यज्ञ और पुरुषोत्तम
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(श्री स्वामी विद्यानन्द जी महाराज)
गीता के अनुसार हम पिछले अंक में देख चुके हैं कि धर्म का विरोध न करने वाली इच्छा भगवान् का ही रूप है ‘धर्माविरुद्धः कामोऽस्मि’। दूसरे वेदादि शास्त्रों में लिखा है ‘यज्ञो वै पुरुषः’, ‘यज्ञो वै विष्णुः’। यज्ञ ही भगवान हैं। इसी से महात्मा लोग धर्मविरुद्ध काम को भी यज्ञ माना करते हैं। अर्थात् यज्ञ क्या है धर्म और काम का मेल। यज्ञ क्या है अपनी इच्छा को धर्मानुसार चलाना। धर्म का विरोध किये बिना सब कुछ करना ही तो यज्ञ है।
कुछ लोग समझते हैं कि गीता में यज्ञ की निन्दा है, गीता-धर्म से यज्ञ का विरोध है। पर सच्ची बात यह है कि गीता ने यज्ञ की महिमा को और भी अधिक चमका दिया है। गीता में यज्ञ का बड़ा व्यापक अर्थ लिया गया है। गीता में यज्ञ का ऐसा सुन्दर वर्णन हुआ है कि यज्ञ के भीतर सभी कुछ आ जाता है। यज्ञ से शरीर-यात्रा, कर्म, धर्म, सभ्यता, संस्कृति सभी का बोध हो जाता है। अधिक क्यों कहें, यह विश्व ही एक यज्ञ है। भगवान् ने कहा है कि यह बड़ा यज्ञ नित्य हुआ करता है अतः हम सब का कर्त्तव्य है कि उस यज्ञ में अपनी अपनी आहुति डाला करें।
गीता ने यज्ञ का छोटा और संकुचित अर्थ करने वालों को फटकारा है। गीता ने तो ब्रह्म तक को अग्नि बनाकर उसमें ब्रह्म की ही आहुति देने की राय दी है। इससे बड़ा यज्ञ और हो ही क्या सकता है?
गीता में जो यज्ञ की निन्दा सी दिख पड़ती है उसका क्या कारण है? लोगों को ऐसा भ्रम होता है कि गीता में मीमाँसकों और याज्ञिकों के यज्ञ-कर्म की निंदा है, इस भ्रम का क्या कारण है? इसका कारण समझने के लिए एक बात जान लेनी होगी। यज्ञ में दो अंग होते हैं—द्रव्य और देवता। प्रायः लोग कर्म के फेर में पड़कर, आशा के बंधन में बँधकर, द्रव्य पर ही जाते हैं और देवता को भूल जाते हैं। उन्हें प्रत्यक्ष यज्ञ देख पड़ता है, उन्हें उसका वही भौतिक रूप अच्छा लगता है, वे उसी यज्ञ-शरीर की पूजा करते हैं; पर वे भूल जाते हैं कि इस यज्ञ का देवता भी है। इस यज्ञ-शरीर के भीतर एक आत्मा भी है, उसकी भी पूजा करनी चाहिए। भगवान ने यही बात बार बार कही है कि शरीर देखो पर उसे सब कुछ मत समझो। शरीर के भीतर की आत्मा को भी पहचानने की कोशिश करो। इसी प्रकार यज्ञ करो पर इस यज्ञ को ही सब कुछ मत समझो। यज्ञ-पुरुष की पूजा इससे भी बड़ी है। पुरुषोत्तम की पूजा सबसे बड़ी होती है।
गीता यज्ञ और वेद सबका आदर करती है; पर इन सबके ऊपर वह परमेश्वर, परमब्रह्म, पुरुषोत्तम है। उस पुरुषोत्तम को गीता सबसे पहले देखती है और कहती है कि जो पुरुषोत्तम को—साक्षात् भगवान् को—भूलकर यज्ञ करता है वह आत्मा-रहित शरीर को पूजने वाला मूर्ख है। अतः यज्ञ करो पर यज्ञ के भीतर रहने वाले ‘अधियज्ञ’ को—यज्ञ के भी ईश्वर को—अर्थात् यज्ञपुरुष को सदा स्मरण रखो।

