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Magazine - Year 1952 - Version 2

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क्या परिवार की अनियन्त्रित वृद्धि होती रहे?

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(प्रो. रामचरण महेन्द्र, एम. ए.)

भारत की आर्थिक स्थिति का सुधार तब तक नहीं आरम्भ होगा, जब तक बच्चे पैदा करना कम न होगा। मेरा यह निश्चित विचार है और मैं इसे सही तौर से ठीक मानता हूँ। यह एक स्पष्ट और सच्ची बात है। भारत की आर्थिक समस्या जटिल होने का मुख्य कारण यहाँ की बढ़ती हुई आबादी है। आप इसे कुछ और समझ सकते हैं, पर मेरे विचार से जब तक आप जन्म निरोध नहीं करेंगे, यहाँ की गरीबी कभी भी दूर नहीं होगी। मैं ऐसा इसलिये कह रहा हूँ कि भारत की आबादी भयानक रूप से बढ़ती चली जा रही है, आप मेरे कथन पर विश्वास कीजिये। आज भारत की जो स्थिति है, वही सौ वर्ष पूर्व यूरोप की भी थी, किंतु विज्ञान और शिक्षा बल पर वहाँ की स्थिति एक दम बदल गयी है। भारत में भी वैसा ही किया जा रहा है। यहाँ शिक्षा का प्रसार करना होगा और डॉक्टरों को प्रोत्साहित करना होगा कि वे देहात में जाकर लोगों को जन्म निरोध का महत्व और तरीके समझायें। अगर आप यह कर लेंगे, तो तीस वर्षों में ही भारत में एक बहुत बड़ा परिवर्तन हो जायगा।

उपर्युक्त कथन में बरट्रैंड रसल ने हमारे समाज के एक मर्मस्थल, पर उँगली रख दी है। निःसंदेह खाद्य-स्थिति सुधारने के लिये हमें अपनी जनसंख्या को रोक देना होगा या कम से कम वृद्धि करनी होगी। कल्पना कीजिए, जिस भारत में कम आयु में विवाह किए जाते हैं, उनसे उत्पन्न लाखों नये प्राणी जो प्रतिवर्ष बढ़ रहे हैं, उनके लिए अन्न, वस्त्र, काम और मकान इत्यादि कहाँ से आयेंगे? बरट्रेंड रसल के कथनानुसार जन्म-नियन्त्रण के बिना केवल बाहर से अनाज मँगा मँगा कर खाद्य समस्या पर काबू पाना सम्भव नहीं है। मद्रास धारा सभा में श्री. ति. विश्वनाथ ने परिवार वृद्धि रोकने के लिए एक बिल पेश करने का नोटिस दिया है। इसके अतिरिक्त “नया समाज” मासिक-पत्र ने इस समस्या पर अनेक विद्वानों के एवं लेख प्रकाशित कर जनता का ध्यान इस रोग की ओर आकृष्ट किया है। सर्व श्री. सन्तराम बी. ए. भँवरमल सिंधी इत्यादि ने अपने लेखों द्वारा सन्तानोत्पत्ति पर नियंत्रण रखने पर जोर दिया है। जनता में इस सम्बन्ध में जागृति उत्पन्न करने की विशेष रूप से आवश्यकता है।

संतति-निरोध से व्यक्तियों, कुटुम्बों, समाज और जाति की सभी समस्याएँ हल हो सकती हैं। हमारे परिवारों में जो आर्थिक दैन्य दिखाई देता है, उसका प्रधान कारण यह है कि कमाने वाला एक है, तो खाने वाले आठ या दस हैं। औसत परिवार में बच्चों की संख्या 6-7 है। कहीं कहीं तक तो दस बारह तक होते हैं। भारत में अल्प आयु में विवाह की तौक गले में डाल दी जाती है। अतः अनियंत्रित संतानोत्पत्ति के कारण कुटुम्ब की औसत आय न्यूनातिन्यून होती जा रही है। बेचारा पिता क्षणिक भोग के लालच में फँसकर अपनी वासना को नहीं दबा पाता। फलतः प्रति दूसरे वर्ष एक नवीन व्यक्ति का कुटुम्ब में पदार्पण होता जाता है। वह खाने पहनने की कमी अनुभव करता है। अपना पेट काटकर अपने बच्चों को खिलाता है। स्वयं अपने आप नंगा भूखा रह कर बच्चों को पहनाता है। पिता की आय भी कम होती जाती है। सबसे अधिक दूषित प्रभाव तो माता पर पड़ता है। संतति धारण, प्रजनन तथा पालन-पोषण की जिम्मेदारी माता पर अपेक्षाकृत अधिक है। पुरुष को आर्थिक कठिनाइयों का ही अनुभव होता है, किंतु माता को अपने रक्त और दूध के अतिरिक्त सेवा-ममता और पालन-पोषण रात रात भर जगना, बीमारी में देख रेख हजारों छोटी-बड़ी जिम्मेदारियों को सहन करना होता है। उसका स्वास्थ्य शीघ्रता से गिरने लगता है। अधिक संतान उत्पन्न करने वाली नारियाँ उत्फुल्ल यौवन में ही वृद्धावस्था के समीप आ जाती हैं। पुरुष प्रायः स्त्रियों की इच्छा-अनिच्छा, समय-असमय का भी विचार नहीं करते हैं और बलात्कार से विषय-क्षुधा शान्त करने के लिए उन्हें मजबूर करते हैं। फलतः स्त्रियों को अनिच्छापूर्वक मातृत्व प्राप्त होता है। इस प्रकार उत्पन्न बच्चों का मानसिक संस्थापन आरम्भ से ही दुर्बल हो जाता है। वे कमजोर, पागल, अन्धे, लँगड़े-लूले, बदसूरत, बुद्धिहीन होते हैं इससे समाज जाति या राष्ट्र का कोई हित नहीं हो सकता। आजीविका के साधन तो जल्दी जल्दी वृद्धि को प्राप्त नहीं होते, अनावश्यक बच्चों, विशेषतः पुत्रियों की संख्या के साथ दारिद्रय भी बढ़ता जाता है। दारिद्रय के साथ साथ स्त्री-पुरुषों की काम करने और रोजी कमाने की शक्ति भी क्षीण होती है। शक्ति हीनता का प्रभाव सम्पूर्ण परिवार पर है। स्वयं माता-पिता चिड़चिड़े, क्रोधी, निर्बल और निराश हो जाते हैं, पोषक भोजन प्राप्त न होने के कारण चिंता रहने लगती है। चिंता में न बच्चों का ही लालन पालन समुचित रीति से हो सकता है, न शारीरिक मानसिक, आध्यात्मिक उन्नति ही सम्भव है। ऐसे समाज की गति शराब, तम्बाकू तथा नशे की ओर जाती है। व्यभिचार जनित गुप्त रोगों से समाज में व्यक्ति अल्पायु होता जाता है।

सन्तति-निग्रह के साधन होते ही समाज उन्नति करेगा। जो थोड़े से बच्चों के पालन का उत्तरदायित्व एक परिवार पर पड़ेगा वह सरलता से वहन किया जा सकेगा न आवश्यकता से अधिक बच्चों की वृद्धि होगी, न परिवारों और समाज का दारिद्र बढ़ेगा। खाद्य समस्या हल हो जायगी। न स्त्रियाँ निर्बल, कमजोर, निराशावादी चिन्तित रहेंगी, न मनुष्य शराबी और व्यभिचारी होगा, न उसे तथा स्त्री को गुप्त रोग होंगे, न रोगी, विकलाँग, बुद्धिहीन बच्चे ही उत्पन्न होंगे न गृह-सौख्य नष्ट होगा। हमारे समाज में जो निर्धनता और आर्थिक कठिनाई फैल रही है वह सरलता से हल हो जायगी। ये सब लाभ तो हैं ही, इसके अतिरिक्त स्वास्थ्य-धर्म, अध्यात्म-राष्ट्रीयता के दृष्टिकोण से भी अनेक लाभ हैं।

श्रीयुत बैजनाथ महोदय के शब्दों में इससे (1)माता-पिता की शक्ति और तेजस्विता बनी रहेगी (2) पुरुष इसी शक्ति को अन्य क्षेत्रों (कला साहित्य चित्रकारी, काव्य, देश सेवा, अध्ययन) में परिवर्तित कर अपने देश को अनेक फायदे पहुँचा सकेंगे। (3) यदि संयम धार्मिक होगा तो उसके द्वारा मनुष्य की असाधारण आध्यात्मिक उन्नति हो सकती है, जो सच्चे सुख और शान्ति का सीधा मार्ग है (4) जिस देश में स्त्री और पुरुष संचारी होंगे, आत्मविजयी होंगे, उसके लिए सुख और सम्पत्ति साधारण सी बात है, (5) इस मनोविजय के पुरुषों को जो शिक्षा प्राप्त होती है, वह अमूल्य है। (6) आस-पास का वातावरण स्वतन्त्र हो जायगा तथा बच्चों पर उच्च संस्कारों का प्रभाव पड़ेगा। (7) समाज में सन्तोष और भक्ति की वृद्धि हो जायगी क्योंकि ऐसा समय केवल भक्ति की सहायता से ही सुरक्षित रह सकता है।

संक्षेप में संतति निग्रह से माता और बच्चों का स्वास्थ्य सुधर जायगा, औसत आय, स्वास्थ्य, सौंदर्य की वृद्धि होगी। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से उत्तरदायित्व कम रहने से माता-पिता मानसिक स्वतन्त्रता का अनुभव करेंगे। स्वास्थ्य की रक्षा वीर्य की रक्षा के साथ स्वयं ही आ जायगी। आर्थिक दृष्टि से भुखमरी की समस्या हल हो जायगी। कम संतानों को कपड़ा और भोजन आसानी से दिया जा सकता है। भारत की जनसंख्या में कमी हो जायगी, नस्ल में सुधार होगा। बच्चे उतने ही होंगे जितना पालन पोषण श्रेष्ठ से श्रेष्ठ हो सकता है। जब माता थोड़े से हृष्ट-पुष्ट बच्चों को जन्म देंगी, तो मृत्यु संख्या भी कम हो जायगी। न कमजोर बच्चे उत्पन्न होंगे न मृत्यु होगी। अतः आज देश में संतान निग्रह की नितान्त आवश्यकता है।

संतति निग्रह का सर्वोत्तम उपाय संयम है, ब्रह्मचर्य रहने से ही स्त्री पुरुष दोनों का स्वास्थ्य और बल बना रहता है, एक दूसरे में आकर्षण रहता है और प्रेम की डोर टूटने नहीं पाती, गृहस्थियों को ब्रह्मचारी रहना चाहिए। महात्मा गाँधी ने यह उपाय सर्वश्रेष्ठ बताया है। गाँधी जी कहते है :—

“संभोग का एकमात्र उद्देश्य प्रजनन है। यह मेरे लिए एक प्रकार से नयी खोज है। इस नियम को मैं जानता तो पहिले ही था, लेकिन जितना चाहिए उतना महत्व इसे मैंने पहिले नहीं दिया था। अभी तक मैं इसे खाली पवित्र इच्छा मात्र समझता था लेकिन अब तो मैं इसे विवाहित जीवन का ऐसा मौलिक विधान मानता हूँ कि यदि इसके महत्व को पूरी तरह मान लिया जाय तो इसका पालन कठिन नहीं। मैं यह मानता हूँ कि कृत्रिम संतति निग्रह के साधनों का प्रतिपादन करने वालों में जो सबसे बुद्धिमान हैं, वे उन्हें उन स्त्रियों तक ही सीमित रखना चाहते हैं, जो सन्तानोत्पत्ति से बचते हुए अपनी ओर अपने पतियों की विषय वासना तृप्त करना चाहतीं हैं। लेकिन मेरे ख्याल में मानव प्राणियों में यह इच्छा स्वाभाविक है, और उसे तृप्त करना मानव कुटुम्ब की आध्यात्मिक प्रगति के लिए घातक है।”

गाँधी जी की उक्त विचारधारा में गहरा सत्य है। प्रत्येक व्यक्ति को विषय भोग की निःसारता समझनी चाहिए और अनावश्यक वीर्य नाश से सावधान रहना चाहिए। काम वासना जीवन दायिनी शक्ति है। इस शक्ति का उपयोग अन्य कार्यों में हो सकता है। हमें चाहिए कि ललित कलाओं की साधना में, देशोद्धार, समाज सेवा के पवित्र कार्यों में लग कर काम वासना की शक्ति का सदुपयोग करें।

जो व्यक्ति समय और ब्रह्मचर्य के पवित्र साधनों को प्रयोग करेंगे, वे निश्चय ही बड़े भाग्यवान हैं और मानव से बहुत उच्च स्तर पर हैं। जो यह पथ अपनाते हैं, वे अपना जीवन दीर्घकाल तक स्थिर रख सकते हैं। उनका तेज, बल, बुद्धि, वीर्य निरन्तर अभिवृद्धि को प्राप्त होता है। आत्म संयम ही विवाह का सच्चा सुख प्राप्त करता है।

जो लोग यह कार्य नहीं कर सकते उन्हें कृत्रिम उपाय काम में लाने चाहिये। ये तीन श्रेणियों में विभाजित हो सकते हैं-(1)याँत्रिक साधन (2) रासायनिक उपाय (3) शल्य क्रिया। याँत्रिक साधन कई प्रकार के हैं, जिनका प्रयोग स्त्री-पुरुष दोनों ही कर सकते हैं। इस श्रेणी में रबर की बनी हुई कोमल शीथ इत्यादि आती हैं। जिनका प्रयोग पुरुष करते हैं। स्त्रियों के लिए चैक पेसरी या फीमेल शीथ है। इनके प्रयोग में सावधानी करनी चाहिए। —

—चाहे जितना गुस्से का कारण मिलने पर भी जो मनुष्य गुस्से के आधीन न होकर-नुकसान नहीं करता-वही जीतता है। उसी ने नियम का पालन किया कहा जायगा।

—जो मदद बदला चाहे वह भाड़े की मदद है। भाड़े की मदद भाई-चारे का चिन्ह नहीं कहाती। मिलावट की सीमेंट जैसे पत्थर नहीं जोड़ सकती उसी तरह ‘किराये की मदद से भाई-बन्दी नहीं होती।

—एक पशु दूसरे को केवल अपने शारीरिक बल से ही वश में कर लेता है। उसकी जाति का यही कायदा है। मनुष्य जाति का स्वाभाविक कायदा प्रेम-बल से-आत्मिक बल से-दूसरों को जीतने का है।

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