जीवन की रक्षा करें या शरीर त्याग दें?
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(लोक मान्य तिलक)
यह बात निर्विवाद सिद्ध है कि न्याय पूर्वक प्राप्त की हुई किसी की सम्पत्ति को चुरा ले जाने या लूट लेने की स्वतंत्रता दूसरों को मिल जाय, तो द्रव्य का संचय करना बन्द हो जायगा, समाज की रचना बिगड़ जायगी और सभी की हानि होगी। परन्तु इस नियम के भी अपवाद हैं। जब दुर्भिक्ष के समय, मोल लेने, मजदूरी करने या भिक्षा माँगने से भी अनाज नहीं मिलता, तब ऐसी आपत्ति में यदि कोई मनुष्य चोरी करके आत्मरक्षा करे, तो क्या वह पापी समझा जायगा? महाभारत में (शाँ0 141) यह कथा है कि किसी समय बारह वर्ष तक अकाल पड़ा और विश्वामित्र पर बहुत बड़ी आपत्ति आई, तब उन्होंने किसी स्वपच (चान्डाल)के घर से कुत्ते का माँस चुराया और वे इस अभक्ष्य भोजन से अपनी रक्षा करने के लिए प्रवृत्त हुए। उस समय उस स्वपच ने विश्वामित्र को अभक्ष्य भक्षण और वह भी चोरी से न करने के विषय में बहुत उपदेश दिया, परन्तु विश्वामित्र ने उसको डाँटते हुए कहाँ—
पिबन्त्येवोदकं गावो मंडूकेषुरुबास्वपि।
न तेऽधिकारो धर्मेऽस्ति माभूरात्म प्रशंसकः॥
अरे यद्यपि मेढ़क टर्र-टर्र करते हैं तो भी गौएं पानी पीना बन्द नहीं करती, चुप रह! मुझको धर्म-ज्ञान बताने का तेरा अधिकार नहीं है। व्यर्थ अपनी प्रशंसा मत कर। उसी समय विश्वामित्र ने यह भी कहा कि ‘जीवितं मरणात्श्रेयो जीवनधर्मभावाप्नुयात्। अर्थात् यदि जिन्दा रहेंगे, तो धर्म का अचारण कर सकेंगे। इसलिए धर्म की दृष्टि से मरने की अपेक्षा जीवित रहना अधिक श्रेयष्कर है। मनु ने अजीर्गत, वामदेव आदि अन्वान्य ऋषियों के उदाहरण दिए हैं, जिन्होंने ऐसे संकट के समय, इसी प्रकार आचरण किया है। (मनु0 10-105-108) हाब्स नामक अंग्रेज ग्रन्थकार ने लिखा है कि किसी कठिन अकाल के समय जब अनाज मोल न मिले या दान भी न मिले तब यदि पेट भरने के लिए कोई चोरी या साहसिक कर्म करे, तो उसका यह अपराध माफ समझा जाता है और मिल ने तो यहाँ तक लिखा है कि ऐसे समय चोरी करके अपना जीवन बचाना मनुष्य का कर्त्तव्य है।
मरने से जिन्दा रहना श्रेयस्कर है। विश्वामित्र का यह तत्व क्या सर्वदा अपवाद रहित कहा जा सकता है? नहीं। इस जगत में जिन्दा रहना ही कुछ पुरुषार्थ नहीं हैं। कौए भी का कि बलि खाकर कई वर्ष तक जीते रहते हैं। यही सोचकर विदुला ने अपने पुत्र से कहा था कि बिछौने पर पड़े-पड़े सड़ जाने या घर में सौ वर्ष की आयु को व्यर्थ व्यतीत कर देने की अपेक्षा यदि तू एक क्षण भी अपने पराक्रम की ज्योति प्रकट करके मर जायगा, तो अच्छा होगा। “मुहूर्त ज्वलित श्रयो न च घूमायितं चिरम्” (म॰ 3-132-15) यदि यह बात सच है कि आज नहीं तो कल, अन्त में सौ वर्ष के बाद मरना जरूर है, (भागवत 10-1-38 गी0 2-27) तो फिर उसके लिए रोने या डरने से क्या लाभ? अध्यात्म शास्त्र की दृष्टि से आत्मा तो नित्य और अमर है। इसलिए मृत्यु का विचार करते समय सिर्फ इस शरीर का ही विचार करना बाकी रह जाता है।
यह तो सभी जानते हैं कि यह शरीर नाशवान है, परन्तु आत्मा के कल्याण के लिए इस जगत में जो कुछ करना है, उसका एक मात्र साधन यही नाशवान- मनुष्य शरीर है। इसलिए मनु ने कहा है-’आत्मानं सततं रक्षेत् दारै रपि धनैरपि” (मनु0 7-213) अर्थात् स्त्री और सम्पत्ति की अपेक्षा हमको पहले स्वयं अपनी ही रक्षा करनी चाहिए। यद्यपि मनुष्य देह दुर्लभ और नाशवान भी है, तथापि जब उसका नाश करके, उससे भी अधिक किसी शाश्वत वस्तु की प्राप्ति कर लेनी होती है जैसे देश, धर्म और सत्य के लिए, अपनी प्रतिज्ञा, व्रत और विरद की रक्षा के लिए एवं इज्जत, कीर्ति और सर्वभूतहिते के लिए तब ऐसे समय पर अनेक महापुरुषों में तीव्र कर्त्तव्याग्नि में आनन्द से अपने प्राणों की भी आहुति दे दी है। जब राजा दिलीप, अपने गुरु वसिष्ठ की गाय की रक्षा करने के लिए, सिंह को अपने शरीर का बलिदान देने को तैयार हो गया, तब वह सिंह से बोला कि हमारे समान पुरुषों की इस पच्च भौतिक शरीर के विषय में अनास्था रहती है, अतएव तू मेरे इस जड़ शरीर के बदले मेरे यश रूपी शरीर की ओर ध्यान दे। (रघु 2-50) कथा सरित्सागर और नागानन्द नाटक में यह वर्णन है कि सर्पों की रक्षा करने के लिए जी भूत वाहन ने गरुड़ को स्वयं अपना शरीर अर्पण कर दिया। मृच्छकटिकम नाटक (10-20) में चारु दत्त कहता है—
न भीतो मरणादस्मि केवलं दूषितं यशः।
विशुद्धस्य हिमे मृत्युः पुत्र जन्म समः किल॥
मैं मृत्यु से नहीं डरता, मुझे यही दुःख है कि मेरी कीर्ति कलंकित हो गई। यदि कीर्ति शुद्ध रहे और मृत्यु भी आ जाय, तो मैं उसको पुत्र जन्म के समान मानूँगा। और भी इस तरह की अनेक आख्यायिकाएं शास्त्र एवं इतिहास में भरी पड़ी है। इन सब का अर्थ इतना ही है कि यदि जीवन की आवश्यकता है, तो उसके धारण करने के लिए, संकट के समय चौर कर्म हो जाय, तो कोई डर नहीं, परन्तु चौर कर्म न सिर्फ निंदित है बल्कि समाज में अव्यवस्था उत्पन्न करके अशान्ति फैलाने वाला है। इसलिए साधारण स्थिति में कष्ट सहकर भी चोरी न करना ही उचित है। जीवन रक्षा और शरीर त्याग इन दोनों का महत्व कुछ नहीं, किस उद्देश्य के लिए जीवन का रक्षण या त्याग किया गया है, वह उद्देश्य ही प्रधान कसौटी है।

