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Magazine - Year 1952 - Version 2

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आर्थिक संकट और शिष्टाचार की रक्षा

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(श्री शिवशंकर मिश्र एम. ए. साहित्य रत्न, शास्त्री)

युद्ध जन्य आर्थिक संकट का सबसे घातक प्रभाव मध्यम वर्ग पर पड़ा। युद्ध और युद्धोत्तर काल में श्रम जीवियों का वेतन पर्याप्त मात्रा में बढ़ गया। कृषक ने अन्न की महंगाई का लाभ उठाया। इस दुर्भाग्य ग्रस्त मध्यम वर्ग की आय में वृद्धि नगण्य रही, उसकी साधारण आय में कुछ महंगाई भत्ता जोड़ दिया गया। फलतः युद्ध-जन्य आर्थिक कठिनाइयों के वडंम्बर को सबसे भीषण रूप में मध्यम वर्ग ने अपनी ही छाती पर झेला।

यह आर्थिक संकट मकान और भोजन की कठिनाई के रूप में सबसे स्पष्ट रूप में प्रकट हुआ। भोजन वितरण की व्यवस्था ‘राशन’ द्वारा की गई और मकान के लिए समय समय पर भिन्न भिन्न नियम बनाये गये। अपने दैनिक जीवन का अधिकाँश समय अपने अपने कार्यालयों में बिताने वाला मध्यम वर्ग दोनों ही व्यवस्थाओं का पूरा पूरा लाभ उठाने में असफल रहा और फलतः उसे आधे पेट भोजन और टूटे फूटे सड़े गले मकानों से ही सन्तोष करना पड़ा। कुछ काल तक उसकी आत्मा ने विद्रोह किया, कुछ दिनों तक उसे ग्लानि रही, कुछ दिनों वह अपना निवराता पर खीज और आज वह निराशा और पराजित होकर काल-चक्र द्वारा समय परिवर्तन की प्रतीक्षा कर रहा है।

इस आर्थिक संकट के व्यापक प्रभाव के अंतर्गत सबसे दुखद मध्यम वर्ग का नैतिक पतन रहा। आज वह पहले की अपेक्षा कहीं अधिक असहिष्णु और अनुदार हो गया है। अब वह दिन, जब कोई स्वजन, परिजन अथवा अतिथि उसके यहाँ पधारता है उसके लिए शुभ नहीं। अब वह भोजन पर बैठते समय भूल कर भी यह नहीं सोचता कि कितना अच्छा होता यदि कोई अतिथि भी उपस्थित होता। सड़क पर निकट से निकट सम्बन्धी से भेंट होने पर वह यही मानता है कि अच्छा हो यदि वह साथ घर न जावे और उसे उसकी दरिद्रता का परिचय न हो पाये। घर के द्वार पर किसी अथिति का ताँगा रुकते ही गृह पति के मस्तिष्क में न जाने कितनी समस्यायें चक्कर काटने लगती हैं-उसे क्या खिलाया जावेगा। अस्थायी राशन कार्ड बनवा सकता तो अच्छा होता, अतिथि बैठेगा कहाँ कमरे के अतिरिक्त उसके पास एक छोटा-सा बरामदा ही तो है जिस पर उसकी साइकिल अधिकार जमाये रहती है और लो अतिथि महोदय तो बिस्तर भी नहीं लाये, जाड़े का मौसम है कैसे प्रबंध होगा-इत्यादि। लोकाचार और संस्कार की कठिन जंजीर न होती तो संभवतः उसका विद्रोही हृदय आत्मग्लानि से भर कर कह उठता कि दया कीजिए, किसी धर्मशाला या सराय में आश्रय लीजिए, वहाँ भटियारिन कुछ पैसों में ही आपको संपूर्ण सुविधायें प्रदान कर सकेगी। चलिए आपको मंजिल तक मैं पहुँचाये देता हूँ। बैठिये इसी ताँगे पर। अरे मियाँ करीम वहीं ले चलो कलकत्ते वालों की धर्मशाला में। रास्ते में नूर बेगम की सराय में वहाँ एक मिनट ठहर जाना। यह सब कह डालना और संभवतः कुछ इससे भी अधिक। पर यह सब नहीं कहता है, उसके मुँह से यह निकल भी नहीं सकता। उसका जन्म उस भारतीय परिवार में हुआ है जहाँ चिर-काल से अतिथि भगवान माना जाता है, जहाँ ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का सिद्धान्त मंत्र बन कर गूँजा है, जहाँ का कण-कण आत्म-त्याग, उत्सर्ग और शिष्टाचार का पाठ पढ़ता रहा है। यह सब संस्कार जो कभी उसके जीवन पथ पर कुसुम बन कर शाँति और सौरभ का प्रसार करते थे, आज उसके लिए भार स्वरूप हो रहे हैं। वह उन्हें छोड़ने के लिये व्यग्र है। किसी समय वह उन्हें नहीं छोड़ना चाहता था और वे स्वयं उसके पीछे हाथ धोकर पड़े हुए हैं। कैसी विचित्र है इन सूक्ष्म वृत्तियों की लीला।

कुछ भी हो किसी प्रकार शिष्टाचार की रक्षा तो होना ही है और उसकी रक्षा यदि समाज की सर्वश्रेष्ठ देन मध्यमवर्ग नहीं करेगा तो क्या अनपढ़, श्रम जीवी या विलासी पूंजीपति द्वारा हो सकेगी। विश्व और मानवता को सर्वश्रेष्ठ उपहार मध्यमवर्ग द्वारा ही प्राप्त हुये हैं और यह शिष्टाचार की देन भी उसे इसी वर्ग द्वारा मिलेगी।

मध्यम वर्ग के अंतर्गत अतिथि भी हैं और स्वागत करने वाले गृह पति भी। यदि दोनों समय और स्थिति के अनुकूल अपने में परिवर्तन कर लें, कुछ अधिक व्यवहार-कुशल बन सकें तो संभव है कि शिष्टाचार इस आर्थिक-संकट के आक्रमण को साहस पूर्वक झेल सके। इस प्रयास में निम्नलिखित परामर्श क्रमशः अतिथियों और ग्रह पतियों के लिये सहायक हो सकेंगे।

(1)अतिथियों को चाहिये कि अपने साथ भोजन की कुछ न कुछ सामग्री अवश्य रखें। दो एक दिन से अधिक रुकना हो तो किसी भोजनालय में अपना प्रबंध कर ले। गृह पति अधिक आग्रह करे तो अस्थायी राशन कार्ड की व्यवस्था कर ले। (2) मौसम के अनुकूल साथ में बिस्तर और कपड़े अवश्य रखें चाहे एक या दो दिन ही रहना हो। (3) जाने के पूर्व अपने आने की सूचना अवश्य दे दें। साथ में कौन कौन आयेगा, कितने दिन ठहरना है, इसकी सूचना भी आवश्यक है। पत्र में यह भी लिख दें कि यदि स्थानाभाव के कारण आपको कोई कठिनाई हो तो मेरा प्रबन्ध किसी होटल या धर्मशाला में करवा दीजिये। (4) गृह पति से विनय पूर्वक यह कह दे कि भोजन तथा अन्य व्यवस्था में किसी प्रकार अनावश्यक व्यय या बाह्य दिखाने की आवश्यकता नहीं, ऐसा होते देख उसे मानसिक कष्ट होगा। (5) इस सबके अतिरिक्त कम से कम यात्रा करने का नियम तो है ही। अधिक यात्रा का तात्पर्य आप और आपके साथियों को कठिनाई में डालना है।

गृह पतियों को भी स्मरण रखना चाहिए कि (1)अपनी विवशताओं का ज्ञान अत्यन्त विनयपूर्वक अपने अतिथियों को करा दें और उसके लिए क्षमा माँग लें (2) भोजन और स्थान के अभाव को मधुर वचन और सद् व्यवहार से पूरा करने का प्रयत्न करें (3) ऐसा कुछ भी न करें जिसके कारण उसे और उसके अतिथि को किसी भी समय ग्लानि हो। ऐसे अवसरों पर थोड़ी बहुत असुविधा भी हो तो उसे उदारता पूर्वक अंगीकार करें। वह यह स्मरण रखें कि आज वह गृहपति है, शायद कल उसे भी अतिथि बनना पड़े। आज तो वह कुछ दूसरे को देगा कल वही दूसरे से पाने की आशा कर सकता है। यदि प्रतिकार की इच्छा न करे तो भी आतिथ्य द्वारा आत्म-संतोष तो वह पा ही चुका है।

वस्तु-स्थिति को बदलने वाले तो युग प्रवर्तक नेता और अग्रइत होते हैं, और उस पद को पाने की तो सब में क्षमता भी नहीं। मध्यम वर्ग का साधारण प्राणी तो केवल अपने आपको स्थिति के अनुकूल बनाने का अधिकारी है। जिसमें पात्र बदल देने की शक्ति न हो उन्हें जल-वत तरल होने की क्षमता चाहिये।

आज घर घर में शिष्टाचार की रक्षा का प्रश्न दैनिक जीवन का सबसे दुखद भाग बन गया है। पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों के लिये यह अधिक विषम रूप में उपस्थित होता है। उनमें दिखावा अधिक और सहिष्णुता बहुत कम रहती है। उनकी संकुचित बुद्धि तथा असहिष्णुता के कारण बेचारा मध्यम वर्ग का प्राणी कहीं और भी अधिक संकट में पड़ जाता है। एक ओर तो अतिथि की मर्यादा निभाना और दूसरी ओर श्रीमती जी की चढ़ी त्यौरियों की बौछार को झेलना। इन दोनों के बीच में खड़ा हुआ पुरुष करुणा का पात्र है।

भगवान अतिथि को विवेक और गृहपति को क्षमता दे, जिससे शिष्टाचार की नाव आर्थिक-संकट के तूफान में लय न हो जाये।

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