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Magazine - Year 1952 - Version 2

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गायत्री की व्यावहारिक शिक्षाएं

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गायत्री महा शक्ति के दो पक्ष हैं। 1- गायत्री साधना द्वारा आत्मबल का विकास 2- गायत्री शिक्षाओं द्वारा व्यावहारिक जीवन की सुव्यवस्था। इन दोनों ही पक्षों पर गायत्री प्रेमियों को पूरा ध्यान देना चाहिये। क्योंकि साँसारिक जीवन को सुख शान्तिमय बनाने के लिए जो आदर्श, सिद्धान्त एवं दृष्टिकोण आवश्यक है, उनको छोड़ दिया जाय तो केवल साधना से आत्मबल बढ़ाते रहना ही पर्याप्त न होगा। इसी प्रकार यदि गायत्री शिक्षाओं को अपनाकर साँसारिक जीवन क्रम तो ठीक कर लिया जाय पर ब्रह्म तेज में आत्मबल में अभिवृद्धि न की जाय तो भावी जीवन के लिए समुचित संस्कार जमा न हो सकेंगे।

गायत्री उपासना एवं तपश्चर्या की चर्चा इन पृष्ठों में होती ही रही है। सहस्रांशु ब्रह्म यज्ञ इस युग का अभूतपूर्व यज्ञ है, उसमें भागीदार होने वाले ऋत्विज् आशाजनक गति से बढ़ रहे हैं। यह बड़े ही हर्ष की बात है। यह साधना पक्ष का महत्वपूर्ण अंग है। साथ ही ऋत्विजों का तथा प्रत्येक गायत्री प्रेमी का यह भी कर्त्तव्य है कि गायत्री माता की शिक्षा एवं नीति के अनुसार अपने जीवन की व्यवस्था बनावें जिससे अपने तथा अपने साथियों की सुख शान्ति में अभिवृद्धि हो।

‘गायत्री गीता’ के 13 श्लोकों में निहित शिक्षाओं की चर्चा हम गत अंकों के सम्पादकीय पृष्ठों पर करते रहे हैं। ‘गायत्री स्मृति’ के 24 श्लोक भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। यह शिक्षाएं भी अत्यन्त आवश्यक हैं। नीचे गायत्री स्मृति के श्लोक और उनके अर्थ दे रहे हैं। आगे हर अंक में इसके एक एक श्लोक की विस्तृत विवेचना करते रहेंगे। यह शिक्षाएँ गायत्री प्रेमियों के व्यावहारिक जीवन का अंग बनें तभी उसकी गायत्री भक्ति रूपी रथ के दोनों पहिये सुसंचालित होंगे।

गायत्री स्मृति

ॐ भूर्भुवः स्वः

भूर्भुवः स्वस्त्रयो लोका व्याप्तमोम्ब्रह्म तेषु हि।

स एव तथ्यतो ज्ञानी यस्तद्वेत्ति विचक्षणः॥1॥

भूः, भुवः और स्वः ये तीन लोक हैं। उन तीनों लोकों में ओऽम् ब्रह्म व्याप्त है। जो बुद्धिमान उस ब्रह्म को जानता है वह ही वास्तव में ज्ञानी है।

‘तत्’—तत्वज्ञास्तु विद्वान्सो ब्राह्मणाः स्वतपश्चयैः॥

अन्धकारमपाकुर्युर्लोकादज्ञानसम्भवम्॥2॥

तत्वदर्शी विद्वान ब्राह्मण अपने एकत्रित तप के द्वारा संसार से अज्ञान से उत्पन्न अन्धकार को दूर करें।

‘स’ सत्तावन्तरतथा शूराः क्षत्रिया लोक रक्षकाः।

अन्यायाशक्तिसम्भूतान् ध्वंसयेयुर्हि व्यापदः॥

सत्तावान् वीर संसार के रक्षक क्षत्रिय अन्याय और अशक्ति से उत्पन्न होने वाली आपत्तियों को नष्ट करें।

‘वि’—वित्तशक्त्या तु कर्त्तव्या उचिताभाव पूर्तयः।

न तु शक्त्या नया कार्य दर्पौद्धत्यप्रदर्शनम्॥

धन की शक्ति द्वारा तो उचित अभावों की पूर्ति करनी चाहिए। उस शक्ति द्वारा घमण्ड और उद्धतता का प्रदर्शन नहीं करना चाहिए।

‘तु’—तुषाराणाँ प्रपातेऽपि प्रयत्नों धर्म आत्मनः।

महिमा च प्रतिष्ठा च प्रोक्तोऽपारः श्रमस्यहि॥4॥

तुषारापात में भी प्रयत्न करना आत्मा का धर्म है। श्रम की महिमा और प्रतिष्ठा अपार है ऐसा कहा गया है।

‘व’—वद नारीं विना कोऽन्यो निर्माता मनुसन्तते।

महत्वं रचना शक्तेः स्बस्याः नार्या हि ज्ञायताम्॥

नारी के बिना मनुष्य को बनाने वाला दूसरा और कौन है। अर्थात् मनुष्य की निर्मात्री नारी ही है। नारी को अपनी रचना शक्ति का महत्व समझना चाहिये।

‘रे’—रे वेव निर्मला नारी पूजनीया सता सदा।

यतो हि सैव लोकऽस्मिन् साक्षाल्लक्ष्मी मता बुधैः

सज्जन पुरुष को हमेशा नर्मदा नदी के समान निर्मल नारी की पूजा करनी चाहिए। क्योंकि विद्वानों ने उसी को इस संसार में साक्षात् लक्ष्मी माना है।

‘न्यं’—न्यस्यन्ते ये नराः पादान् पृकृत्याज्ञानुसारनः।

स्वस्थाः सन्तस्तु ते नूनं रोगमुक्ता भवन्ति हि ।7।

जो मनुष्य प्रकृति की आज्ञानुसार पैरों को रखते अर्थात् प्रकृति की आज्ञानुसार चलते हैं वे मनुष्य स्वस्थ होते हुए निश्चय ही रोग से मुक्त हो जाते हैं।

‘भ’—भवोद्विग्नमना नैव हृदुद्वेगं परित्यज।

कुरु सर्वास्ववस्थासु शान्तं सन्तुलितं मनः॥8॥

मानसिक उत्तेजना को छोड़ दो। सभी अवस्थाओं में मन को शान्त और सन्तुलित रखो।

‘गो’—गोप्याः स्वीया मनोवृत्तिर्नासहिष्णुर्नरो भवेत्।

स्थितिमन्यस्य वै वीक्ष्य तदनुरुपमाचरेत्॥9॥

अपने मनोभावों को नहीं छिपाना चाहिए। मनुष्य को असहिष्णु नहीं होना चाहिए। दूसरे की स्थिति को देख कर उसके अनुसार आचरण करे।

‘दे’—देयानि स्ववशे पुँसा स्वेन्द्रियाण्यखिलानि वै।

असंयतानि खादन्तीन्द्रियाण्येतानि स्वामिनम्।10

मनुष्य को अपनी सम्पूर्ण इन्द्रियाँ अपने वश में रखनी चाहिए। ये असंयत इन्द्रियाँ स्वामी को खा जाती हैं।

‘व’—वसताँ ना पबित्रः सन् वाह्यतोऽभ्यन्तरस्तथा।

यतः पवित्रताया हिं राजतेऽतिप्रसन्नता ॥11॥

मनुष्य को बाहर और भीतर सब तरफ से पवित्र होकर रहना चाहिये। क्योंकि पवित्रता में ही प्रसन्नता रहती है।

‘स्व’—स्पन्दनं परमार्थस्य परार्थो हि बुधैर्मतः।

योऽन्यान् सुखयते विद्वान् तस्य दुःखं बिनश्यति॥

दूसरे का प्रयोजन सिद्ध करना परमार्थ का रथ है ऐसा बुद्धिमानों ने कहा है। जो विचारवान् दूसरों को सुख देता है। उसका दुःख नष्ट हो जाता है।

‘धी’—धीरस्तुष्टो भवेन्नैव ह्येकस्याँ हि समुन्नतौ।

कृयता मुन्नतिस्तेन सर्वास्वाशासु जीवने ॥13॥

धीर पुरुष को एक ही प्रकार की उन्नति में संतुष्ट नहीं रहना चाहिए। मनुष्य को जीवन में सभी दिशाओं में उन्नति करनी चाहिए।

‘म’—महेश्वरस्य विज्ञाय नियमान्न्याय संयुतान्।

तस्य सत्ताँ च स्वीकुर्वन् कर्मणा तमुपासयेत्॥14॥

परमात्मा के न्याय पूर्ण नियमों को समझकर और उसकी सत्ता को स्वीकार करते हुए कर्म से उस परमात्मा की उपासना करें।

‘हि’—हितं मत्वा ज्ञानकेन्द्रं स्वातन्त्र्येण विचारयेत्।

नान्धानुसरणं कुर्यात् कदाचित् कोऽपिकस्यचित्॥

हितकारी ज्ञान केन्द्र को समझ कर स्वतन्त्रता पूर्वक विचार करे। कभी भी कोई किसी का अन्धानुसरण न करे।

‘धि’—धिया मृत्युँ स्मरेर्न्मम जानीयाज्जीवनस्य च।

तदा लक्ष्य समालक्ष्य पादौ सन्ततमाक्षिपेत्॥16॥

बुद्धि से मृत्यु का ध्यान रखे और जीवन के मर्म को समझे तब अपने लक्ष्य की ओर निरंतर अपने पैरों को चलावे अर्थात् निरंतर अपने लक्ष्य की ओर बढ़े।

‘यो’—यो धर्मो जगदाधारः स्वाचरणे तमानय।

मा विडम्वय तं स ते ह्ये को मार्गे सहायकः॥17॥

जो धर्म संसार का आधार है उस धर्म को अपने आचरण में लाओ। उसकी विडम्बना मत करो। वह तुम्हारे मार्ग में एक ही अद्वितीय सहायक है।

‘यो’—योजनं व्यसनेभ्यः स्यात्तानि पुँसस्तु शत्रवः।

मिलित्वैतानि सर्वाणि समये घ्नन्ति मानवम्॥

व्यसनों से योजन भर दूर रहें अर्थात् व्यसनों से बचा रहे क्योंकि वे मनुष्य के शत्रु हैं। ये सब मिल कर समय पर मनुष्य को मार देते हैं।

‘नः’-नः शृण्वेकामिमाँ वार्तां “जागृतस्त्वं सदा भव”

स्वपमाणं नरं नूनं ह्याक्रामन्ति विपक्षिणः॥19॥ हमारी इस एक बात को सुनो कि—तुम हमेशा सावधान रहो, क्योंकि निश्चय ही असावधान मनुष्य पर दुश्मन आक्रमण कर देते हैं।

‘प्र—प्रकृते स्तु भवोदारो नानुदारः कदाचन।

चिन्तयोदार दृष्टयैव तेन चित्तं विशुद्धय़ति ।20।

स्वभाव से ही उदार होओ, कभी भी अनुदार मत बनो, उदार दृष्टि से ही विचार करो, ऐसा करने से चित्त शुद्ध हो जाता है।

‘चो’—चोदयत्येव सत्संगो धियमस्य फ लं महत्।

स्वमतो सज्जनै र्विद्वान् कुर्यात् पर्यावृतं सदा॥21॥

सत्संग, बुद्धि को प्रेरणा देता है। इस सत्संग का फल महान् है, इसलिए विद्वान् अपने आपको हमेशा सत्पुरुषों से घिरा हुआ रखे अर्थात् हमेशा सज्जनों का संग करे।

‘द’—दर्शन ह्यात्मनः कृत्वा जानीयादात्म गौरवम।

ज्ञात्वा तु तत्तदात्मानं पूर्णोन्नतिपथं नयेत्॥22॥

आत्मा का दर्शन करके आत्मा के गौरव को पहचानो, उसको जानकर तब आत्मा को पूर्ण उन्नति के मार्ग पर ले चलो।

‘या’—यायात्स्वोत्तरदायित्वं निवहन् जीवने पिता।

कुपितापि तथा पापः कुपुत्रोऽस्ति यथा यतः॥23॥

पिता अपने उत्तरदायित्व को निवाहता हुआ जीवन में चले क्योंकि कुपिता भी उसी प्रकार पापी होता है जैसे कुपुत्र होता है।

‘त्’—तथाचरेत्सदान्येभ्यो वाँछत्यंन्यैर्यथा नरः।

नम्रः, शिष्टः, कृतज्ञश्च सत्यसाहाय्यवान् भवन्॥24॥

मनुष्य दूसरे के साथ उस प्रकार का आचरण करे जैसा वह दूसरों के द्वारा चाहता है। और उसे नम्र, शिष्ट, कृतज्ञ और सचाई के साथ सहयोग की भावना वाला होना चाहिये।

गायत्री महिमा

यथामधु च पुष्पेभ्यों घृतं दुग्धाद्रसात्पयः।

एवं हि सर्ववेदानाँ गायत्री सार मुच्यते॥

जिस प्रकार पुष्पों का सारभूत मधु, दूध का घृत, रसों का सारभूत दध है, उसी प्रकार गायत्री मंत्र समस्त वेदों का सार है।

तदित्यृचः समो नास्ति मंत्रो वेदाचतुष्टये।

सर्वे वेदाश्च यज्ञाश्च दानानि च तपाँसि च।

समानि कलया प्राहुर्नयो नतदित्यृचः॥

गायत्री के समान मंत्र चारों वेदों में नहीं है। सम्पूर्ण वेद, यज्ञ, दान, तप, गायत्री मंत्र की एक कला के समान भी नहीं है ऐसा मुनि लोग कहते हैं।

हस्तत्राणप्रदा देवी पतताँ नरकार्णबे।

तस्मात्तामभ्यसे न्नित्यंब्राह्मणो हृदये शुचिः॥

गायत्री नरक रूपी समुद्र में गिरते हुए को हाथ पकड़ कर बचाने वाली है अतः द्विज नित्य ही पवित्र हृदय से गायत्री का अभ्यास करें अर्थात् जपे।

गायत्रीं चैव वेदाँश्च तुलया समतोलयन्।

वेदा एकत्र साँगास्तु गायत्री चैकतः स्थिता॥

गायत्री और समस्त वेदों को तराजू से तोला गया, षट्अंगों सहित वेद एक ओर रखे गये और गायत्री को एक ओर रखा गया।

यद्यथाग्निर्देवानाँ, ब्राह्मणो मनुष्याणाँ,

वसन्त ऋतूनामेयं गायत्री छन्दसाम्॥

जिस प्रकार देवताओं में अग्नि, मनुष्यों में ब्राह्मण, ऋतुओं में वसंत ऋतु श्रेष्ठ है, उसी प्रकार समस्त छंदों में गायत्री छंद श्रेष्ठ है।

नास्ति गंगा समं तीर्थं न देवाः केशवात्परः।

गायत्र्यास्तु परं जप्यं न भूतं न भविष्यति॥

गंगा जी के समान कोई तीर्थ नहीं है, केशव से श्रेष्ठ कोई देवता नहीं है। गायत्री मंत्र के जप से श्रेष्ठ कोई जप न आज तक हुआ और न होगा।

गायत्र्या परमं नास्ति दिवि चेह न पावनम्।

हस्तत्राणप्रदादेवी पतताँ नरकार्णवे॥

नरक रूपी समुद्र में गिरते हुए को हाथ पकड़कर बचाने वाली गायत्री के समान पवित्र करने वाली वस्तु या मंत्र पृथ्वी पर तो क्या स्वर्ग में भी नहीं है।

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