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Magazine - Year 1951 - Version 2

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समय रहते सँभल जाने में ही भलाई है।

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(श्री सत्यानारायण जी मूँदड़ा, शोलापुर)

जिसके पास पैसा है, वे साम्यवाद से बहुत डरते हैं। संसार में ऐसी विचार धारा बड़ी तेजी से बढ़ती चली आ रही है कि पूँजी पर व्यक्ति का अधिकार न रह कर सरकार का स्वामित्व रहे, अमीर लोग ऐसा सोचते हैं कि अगर ऐसा हुआ तो हमारी सभी सम्पत्ति जब्त हो जायगी। जायदाद, बँगले, कारखाने, मोटर, जेवर, नकदी आदि सभी हाथ से चली जायगी और हमें भी साधारण मजदूर की तरह काम करना पड़ेगा। रूस, चीन जैसे विशाल देशों में तथा उनके प्रभाव क्षेत्र के अनेक छोटे-मोटे देशों में साम्यवादी व्यवस्था का मय हो गई है तथा अन्य देशों में उसका जोर बढ़ता जाता है। आश्चर्य नहीं कि वह हमारे देश में भी शक्तिशाली हो जाय और आज के अमीरों को कल गरीब बनने के लिए मजबूर होना पड़े।

साम्यवाद के आविष्कारक कार्लमार्क्स बताये जाते हैं और कहा जाता है कि रूस के ऐजेन्ट तथा बिगड़े दिमाग के नौजवान उसे फैलाते हैं, पर सच बात दूसरी है। अमीर लोग स्वयं ही साम्यवाद के आविष्कारक हैं और वे स्वयं ही उसको बढ़ाते हैं। कोई कम्युनिस्ट नेता जितने लोगों को साम्यवादी जीवन भर के प्रचार में नहीं बना सकता, उतने एक अमीर एक दिन में उत्पन्न कर देता है।

कारण यह है कि धन एक महान् शक्ति है। इसका सदुपयोग वही कर सकते हैं, जिनमें इतनी बड़ी शक्ति को धारण करने की योग्यता है। तुच्छ विचारों और क्षुद्र आदर्शों के मनुष्य के पास जब धन हो जाता है, तो उसका मद और अभिमान उस पर चढ़ जाता है। जैसे शराब के नशे में चूर होकर शराबी अनुचित वाणी बोलता है, अनुचित कार्य करता है, वैसा ही धन के नशे में चूर हुआ मनुष्य भी करता है। साधारण शिष्टाचार, मधुर व्यवहार, विनम्र भाषण, मनुष्यता का सम्मान आदि सामान्य व्यवहार को भी वह भूल जाता है और अपने से निर्धन व्यक्तियों को तुच्छ समझ कर उनके साथ ऐसा अपमान जनक व्यवहार करता है जिससे उनके हृदय को मार्मिक चोट लगती है। निर्धन होने से किसी का स्वाभिमान नष्ट नहीं हो जाता। वह तिरस्कार का कडुआ घूँट पीकर उस अमीर पर रोष करता है। इस रोष को एक दार्शनिक विचारधारा की सहायता मिलती है। साम्यवाद बताता है कि यह अमीर ही संसार भर की बुराइयों की जड़ है। उस क्रुद्ध आदमी की समझ में यह बात तत्काल आ जाती है और वह अमीरों का घोर दुश्मन साम्यवादी बन जाता है। जहाँ कोई नेता नहीं होता, वहाँ भी अनेक कच्चे-पक्के साम्यवादी बन जाते हैं और वे तरह तरह से अमीरों के लाभ में बाधक होते है।

विलासिता की अति, सर्व साधारण की अपेक्षा असंख्य गुने ठाठ-बाट, दूसरे दुखी और अभाव ग्रस्तों की ओर उपेक्षा, निष्ठुर नीति, अशिष्ट व्यवहार, यह सब बातें ऐसी हैं जो गरीबों की ईर्ष्या को कोंच कोंच कर भड़काती है। साधारणतया मनुष्य सन्तोषी होते हैं, अपने प्रयत्न, पुरुषार्थ और भाग्य पर सन्तोष कर लेते हैं। अमीर-गरीब सदा से रहते चले आये हैं कभी गरीब सदा से रहते चले आये हैं, कभी गरीबी अमीरी के कारण कोई विद्वेष पैदा नहीं हुआ। परन्तु आज ईर्ष्या की आग सर्वत्र जल रही है और उसकी लपटें इतनी ऊँची उठ रही हैं कि अमीरों के लिए उससे एक भारी खतरा उत्पन्न हो गया है। उनका आज का यह भाव कि-”कहीं साम्यवाद के द्वारा हमें भी गरीब न बनना पड़े” कल सार्थक हो जाय तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है।

प्राचीन काल में हमारा देश अब की अपेक्षा कहीं अधिक धनी था। उस समय असंख्य धन कुबेर भरे पड़े थे, परन्तु उनकी नीति शोषण की, अशिष्टता की, अहंकार की, फिजूलखर्ची की, स्वार्थपरता की न थी। अपने को धन का ट्रस्टी समझ कर उसे देश जाति और धर्म की उन्नति में खर्च करते रहते थे। अधिक धन होने से अपनी जिम्मेदारी भी अधिक समझते थे और जनसेवा के कार्यों में सबसे आगे रहते थे। मधुमक्खी परिश्रम से शहद संचय करती है और उसे दूसरों के लाभ के लिए देती है, यही नीति उस समय के धनी वर्ग की थी, फलस्वरूप अमीरों के प्रति कहीं कोई असन्तोष न था। उपयोगिता, बुद्धिमत्ता एवं कार्यकुशलता के लिए उनकी सराहना होती थी और सबका प्रेम तथा सहयोग उन्हें प्राप्त होता था।

आज अमीरों ने अपनी नीति बदल दी है। वे गरीबों की हड्डियों पर अपने महल खड़े करना चाहते हैं, अपने स्वार्थों के लिए दूसरों का बुरे से बुरा अहित कर सकते हैं, ऐसी दशा में यदि उनके विरुद्ध घृणा, द्वेष, शत्रुता और ईर्ष्या बढ़ती जाय, तो यह कुछ अस्वाभाविक नहीं है। पूँजीपति समाज के लिए उपयोगी बनकर रहें, तो भूतकाल की भाँति उनका स्वागत होगा। बुद्धिमता, कुशलता के साथ-साथ त्याग और सद्व्यवहार को संमिश्रण करके वे अपने वैभव को सुरक्षित रख सकते हैं और राष्ट्र निर्माण में सहायक बनकर जनता का प्रेम, यश और सहयोग भी प्राप्त कर सकते हैं। इसके विपरीत यदि आज की स्वार्थपूर्ण और मदोन्मत्त गतिविधि को ही अपनाये रहे तो निश्चय ही वे अपने नाश का कारण स्वयं ही बनेंगे। भारत जैसे धार्मिक देश में साम्यवाद के लिए कोई स्थान नहीं है। उसे तो स्वार्थी पूँजीपति ही अपनी दुर्नीति से उत्पन्न करने और बढ़ाने में लगे हुए हैं। काल का चक्र बड़ा प्रबल है। जो समय रहते स्वयं नहीं सँभलता, उसे काल दण्ड के थपेड़े अपने निर्दय प्रहारों से रास्ते पर ले आते हैं। अमीरों की भलाई समय रहते सँभल जाने में ही है।

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