रूप नहीं थिर रहते देखा (Kavita)
Listen online
View page note
Please go to your device settings and ensure that the Text-to-Speech engine is configured properly. Download the language data for Hindi or any other languages you prefer for the best experience.
परिवर्तन-स्यन्दन पर चढ़कर निशिदिन प्रति पल चलते देखा।
रूठ चला बालापन मुझसे,
कुन्द धवल किलकारी भरता।
यौवन रूठा प्यार हृदय में,
नयलों में मधु प्याली भरता॥
आज जरठता में अतीत की स्मृति पर, अश्रु बरसते देखा।
रूप नहीं थिर रहते देखा॥
मलय स्पर्श से पुलकित कलिका-
ने अपना अवगुण्ठन खोला।
विश्व ठगा सा रहा देखता,
मधुर मधुर,मधु षट्पद बोला॥
किन्तु दूसरे दिन उसका, अनुपम सौंदर्य झुलसते देखा।
रूप नहीं थिर रहते देखा॥
दो दिन का बसन्त का वैभव,
दो दिन सावन की हरियाली।
दो दिन नयनों का आकर्षण,
दो दिन अधरों की प्रिय लाली॥
दो दिन कुसुमित जीवन डाली फिर काँटों में पलते देखा।
रूप नहीं थिर रहते देखा॥
जाने किन अस्थिर तत्वों को,
लेकर निर्मित हुआ रूप है।
क्या अस्थिरता के भय से वह
कलाकार रहता अरूप है??
किन्तु रूप का जाल बिछाकर उसे जगत को छलते देखा।
रूप नहीं थिर रहते देखा॥
*समाप्त*
(श्री रामाघार जी द्विवेदी, वाजिदपुर)
(श्री रामाघार जी द्विवेदी, वाजिदपुर)

