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Magazine - Year 1951 - Version 2

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अत्यधिक परिश्रम न कीजिए।

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(प्रो. रामचरण महेन्द्र एम. ए.)

अंग्रेजी की एक पुरानी कहावत हैं कि “श्रम, संयम और विश्राम संसार के चिकित्सकों में सर्वश्रेष्ठ हैं” मनुष्य खूब मौज से मन लगाकर परिश्रम करे, जीवन में अपनी इन्द्रियों पर संयम रक्खे, अति न करे और फिर विश्राम करे, तो वह दीर्घ जीवन लाभ कर सकता है।

परिश्रम का महत्व महान् है। भतृहरि का कथन है ‘आलस्यो हि मनुष्याणाँ शरीरस्थो महानृपुः।’ गीता में भगवान् कृष्ण ने सौ वर्ष तक कर्म करने का आदेश दिया है। संयम का स्थान भी महत्वपूर्ण है। संयम से इन्द्रिय निग्रह होता है। असंयम से नाना प्रकार की व्याधियाँ उत्पन्न होती हैं।

स्वस्थ जीवन का तृतीय अंग है-विश्राम। इसी तत्व पर विस्तार से हमें विचार करना है। आजकल के विविध विघ्न-बाधा संकुल जगत् में मनुष्य का जीवन काम से भर गया है। वह दिन-रात काम में जुटा रहता है। मजदूर लोग रुपयों के लोभ में शरीर की कुछ परवाह न कर खूब श्रम करते हैं। मध्वर्ती जनता भी नाना प्रकार के कार्यों में दिन रात जुटी रहती है। पहर रात तक कार्य और व्यापार तेजी से चलते रहते हैं। सिनेमा, दुकानें, रात्रि में चलने वाले प्रेस, बिजलीघर, रेलवे कर्मचारी, ट्यूशन करने वाले बाबू आदि कार्य भार से थके जा रहे हैं, आज कल के जीवन में विश्राम की आवश्यकता अनुभव की जा रही है। स्वास्थ्य विशारदों का मत है कि आज की 20 प्रतिशत बीमारियाँ अत्यधिक परिश्रम, निरन्तर काम में जुटे रहने के कारण होती हैं। लोग थक कर चूर होते हैं, फिर हफ्तों बीमार रहते हैं।

यह थकावट प्रायः दो प्रकार की होती है —

(1) शारीरिक थकावट—शरीर के अत्यधिक उपयोग से माँसपेशियाँ और पुट्ठे थक जाते हैं, शरीर के कल पुर्जा की शक्ति क्षीण हो जाती है। जोड़ों और विशेषतः पिण्डलियों में दर्द होता है। सिर में हल्का सा दर्द होता है। हाथ-पाँव टूटने लगते हैं। यदि शारीरिक थकावट मर्यादा और शक्ति से अधिक हो जाय तो इसका ज्वर हो आता है। हाथ, पाँव, कन्धों और कमर की थकान बहुत विश्राम के पश्चात् ठीक होती है।

(2) मानसिक थकावट—शरीर की भाँति मस्तिष्क की शक्ति भी सीमित है। उससे भी एक विशेष दर्जे तक कार्य ले सकते हैं। अधिक बौद्धिक श्रम करने से हिसाब किताब, जोड़-बाकी, अध्ययन, पठन-पाठन, सोचने-विचारने, कुर्की करने, स्कूली मास्टरी, लेखन कार्य से मस्तिष्क पर जोर पड़ता है। जो व्यक्ति निरन्तर बोलते हैं। वे भी अधिक शक्ति व्यय करते हैं। मानसिक थकावट अन्तर्द्वन्द्व और चिंता का कारण बनती है। जब मनुष्य का मन थक जाता है, तो काम में मन नहीं लगता। सिर भारी रहता है, मन उचाट हो जाता है। कोई काम करने को जी नहीं चाहता। प्रायः देखा गया है जब कोई कार्य भार समझ कर किया जाता है, तो थकावट जल्दी आती है।

अमेरिका में आजकल “अपने जीवन की मोमबत्ती दोनों ओर से न जलाओ” वाला आन्दोलन जोरों से चल रहा है। आन्दोलनकारियों का कहना है कि हमें विश्राम भी चाहिये। हम दत्तचित्त हो काम करने को प्रस्तुत हैं, किन्तु हमें पर्याप्त विश्राम अवश्य मिलना चाहिए। हमारा थका हुआ शरीर विश्राम चाहता है और उसे विश्राम न देना उसके ऊपर महान् अत्याचार करना है।” यह निर्विवाद सिद्ध है कि मनुष्य का जीवन अत्यन्त मूल्यवान और सर्वतोभावेन उपयोगी है। सतत- तप, नियम, एवं सद्वृत्ता चरण के पश्चात मनुष्य यह शरीर प्राप्त कर उसकी सत्ता रखता है। ऐसे दुर्लभ जीवन की बत्ती को दोनों तरफ से फूँक कर नष्ट भ्रष्ट कर देना बुद्धिमानी का कार्य नहीं है। इस सम्बन्ध में डॉक्टर फेरे ने एक बार पार्लियामेंट में भाषण देते समय कहा था।

“मैं विश्राम के लिये रविवार का दिन अत्यन्त आवश्यक समझता हूँ, क्योंकि विश्राम से शारीरिक एवं मानसिक क्षतिपूर्ति होती है। शरीर तो महान् है। यह दुर्लभ मानव जीवन बार-बार नहीं मिलता। उसकी शक्ति यदि एक बार नष्ट कर दी जाय तो फिर कोई भी दवादारु उसका पुनः निर्माण नहीं कर सकती। मैं मानता हूँ कि रात्रि में विश्राम से शक्ति की कुछ क्षतिपूर्ति हो जाती है, किन्तु वह यथेष्ट नहीं होती। मानव शरीर रचना इतनी सूक्ष्म है कि उसे हर सातवें दिन समग्र आवश्यक से आवश्यक कार्यों से हाथ खींचकर पूर्ण विश्राम करना चाहिये। “

पाश्चात्य देशों में लोग छुट्टी-छुट्टी चिल्ला रहे हैं। हमें भी छुट्टियाँ चाहिये। छुट्टियाँ हमारे स्वास्थ्य की वृद्धि और आनन्द को बढ़ाती हैं। छुट्टियों के बाद मनुष्य पुनः ताजा होकर अपने कार्य में नए उत्साह और नए जोश से आकृष्ट होता है। छुट्टियाँ एक प्रकार का जीवन बीमा है, जो मृत्यु, वृद्धावस्था, दुःख, क्लेश और क्षय होती हुई शारीरिक तथा मानसिक शक्तियों के विरुद्ध रक्षा के रूप है। जीवन की एक रसता और इर्द गिर्द की परिस्थितियों का परिवर्तन हो जाता है। वह परिवर्तन स्वास्थ्य, सुख, और दीर्घायु के लिए संजीवनी बूटी के तुल्य है।

प्रिय पाठक! लगातार मानसिक या शारीरिक परिश्रम में न लगे रहो। थके हुए शरीर से काम लेना परम घातक है। खिंचे रहने से धनुष की डोरी जल्दी टूटती है इसी प्रकार मानसिक या शारीरिक कलपुर्जों से शक्ति से अधिक काम लेने से उत्पादक शक्ति का ह्रास होता है। अपनी शक्तियों से सामर्थ्य के अनुसार काम लेने की आदत डालो। लोभवश शरीर की शक्ति का दिवाला न निकालो। अधिक काल तक एक ही विषय पर सोचने, एक ही प्रकार का शारीरिक या मानसिक परिश्रम करते रहने से प्राण शक्ति का ह्रास होगा। काम को बदलने के कारण और लगातार एक ही कार्य में व्यस्त रहने से जीवन शक्ति पंगु हो जाती है। बोरहेव नामक विद्वान अपनी दशा का वर्णन करते हुए स्वयं लिखते हैं—

“क्या करता, मुझे कई दिन तक अविराम गति से घोर मानसिक परिश्रम करना पड़ा। प्रेस वालों का तकाजा था। मैं लिखता रहा, परिणाम यह हुआ कि मेरे शरीर में और मन के सूक्ष्म पुर्जों की एक अजीब तरह की थकान आ गई और आलस्य के कारण एक महीने तक मैं बिस्तर पर मुर्दे की तरह पड़ा रहा।”

यदि आप शक्तियों की रक्षा करना चाहते हैं, तो परिवर्तन का सुनहरा नियम सीख लीजिए। काम करते समय थोड़ी-2 देर के लिए विश्राम अवश्य रखिए। एक कार्य करने के पश्चात् कोई नवीन कार्य प्रारम्भ कीजिए, फिर कोई तीसरा, इसके उपरान्त आप पुनः पहले ही कार्य करने के लिए ताजे हो जायेंगे। उत्तम तो यह है कि शारीरिक के बाद मानसिक और मानसिक के बाद शारीरिक परिश्रम करें।

अनेक व्यक्ति कार्यों की शक्ति बढ़ाने के लिए मादक वस्तुओं का उपयोग करते हैं। ये पदार्थ शक्तिवर्द्धन नहीं करते, बल्कि उत्तेजना उत्पन्न करते है। ये रही सही शक्ति का भी दिवाला निकाल देते हैं। ऐसे उपायों द्वारा शरीर से अधिक काम लेकर उस पर अत्याचार करना प्राणघातक है।

रात्रि में शरीर को पूर्ण विश्राम दो। सोने से थकावट दूर होती है, नवशक्ति प्राप्त होती है, स्फूर्ति का संचार होता है और दूसरे दिन नए जोश से कार्य करने के लिए ताजगी आती है। सोये बिना दिमाग में गर्मी चढ़ जाती है, सर भारी हो जाता है और आँखें भारी हो जाती हैं। दिन भर कार्य करने से जो शक्ति क्षीण हो जाती है, माँस तंतु या कीटाणु टूट फूट जाते हैं नींद से उनका पुनः निर्माण होता है। अतः नियत समय पर लाख काम छोड़ कर सोने जाओ और आठ घन्टे के लिए पूरी छुट्टी कर दो। बिस्तर पर लेट कर चिंता के विचारों में न फंसे रहो।

दिन में भी जब कभी तुम थकान का अनुभव करो, काम छोड़ दो और किसी शान्त जगह पर निकल जावो। आराम से बैठ कर अंग शिथिल कर लो, आँखें मूँद लो और मन में विचार न आने दो। जिस प्रकार थका हुआ नाविक नाव खेते खेते डाँड मारना छोड़ कर कुछ क्षणों के लिए विश्राम करता है, तुम भी सब प्रकार के विचारों को क्षण भर के लिए भूल जाओ। दुनिया को विस्मृत कर दो और इसी प्रकार निश्चेष्ट बैठे रहो।

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