‘गायत्री स्मृति’ की अमूल्य शिक्षाएं
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गायत्री स्मृति में में कुल 15 श्लोक हैं। पर इनमें सन्निहित शिक्षाएं अमूल्य हैं। यह 20 शिक्षाएं इतनी सार गर्भित और महत्वपूर्ण हैं कि इन्हें जीवन नीति बना लिया जाय तो मनुष्य की सभी लौकिक और परलौकिक समस्याएँ सुलझ सकती हैं। साथ ही राष्ट्रों, जातियों, वर्गों और व्यक्तियों के बीच में जो भारी मनोमालिन्य चल रहा है, उसका निवारण होकर संसार में सतयुगी शान्ति की स्थापना हो सकती है।
गायत्री के एक-एक अक्षर पर, गायत्री स्मृति के एक-एक श्लोक का निर्माण हुआ है। पाठक मनोयोग पूर्वक इन शिक्षाओं पर विचार करेंगे, तो इन सिद्धान्तों की उपयोगिता को भली प्रकार जान लेंगे।
गायत्री स्मृति
भूर्भुवः स्वस्त्रयो लोका व्याप्तमोम्ब्रह्म तेषुहि।
स एवं तथ्यतो ज्ञानी यस्तद्वेत्ति विचक्षणः॥1॥
भूर्भुवः और स्वः ये तीन लोक हैं। उन तीनों लोकों में ओम् ब्रह्म व्याप्त है। जो बुद्धिमान उस ब्रह्म को जानता है वह ही वास्तव में ज्ञानी है।
तत्वज्ञास्तु विद्वान्सा ब्राह्मणः स्वतपश्च थै।
अन्धकारमपाकृर्यु लोंकादज्ञानसम्भवम् ॥2॥
तत्वदर्शी विद्वान् ब्राह्मण अपने एकत्रित तप के द्वारा संसार में अज्ञान से उत्पन्न अंधकार को दूर करें।
सत्तावन्तस्तया शूषः क्षत्रियो लोकरक्षकाः।
अव्यायाशक्ति सम्भूतान् ध्वंसयेयुर्हि व्यापदः ॥3॥
सत्तावान् वीर संसार के रक्षक, क्षत्रिय अन्याय और अशक्ति से उत्पन्न होने वाली आपत्तियों को नष्ट करें।
वित्तशक्त्या तु कर्त्तव्या उचिताभाव पूर्तयः।
न तु शक्त्या नया कार्य दपौंद्वत्यर्प्रशनम् ॥4॥
धन की शक्ति द्वारा तो उचित अभावों की पूर्ति करनी चाहिए। उस शक्ति द्वारा घमंड और
तुषाराँणाँ प्रतापेऽपि प्रयत्नो धर्म आत्मनः।
महिमा च प्रतिष्ठा च प्रोक्तोऽपारः श्रमस्यहि॥5॥
तुषारापात में भी प्रयत्न करना आत्मा का धर्म है। श्रम की महिमा और प्रतिष्ठा अपार है ऐसा कहा गया है।
वद नारी बिना कोऽन्यो निर्माता मनुसन्ततेः।
महत्वं रचनाशक्तेःस्वस्याः नार्या हि ज्ञायताम्॥6॥
नारी के बिना मनुष्य को बनाने वाला दूसरा और कौन है अर्थात् मनुष्य की निर्मात्री नारी ही है। नारी को अपनी रचना शक्ति का महत्व समझना चाहिए।
रेवेव निर्मला नारी पूजनीया सता सदा।
यतो हि सैव लोकऽस्मिन साक्षालक्ष्मी माता वुधैः ॥7॥
सज्जन पुरुष को हमेशा नर्मदा नदी के समान निर्मल नारी की पूजा करनी चाहिए क्योंकि विद्वानों ने उसी को इस संसार में साक्षात लक्ष्मी माना है।
न्यस्यन्ते ये नराः पादान पृकृत्ज्ञानानुसारतः।
स्वस्थाः सन्तस्तु से नूनं रोगमुक्ता भवन्ति हि ॥8॥
जो मनुष्य प्रकृति की आज्ञानुसार पैरों को रखते हैं, अर्थात् प्रकृति की आज्ञानुसार चलते हैं वे मनुष्य स्वस्थ होते हुए निश्चय ही रोक को मुक्त हो जाते हैं।
भवोद्विग्नमना नैव हृदुद्वेगं परित्यज।
कृरु सर्वास्ववस्यासु शान्तं सन्तुलितं मनः॥9॥
मानसिक उत्तेजना को छोड़ दो। सभी अवस्थाओं में मन को शान्त और संतुलित रखो।
गोप्याः स्वीया मनोवृत्तीर्नासहिष्णुर्नरो भवेत्।
स्थितिमन्यस्य वै वीक्ष्य तदनुरुपमाचरेत्॥10॥
अपने मनोभावों को नहीं छिपाना चाहिए। मनुष्य को असहिष्णु नहीं होना चाहिए। दूसरे की स्थिति को देखकर उसके अनुसार आचरण करे।
देयानि स्ववशे पुँसा स्वेन्द्रियाण्यखिलानि वै।
असंयतानि खादन्तीन्द्रियाण्येतानि स्वामिनम्॥
मनुष्य को अपनी सम्पूर्ण इन्द्रियाँ अपने वश में रखनी चाहिये। ये असंयत इन्द्रियाँ स्वामी को खा जाती हैं।
वसताँ ना पवित्रः सन् वाह्यतोऽभ्यन्तरस्तथा।
यतः पवित्रतायाँ हि राजतेऽतिप्रसन्नता॥12॥
मनुष्य को बाहर और भीतर सब तरफ से पवित्र होकर रहना चाहिए, क्योंकि पवित्रता में ही प्रसन्नता रहती है।
स्यन्दनं परमार्थस्य परार्थो हि बुधैर्मतः।
योऽन्यान् सुखयते विद्वान् तस्य दुःखं विनश्यति॥
दूसरे का प्रयोजन सिद्ध करना परमार्थ का रथ है, ऐसा बुद्धिमानों ने कहा है। जो विचारवान् दूसरे लोगों को सुख देता है, उसका दुःख नष्ट हो जाता है।
धीरस्तुष्टो भवेन्नैव ह्येकस्याँ हि समुन्नतौ।
कृयतामुन्नतिस्तेन सर्वास्वाशासु जीवने॥14॥
धीर पुरुष को एक ही प्रकार की उन्नति में सन्तुष्ट न रहना चाहिए। मनुष्य को जीवन में सभी दिशाओं में उन्नति करनी चाहिए।
महेश्वरस्य विज्ञाय नियमान्न्याय संयुतान्।
तस्या सत्ताँ च स्वीकुर्वन् कर्मणा तमुपासयेत॥
परमात्माँ के न्यायपूर्ण नियमों को समझकर और उसकी सत्ता को स्वीकार करते हुए कर्म से उस परमात्मा की उपासना करे।
हितं मत्या ज्ञानकेन्द्रं स्वातन्त्र्येण विचारयेत्।
नान्धानुसरणं कुर्यात कदाचित् कोऽपिकस्यचित्॥
हितकारी ज्ञान केन्द्र को समझ कर स्वतंत्रता पूर्वक विचार करे। कभी भी कोई किसी का अंधानुसरण न करे।
धिया मृत्युँ स्मरेर्न्मम जानीयाज्जीवनस्य च।
तदा लक्ष्यं समालक्ष्य पादौ सन्ततमाक्षिपेत् ॥17॥
बुद्धि से मृत्यु को ध्यान रखे और जीवन के मर्म को समझे, तब अपने लक्ष्य की ओर निरंतर अपने पैरों को चलावें। अर्थात् निरंतर अपने लक्ष्य की ओर बढ़े।
यो धर्मो जगदाधारः स्वाचरणो तमानय।
मा विडम्बय तं स ह्येका मार्गे सहायकः ॥18॥
जो धर्म संसार का आधार है, उस धर्म को अपने आचरण में लाओ। उसकी विडम्बना मत करो। वह तुम्हारे मार्ग में एक ही अद्वितीय सहायक है।
योजनं व्यसनेभ्यः सस्यात्तानि पुँसस्तु शत्रवः।
मिलित्वैतानि सर्वाणि समये ध्नन्ति मानवम्॥
व्यसनों से योजन भर दूर रहे, अर्थात् व्यसनों से बचा रहे, क्योंकि वे मनुष्य के शत्रु हैं। ये सब मिलकर समय पर मनुष्य को मार देते हैं।
ना श्रृण्वेकीमिताँ वार्तां “जागृतस्त्वं सदा भव”।
स्वपमाणं नरं नूनं ह्याक्रामन्ति विपक्षिणः ॥20॥
हमारी इस एक बात को सुनो कि ‘तुम हमेशा जागृत रहो’ क्योंकि निश्चय ही सोते हुए मनुष्य पर विपक्षी आक्रमण कर देते हैं।
प्रकृते स्तु भवोदारो नानुदारः कदावचन।
चिन्तयोदार दृष्ट यैव तेन चितं विशुद्ध यति ।21।
स्वभाव से ही उदार होओ कभी भी अनुदार मत बनो उदार दृष्टि से ही विचार करो ऐसा करने से चित शुद्ध हो जाता है।
चोदपत्येव सत्संगे धियमस्य फ लं महत्।
स्वमतो सज्जनै विद्वान् कुर्यात् पया्रवृतं सदा।22॥
सत्संग बुद्धि को प्रेरणा देता है। इस सत्संग का बल महान है इसलिये विद्वान अपने आपको हमेशा सत्पुरुषों से घिरा हुआ रखें अर्थात् सज्जनों का संग करें।
दर्शन ह्मात्मनः कृत्वा जानीयादात्म गौरवम्।
ज्ञात्वाँ तु तत्तदात्मानं पूर्णोंन्नतिपथं नयेत्।23।
आत्मा का दर्शन करके आत्मा के गौरव को पहचानो उसको ज्ञान कर तब आत्मा को पूर्ण उन्नति के मार्ग पर ले चलो।
यायात्स्वोत्तरदायित्वं निवहन् जीवने पिता।
कुपितापि तथा पापः कुपुत्रोऽस्ति यथा यतः।24।
पिता अपने उत्तरदायित्व को निभाता हुआ जीवन में चले क्योंकि कुपिता भी उसी तरह पापी होता है जैसे कुपुत्र होता है।
तथाचरेत्सदान्येभ्यो वाञ्च्छत्यंन्यैर्यथा नरः।
नम्र, शिष्टा, कृतशश्च सत्यसाहाय्यवान् भवन्।
मनुष्य दूसरे के साथ उस प्रकार का आचरण करे जैसा वह स्वयं के साथ चाहता है। और उसे नम्र शिष्अ कृतज्ञ और सच्चाई के साथ सहयोग की भावना वाला होना चाहिए।

