भाव के भूखे हैं भगवान
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जाग कर नकली बातें हम, छोड़ देते हैं असली बात।
स्वार्थ से सने हुये हैं हम, ठग रहे दुनिया को दिन रात ॥1॥
प्रेम कोरा है शब्दों में, हृदय में द्वेष-दाह है साथ ।
पेट में तेज कतरनी है, और हे बड़ी सुमरनी हाथ ॥2॥
तिलक का असर त्वचा तक है, रंगेगा उससे कभी न चित्त ।
शान्ति सुख पैदा करता है, कभी भी नहीं लूट का वित्त ॥3॥
देह ही ईश्वर का घर है, सभी में वे हैं, यह है ज्ञान ।
मौन युत नामोच्चारण है, उन्हीं के चरणामृत का पान ॥4॥
स्वमन के मल को धो देना, यही तो है बस सच्चा स्नान ।
उन्हें भजना, सबको तजना, यही तो है बस सच्चा ध्यान ॥5॥
खोजते हैं भोगों में सुख, सर्वदा जो हैं सुख के कन्द।
ढूंढ़ते हैं उसको बाहर, भरा है हम में जो आनन्द ॥6॥
वस्त्र में और मनुज-मन में, नहीं है अन्तर का कुछ संग ।
इन्हें जिस रंग में डालोगे, चढ़ेगा इन पर वह ही रंग ॥7॥
आँख हम नहीं खोलते हैं, करें क्या इसका प्राणाधार ।
सदा वे दर्शन देने को, हमारे सम्मुख हैं तैयार ॥8॥
नहीं कुछ भी हो सकता है, ईश से बिना हुए सम्बंध ।
कीमती अच्छे चश्मे को, लगाकर क्या कर लेगा अंध ॥9॥
बगल में छुरी छुपाते हैं और कहते हैं मुख से राम।
नाम वैसा ही रहता है, स्वयं हम होते हैं बदनाम ॥10॥
कुकर्मी ॐ चा पद पाकर, गर्व का भी रखते हैं रोग ।
चाहते हैं ईश्वर को भी, आजकल धोका देना लोग ॥11॥
पहनकर पीताम्बरी बड़ी, करें क्यों लोग दिखाऊ ध्यान ?
बाहरी बातों से क्या है, भाव के भूखे हैं भगवान ॥12॥
*समाप्त*
(श्री प्रतापनारायण जी)
(श्री प्रतापनारायण जी)

