गंगाजल का महत्व
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(पं. शिवनाथ जी शास्त्री)
वैज्ञानिक आयुर्वेदिक दृष्टि से गंगाजल की समालोचना करते हैं, तो यही पाया जाता है कि गंगाजल तथा गंगा-मृत्तिका में स्वस्थीकरण एवं शरीर-पोषण की अपूर्व शक्ति है। इस समालोचना के समर्थन में बड़े बड़े विज्ञानवेत्ता पाश्चात्य सभ्यता, दीक्षा में बर्द्धककण विद्वान् भी गंगाजल में शरीर पुष्टि की अद्भुत क्षमता है, ऐसा मुक्त कण्ठ से कहते हैं, तथा रोगियों, दुर्बल पुरुषों को किसी भी बलदायक (टानिक) वस्तु की आवश्यकता नहीं, यदि इसी जल का पान तथा स्नान करते रहें। विशेष करके आयुर्वेद के अन्वेषण (रिसर्च) से इस विषय के विज्ञान वेत्ताओं ने यह निश्चय किया है, कि गंगाजल में अजीर्ण रोग, अजीर्ण ज्वर, संग्रहणी, राजयक्ष्मा, और चिरकालीन श्वास रोग को समूल नष्ट करने की अपूर्व शक्ति है, यदि रोग के समय का प्रमाण देखकर पान करने तथा स्नान में उसी मात्रा का प्रयोग किया जाय। इसके अतिरिक्त यही गंगाजल केवल 40 दिन स्नान से प्रत्येक अभ्यान्तर मस्तक रोग तथा चर्म रोग के नाश करने में साक्षात् रामबाण है। इस कथन की सत्यता वर्तमान के महाविद्वान, सुप्रसिद्ध आयुर्वेदाचार्यों तथा प्रसिद्ध डाक्टरों ने रासायनिक परीक्षा से सिद्ध की है। विस्तृत रूप से नवमुद्रित ‘शिवसंहिता’ आयुर्वेद ग्रन्थ के उपोद्घात में मीमाँसा विद्यमान है।
जो पुरुष गंगाजल के अविश्वास की बुद्धि से इसके प्रभाव से वंचित थे वह भी अब इसकी चमत्कारिक शक्ति तथा विलक्षण प्रभाव को देखकर सिर झुका गये, और इस गंगाजल तथा इसकी मिट्टी को सिर में लगाने का प्रयत्न करने लग गये। पुरुष को जब सात्विक बुद्धि आती है, तो वह शास्त्र और गुरु -वचनों का सौभाग्य प्राप्त करने में समर्थ होता है।
जो कुत्सित-स्थान और वैसे ही जल के सेवन से ग्रन्थिक (प्लेग), विसूचिका (हैजा), दुर्वात (मलेरिया) आदि बहुत कठिन साँक्रामिक रोग उत्पन्न होते हैं, वही रोग गंगाजल में केवल स्वल्पकाल के स्नान से अदृश्य हो जाते हैं। कारण यह कि गंगाजल किसी भी प्रकार साँक्रामिक रोगादिकों के विषाणु से दूषित नहीं होता है। यदि किसी प्रकार के रोग के विषाणु जो रोग कीट के नाम से प्रसिद्ध हैं, इस गंगा में छोड़ दिये जायें, तो वह कृमि प्रातःकाल ही मर जाते हैं। यह भी आयुर्वेद-वैज्ञानिकों ने परीक्षा से सत्य पाया है। ऐसी अद्भुत शक्ति ही इसमें नहीं, प्रत्युत माधुर्य तथा मनोहरता भी पायी जाती है। यदि किसी प्रमाण से माप करके गंगाजल तथा अन्य जल दो शीशियों में भर दिया जाये, फिर एक दो मास के बाद माप लिया जाये, तो गंगाजल में वृद्धि हो गयी होगी, अन्य जल में ह्रास पाया जायगा।
डॉ. हेकिस ने गंगाजल की इस प्रकार परीक्षा की है। विसूचिका रोग के कृमि इसमें अपने अनुभव के वास्ते डाल दिये थे, जो दो घण्टे बीस मिनट में मर गये। अन्य जल में यही कीट वृद्धि पा गये। ऐसा चमत्कार देख कर वह मुग्ध रह गया। पाताल देश (अमेरिका) के सुप्रसिद्ध डाक्टरों ने बहुत कुछ इस विषय में लिख दिया है। बल्कि सारे संसार का सुप्रसिद्ध यात्री मार्क दुहन नामी अपनी संसार यात्रा में लिखता है। मैंने स्वयं गंगाजल की परीक्षा की, इसमें रोग कीटों के नाश करने की अपूर्व शक्ति है और यह जल अत्यन्त स्वच्छ तथा पवित्र है। इसका यही लाभ है, कि इसके जलपान से बड़े बड़े रोगी मनुष्यों के रोग नष्ट हो जाते हैं।
पाश्चात्य वैज्ञानिकों के मत के अतिरिक्त आयुर्वेद विशारदों का भी मत है कि—गंगाजल में कठिन से कठिन रोगों की निवारण-शक्ति विलक्षण पायी गयी है। एक रोगी क्षय-श्वास रोग का लक्ष हुआ था। वह निराश होकर आयु शेष के दिवस पूरे करने के लिए हरिद्वार में निवास करने गया, वहाँ पर सारे औषधों को ‘इति श्री’ करके सिर्फ गंगाजल का पान तथा समय समय पर स्नान किया करता रहा, जिससे वह केवल दो मास में स्वास्थ्य पा गया। ऐसे उदाहरण सुनकर जनगण में आश्चर्य तो अवश्य होता होगा। पर ऐसे अनेक और भी विचित्र उदाहरण हैं, जिससे पूरे तौर कौतुक पूर्ण शक्ति गंगाजल में विदित होती है। पवित्रता तो अनुमेय ही है।
इसी विषय में एक फ्राँस देश का वैज्ञानिक डॉ. डेरेल अपनी योग्यतानुसार परीक्षा करके यह पा गया, कि इस जल में विसूचिका-अतिसार-संग्रहणी -क्षय के कीटों को नाश करने तथा भयंकर घाव के पूर्ण करने की विलक्षण शक्ति है। बल्कि उसने अपने नवीन आविष्कार में प्रतिपादन भी किया है, तथा गंगाजल के कीटाणु के साहाय्य से एक अद्भुत औषधि का “वैक्टरियो फैज” नाम से निर्माण किया, जो उपरोक्त रोगों की चिकित्सा के कार्य में सफल हुआ।
गंगाजल की पवित्रता एवं उपयोगिता धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, प्रत्युत आधुनिक चिकित्सा शास्त्र की दृष्टि से भी माननीय है। जिसके प्रमाण में ‘गुड हेल्थ’ नामक इंग्लिश मासिक पत्र में मिस्टर सी. ई. नेलसन का लेख, ‘जो स्टेटमैन’ ‘लीडर’ इन पत्रों में भी प्रकाशित हुआ है, कि गंगाजल की पवित्रता सर्वमान्य है, इसमें विसूचिका तथा दुष्टब्रण नाश करने की अपूर्व शक्ति है। इत्यादि
रोशन लाल वाँरअटला लिखते हैं, कि मेरे सामने एक अमेरिका के डॉक्टर ने काशी के गन्दी नाली में से तीन बिन्दुमात्र गन्दा पानी निकाल कर यन्त्र द्वारा देखा, तो हजारों विसूचिका-कीट प्राप्त हुये। वही गन्दा पानी गंगाजल में छोड़कर देखा तो वह समस्त-कीट पड़ते ही मर गये। अर्थात् गंगाजल के एक एक परमाणु ने हजारों विष कीटों को खाकर जल को शुद्ध किया। इलाहाबाद का डॉ. करोली लिखता है कि मेरी कास श्वास की पुरानी व्याधि गंगाजल के प्रताप से हट गयी।
यह गंगा नदी गंगोत्री से निकल कर मन्दाकिनी पद्मा-अलकनन्दा-प्रभृति नदियों को अपने साथ ला अनेक प्रकार की औषधियों पर से बहती हुई बद्रीनाथ- केदारनाथ- देवप्रयाग- लक्ष्मण झूला-ऋषिकेश आदि स्थानों से होती हुई हरिद्वार की समतल भूमि में जा निकलती है। आश्चर्य है, इसी स्थान तक इसके यह गुण सम्पूर्ण रूप से मौजूद होते हैं। इस स्थान से आगे यह गुण न्यूनता को प्राप्त होते हैं। कारण कि जितना यह उत्तरोत्तर बहती जाती है, उतना इसमें गन्दी नालियाँ समुद्र पर्यन्त मिलती जाती हैं।

