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Magazine - Year 1952 - Version 2

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पाप की मनोवैज्ञानिक परिभाषा

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First 9 11 Last
(प्रो. लालजीराम शुक्ल एम. ए.)

मनोविज्ञान की परिभाषा में पाप वह कृत्य है जिससे मनुष्य का मानसिक साम्य अथवा एकत्व नष्ट हो। पाप से मनुष्य के मन में दो भाग हो जाते हैं और एक भाग दूसरे भाग से लड़ने लगता है। पाप मनुष्य न केवल दूसरों से छिपाता है वरन् अपने आपसे भी छिपाता है। समाज से विरुद्ध किया कार्य अपराध कहलाता है और अपने आपके विरुद्ध किया गया कार्य पाप। धर्म की भाषा में पाप ईश्वर के विरुद्ध होता है और अपराध राज द्वारा दण्डनीय होते हैं और कुछ समाज निन्दा के द्वारा अथवा अपराधी को बहिष्कार के द्वारा दण्डित करता है। मनुष्य के प्रायः सभी अपराध पाप होते हैं पर सभी पाप अपराध नहीं होते हैं। समाज व्यवस्था को जब ईश्वरीय मान लिया जाता है तो उसके प्रतिकूल आचरण करना न केवल अपराध माना जाता है वरन् पाप भी माना जाता है। परन्तु पाप का दायरा अपराध से बड़ा है। अपने बच्चों की शिक्षा की चिन्ता न करना अपराध नहीं है पर पाप है। इसी प्रकार किसी अतिथि का सत्कार न करना अपराध नहीं है पर पाप है।

अब नैतिक चर्चाओं में ईश्वर का स्थान नहीं किया जाता। धर्म से मनुष्य ऊब गये हैं। अतएव पाप की कोई दूसरी ही परिभाषा होना आवश्यक है। मनुष्य का कुछ आचरण ऐसा अवश्य है जो समाज के द्वारा दण्डनीय नहीं है। पर तिसपर भी बुरा माना जाता है। यह बुरा क्यों माना जाता है। इस प्रकार के आचरण को कैसा आचरण कहा जायगा? हम उस सभी आचरणों को अपराध कहेंगे जिससे मनुष्य अपने ही आदर्श स्वत्व के प्रतिकूल आचरण करता है। इस आदर्श स्वत्व का आरोपण ही ईश्वर कहलाता है। धर्म भावना के लोग ईश्वर के भय से डरते हैं, दूसरे लोग अपनी अन्तरात्मा के भाव से डरते हैं। यह अन्तरात्मक मनुष्य का आदर्श स्वत्व है। जब कोई मनुष्य इसके प्रतिकूल आचरण करता है तो उसके मन में फूट उत्पन्न हो जाती है। अपने घृणास्पद कार्यों से स्वयं व्यक्ति दुःखी होता है। पर वह इनके लिए प्रायः निश्चित न करके उन्हें भूल जाने की चेष्टा करता है। इस प्रकार से अपने आपको भुलाने से पाप की प्रवृत्ति और भी प्रबल हो जाती है। फिर यह मनुष्य कुछ ऐसे कार्य कर बैठता है जो समाज की दृष्टि में निन्दनीय माने जाते हैं। और कुछ भूलें भी करता है जिससे उसका अपराध प्रकाशित हो जाय और उसके लिए उसे दण्ड मिले। इस प्रकार पाप का दण्ड बाहरी दण्ड के रूप में मिलता है।

कभी कभी पाप का दण्ड समाज से न मिलकर प्रकृति से मिलता है। मानसिक विच्छेद मानसिक अथवा शारीरिक रोग का रूप धारण कर लेता है। पाप दबाया जा सकता वह किसी न किसी रूप में प्रकट होता है। पाप की मनोवृत्ति के कारण मनुष्य अपने ही निकट सम्बन्धियों से ऐसा व्यवहार करने लगता है जिससे वे उससे घृणा करने लगे। फिर उसे बार बार क्रोध सताने लगता है। क्रोध में आकर वह कुछ का कुछ कर बैठता है और इस प्रकार वह अपने आपका नुकसान कर लेता है।

कितने ही लोग कठोर पाप करते हैं। वे ऐसे होते हैं कि यदि समाज उनका पता चला ले तो वे दण्डित हैं। धनी लोग अपने धन के बल पर चोरी, हत्या और व्यभिचार करके भी राज दण्ड से बच जाते हैं। पर इस प्रकार राजदण्ड से बच जाने पर वे पूरी तरह से नहीं बचते। उन्हें दूसरे प्रकार का दण्ड होता है। किसी भी बुरे काम के करने के बाद मनुष्य का मानसिक साम्य नष्ट हो जाता है। जब तक मनुष्य पाप के लिए प्रायश्चित नहीं कर लेता तब तक उसे अपना खोया मानसिक साम्य फिर से प्राप्त नहीं होता। यह प्रायश्चित जान बूझ कर हो अथवा अनजाने हो, मनुष्य की इच्छा के अनुसार हो अथवा उसकी इच्छा के विरुद्ध, उसका होना नितान्त आवश्यक है। बिना प्रायश्चित के मनुष्य के, मानसिक विकास की प्रगति रुक जाती है। मनुष्य का सच्चा स्वत्व व्यापक है। वह तब तक अपने आप में चैन नहीं पाता जब तक वह निश्चय नहीं कर लेता कि वह संसार के भले लोगों की दृष्टि में भला है। उसे दूसरे लोग भले ही न पहिचाने पर वह अपने आपको तो पहचानता है? अतएव किसी प्रकार की बुराई को अपने आपमें देखकर मनुष्य उद्विग्न मन हो जाता है। वह उस बुराई को दूर करने की चेष्टा करता है। जब वह ऐसा करने में समर्थ नहीं होता तो वह उसे भुलाने की चेष्टा करता है। पर बुराई को अन्तरात्मा स्थान कैसे दे सकती है। इसी के कारण मनुष्य को अनेक प्रकार के मानसिक और शारीरिक रोग उत्पन्न होते हैं और वह अनायास ही घोर विपत्तियों में पड़ जाता है। मनुष्य इस प्रकार रोग ग्रस्त होता अथवा विपत्तियों में पड़ता है। उसकी आत्मा की परिष्कृत होने की चेष्टा को दर्शाता है।

मानसिक रोगों की अवस्था में देखा गया है कि मनुष्य के मन में कुछ ऐसी बातें रहती हैं जो वह दूसरों के सामने प्रकट करने से भय करता है। जब वह इन बातों को मनो विश्लेषक के प्रति प्रगट कर देता है और मनो विश्लेषक उसके प्रति प्रेम का भाव बनाये रखता तो रोगी को अपनी नैतिकता के विषय में आत्म विश्वास उत्पन्न हो जाता है। अपने आपका सुधार मनुष्य तभी कर सकता है जब वह अपने आपको जाने अर्थात् जब वह अपनी भूलों को तथा भूल करने वाली प्रवृत्तियों को भली प्रकार से पहचान ले। मनोविश्लेषण से इन भूलों का, जो विस्मृत हो चुकी है, और अपनी दबी प्रवृत्तियों का ज्ञान होता है। जब ये प्रवृत्तियाँ मनुष्य की चेतना पर आ जाती है तो मनुष्य अपने आपको नैतिक दृष्टि से गिरता हुआ पाता है। पर साथ ही साथ ये प्रवृत्तियाँ निर्बल भी हो जाती हैं। अब उनकी शक्ति का उदात्तीकरण करना सरल हो जाता है। इस उदात्तीकरण के प्रयत्न से पुरानी भूलों का वास्तविक प्रायश्चित होता है।

किसी भूल का सच्चा प्रायश्चित पुराने पाप के लिए रोना, आत्मभर्त्सना करना अथवा अनेक प्रकार पश्चाताप करना नहीं है। पुरानी भूल का सच्चा प्रायश्चित नये भले काम को करना है। यदि भूल समझ में आ गई तो भूल का मार्ग छोड़कर सही मार्ग पर चलने लगना यही उसका प्रायश्चित है।

—संसार

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