधा न हो, इससे प्रकृति ने हमारे चारों ओर नीम, मदार अड़ूसा, पीपल, गिलोय, तुलसी, बरगद आदि पैदा कर दिए हैं। इन अनेक गुण युक्त वनस्पतियों से अनेक प्रकार के रोग दूर हो सकते हैं। निर्धन तथा धनी बिना अधिक टीपटाप तथा असुविधा के इनके द्वारा लाभ उठा सकते हैं। जड़ी-बूटियों द्वारा इलाज भी प्राकृतिक चिकित्सा के ही अंतर्गत है। आस पास के वृक्षों तथा पत्तियों आदि से भगवान ने पहले ही से हमारे लिए प्रबन्ध कर दिया है।

उदाहरण स्वरूप हम दो चार नाम लेंगे। अडूसे का लाभ तो सर्वविदित ही है। बुजुर्ग कहा करते थे-जहाँ बकरी हो और अडूसे के पौधे हों, वहाँ क्षय रोग की दाल नहीं गलती। मलेरिया में तुलसी लाभ करती है, वह भी जानी हुई बात है। यदि दो माशे तुलसी के बीज प्रातः और सायं फाँके और ऊपर से दूध पीले तो नपुँसकता दूर होती है। वैसे ही बेलपत्र बहुमूत्र (मधुमेह या डाइबटीज) में अत्यन्त लाभप्रद है। सात पत्तियों से प्रारम्भ करके 21 तक बढ़ावें। लोड़े सिल द्वारा पीसकर इन्हें जल में पिएं। संग्रहणी में, आँव में भी डायरिया तथा डिसेंट्री) तथा दस्तों के आने पर भी इससे लाभ होता है। यदि तीन-तीन माशे, छः-छः घण्टे के बाद सूखे बेल की गिरी 3 दिन तक खाये तथा ऊपर से ठण्डा पानी पिए तो अवश्य लाभ होगा। हाँ, उस समय भोजन अति सूक्ष्म खाए। दर्द भी हो तो दही का अवश्य प्रयोग करें। बाद में खिचड़ी ही खाये।

दूब प्रत्येक स्थान पर उगती है। यदि रक्त कहीं से गिर रहा हो (चौट में लगने पर नहीं) तो 1 तोला सफेद दूब पीसकर उसका रस पिलाए, यदि अनार का रस भी डाल लें तो अति उत्तम। घण्टा-2 भर बाद पिलाते रहें, जब तक कि खून बन्द न हो जाय। जहाँ से खून आता हो उस स्थान पर कटोरा रखकर जोर से पानी की धार डालें। कटोरा भर जाने पर फिर खाली कर कै वैसा ही करते जायें जब तक खून बन्द न हो। दूब अत्यन्त लाभप्रद चीज है। इन दो चार उदाहरणों से आप समझ गए होंगे कि बिना पैसा खर्चे हम अपना और दूसरों का इलाज कर सकते हैं।

अब हम उदाहरण स्वरूप केवल एक पौधा लेंगे और देखेंगे कि उसके एक नहीं अनेक प्रयोग हो सकते हैं। उदाहरण के लिए अति साधारण चीज मदार लीजिए।

ऋतु परिवर्तन होने पर प्राकृतिक रूप से प्रायः ज्वर आ जाता है, तब मदार की जड़ का एक माशा छिलका आध पाव पानी में उबाले। जब छटाँक भर पानी रह जाय, तो उसे आधा प्रातः और आधा सायं पिला दें, चाहे यों ही चाटें शहद में मिलाकर। लाभ होगा।

जाड़े में खाँसी आने पर गीली खासी, मदाग्नि, अफरा, दमा, पेट दर्द, वायु गोला, बदहजमी तथा भूख न लगने पर मदार का फूल 1 तोला और कालीमिर्च 1 तोला पीसकर गोली बना लें, मटर के बराबर। एक प्रातः एक सायं गोली दें। अवस्था के अनुसार 3 से 4 तक गोली दे सकते हैं। लाभ होगा।

जूड़ी के रोग में मदार की जड़ का छिलका आधा या एक रत्ती, फांके सी कतर कर पानी में खिलावें तो जूड़ी ठीक होगी। जूड़ी आने के 6 घण्टे पहले से खिलाए एक-एक घण्टे बाद एक-एक मात्रा, चार बार खिलाए, उस दिन भोजन न दें। जूड़ी का समय निकलने के बाद दूध, साबूदाना आदि दें।

मदार के पत्ते 1 छटाँक, पाँचों नमक (काला, सेंधा, साँभर, सज्जी खार तथा जवा खार) एक तोला लें। एक हाँड़ी में एक पत्ता बिछाकर उस पर थोड़ा सा नमक डालें। इसी प्रकार करते जाएं। हाँड़ी बन्द करके मिट्टी में लपेट कर 15-20 ऊपर नीचे कंडों में रख कर गर्म करें। खंजर सा रह जायगा वह। इसे पीस लें। इसमें असुविधा पड़े तो पत्ते तो पत्ते वैसे ही जला दें और सब नमक मिलाए और पीस डालें। 3 माशा प्रातः और 3 माशा सायं गर्म जल से पिएं तो तिल्ली अवश्य ठीक हो जायगी। यह दवा की मात्रा जवानों की है। बच्चों को थोड़ी कम मात्रा दें। लीवर बढ़ने में देने पर भी इससे लाभ होगा। मदार के पत्ते तथा लट जीरा बराबर बराबर जला कर मिला कर उसमें सेंधा या काला नमक मिला कर दे तो भी लीवर में लाभ होगा। लीवर के स्थान पर कडुआ तेल नमक मिलाकर मालिश करें। बड़ों की मात्रा तीन तीन माशा प्रातः और सायं। गठिया हो जाने पर 5 तोला मदार के फूल, 2 तोला काली मिर्च तथा दो तोला रेंडी की सफेद गूदी सबको पीस कर जंगली बेर के बराबर गोली बनावें तथा प्रातः सायं गोली गर्म पानी से खिलायें। तेल में पत्ते डालकर जलाएं और गर्म तेल से गठिया के स्थान पर मालिश करें और उसी के पत्ते उस स्थान पर चुपड़ कर बाँध दें। देह में दर्द आदि होने पर भी इस तेल से लाभ होगा। मदार की पत्ती पीस कर लेप करने से भी दर्द शान्त होता है।

श्वाँस रोग में 2 तोला मदार की जड़ का छिलका, 1 तोला मदार का दूध तथा 1 तोला कालीमिर्च सबको पीसकर उर्द के बराबर गोलियाँ बनायें। दिन में तीन बार खिलाए, ऊपर से ठण्डा पानी पिएं इससे लाभ होगा।

मदार के पत्ते का रस निचोड़ कर गर्म करके कान में डालें तो कान के दर्द को लाभ हो। यदि कान बहता हो तो नीम की पत्ती से धोकर यही रस डालें तो लाभ होगा।

यदि सर्दी से सिर दर्द हो तो मदार के फूल के जीरे का गरम पानी में पीस कर गरम करके मस्तक पर लेप किया जाय तो तुरन्त सर दर्द ठीक हो।

कालरे में 1 तोला मदार के फूल 1 तोला पत्थर चट्टा ऊँचा वाला (पुनरनवा) की हरी जड़ 1 तोला लाल मिर्च, तीनों को महीन पीसकर गोली बना ले, उर्द के बराबर। नीबू के रस में पीसना चाहिए। सम्भव न हो तो पानी में ही सही। यदि रोग की प्रथम अवस्था है तो एक-एक घण्टे बाद एक या दो गोली देते रहें, जब तक उसका जोर कम न हो जाय। यदि रोग के पहले इसे खालें, तो हैजा हो ही नहीं सकेगा। रोग की बढ़ी हुई हालत में दो-दो घण्टे बाद दो-दो गोली दें। शरीफे की पत्ती उबाले, वही पानी पिलाया जाय और उसी के साथ गोली खिलायी जाय। पानी ऐसे तैयार करें, आध पाव सौंफ लें, आध सेर खूब साफ करके शरीफे की हरी पत्तियाँ लें। 5 सेर जल में उबाले, जब 4 सेर रह जाय तो साफ कपड़े में छान कोरी हाँड़ी में रख, दो तोला साधारण नमक मिला ले। यह जल खूब पिलाये।

दाद में भी यदि मदार की पत्ती का रस मला जाय तो लाभ होगा। सखी खुजली में भी मदार की पत्ती का रस 1 छटाँक, आध पाव कडुआ तेल, सादा नमक दो तोला मिलाकर आग में चढ़ाओ। जब तेल मात्र रह जाय, तो ठण्डा करके दो दिन बाद शरीर में मलें।

आँखें उठने पर दोनों पैरों के अँगूठे की नसों पर मदार का दूध लगा दें। इस बात का ध्यान रहे कि यह दूध आँख में न लगने पाए।

इस प्रकार हमने मदार के कुछ साधारण उपयोग देखे। मदार सी साधारण तथा हर जगह पाई जाने वाली चीज से भी हम कितना लाभ उठा सकते हैं।

दूर के गाँवों में, जहाँ दवाखाने, अस्पताल या वैद्य डॉक्टर या हकीम नहीं हैं, वहाँ यदि प्रकृति की शरण ली जाय तो बहुत कुछ लाभ हो सकता है। जिनके पास डाक्टरों का बिल चुकाने का पैसा नहीं है, वे प्रकृति माता की शरण ले सकते हैं। जिस प्रकार रोगी या घायल की प्राथमिक चिकित्सा हम डाक्टरों के न आने तक करते हैं, उसी प्रकार यह छुटपुट घरेलू नुस्खे भी साधारण रोगों या साधारण अवसरों पर हम प्रयोग करें तो समय, पैसा, परेशानी और परिश्रम, सबसे हमारी बचत होगी।

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